Friday, March 5, 2021
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कंप्यूटर बाबा की सत्ता के गलियारों में वापसी, कमलनाथ ने आनन-फ़ानन में की नियुक्ति

कॉन्ग्रेस पार्टी को भी यह साफ़ करना चाहिए कि इन्हीं कंप्यूटर बाबाजी की नर्मदा नदी के उद्धार हेतु बनी समिति में नियुक्ति यदि गलत और हिन्दुओं का 'तुष्टिकरण' थी तो आज हालातों में ऐसे क्या बदलाव हुए हैं कि उन्हीं बाबाजी की नियुक्ति अब सही हो गई है?

अपने आप में न तो किसी सन्यासी के कंप्यूटर या अन्य गैजेट इस्तेमाल करने पर किसी को आपत्ति हो सकती है, न ही उन गैजेट्स के नाम पर ही अपना नाम ‘कंप्यूटर बाबा’ रख लेने पर, पर सांसारिक मोह-माया से कट्टी कर लेने का दावा करने वाले कंप्यूटर बाबा की राजनैतिक निष्ठा और विचारधारा यदि पेंडुलम की तरह सुविधा और अवसर की हवाओं के मुताबिक डोले तो सवाल उठना लाज़मी है।

मध्य प्रदेश की कमलनाथ नीत ‘हिंदुत्ववादी’(??) कॉन्ग्रेस सरकार ने प्रदेश के चर्चित संत कंप्यूटर बाबा को माँ नर्मदा, माँ क्षिप्रा, एवं माँ मन्दाकिनी रिवर ट्रस्ट का अध्यक्ष नियुक्त करने की घोषणा की है, वह भी चुनावों की तारीख चुनाव आयोग द्वारा घोषित किए जाने और आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले।

चुनावों से ठीक पहले नियुक्ति (‘जनता के रिपोर्टर एक्सपोज़ करने से चूके’)

कंप्यूटर बाबा (नामदेव त्यागी) की नियुक्ति न केवल लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले (रविवार, 10 मार्च को) घोषित की गई, जबकि नियुक्ति का आदेश 8 मार्च (शुक्रवार) को जारी किया जा चुका था, बल्कि ख़बरों के मुताबिक कंप्यूटर बाबा ने इस नियुक्ति और आदेश के समय में बरती गई चालाकी की खुले तौर पर तारीफ़ भी की है। वहीं जनता के हक़ और हुकूक की लड़ाई लड़ने वाले (ठीक उसी तरह, जैसे AAP आम आदमियों की पार्टी है) जनता के स्वनामधन्य रिपोर्टर योगी सरकार द्वारा राजू श्रीवास्तव को फ़िल्म विकास परिषद के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति पर सवाल उठाने के चक्कर में इस खबर को कवर करना ही भूल गए।

भाजपा भी दे चुकी है राज्यमंत्री का दर्जा

इससे पूर्व पिछले वर्ष ही, कंप्यूटर बाबा को तत्कालीन भाजपाई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकार ने योजना, आर्थिक और सांख्यिकी विभाग का राज्यमंत्री बनाया था। चार अन्य आध्यात्मिक नेताओं- (अब दिवंगत) भय्यूजी महाराज, सर्वश्री नर्मदानंद जी, श्री हरिहरानंद जी, एवं पण्डित योगेन्द्र महंत जी को भी राजयमंत्री का दर्जा दिया गया था। उस समय देश के लेफ़्ट-लिबरल धड़े ने इसे हिन्दुत्ववादी एजेंडा बताते हुए बहुत हल्ला काटा था। यहाँ तक कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस प्रवक्ता श्री पंकज चतुर्वेदी ने तो इसे उस समय के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर उपरोक्त आध्यात्मिक विभूतियों द्वारा आम लोगों की श्रद्धा को निचोड़ने का प्रयास करने और अपने पाप धोने का प्रयास करने का भी आरोप लगाया था।

जहाँ तक कि हमारी जानकारी है, श्री पंकज चतुर्वेदी जी की कॉन्ग्रेस ने अभी तक कमलनाथ सरकार के इस सांप्रदायिक कदम की कोई आलोचना नहीं की है, पर हम उसे पूरी तत्परता से तलाश रहे हैं, और मिलते ही यहाँ अपडेट कर देंगे।

हवा के रुख और अवसर की आंधी से बदलती रही है कंप्यूटर बाबाजी की राजनीतिक निष्ठा

पिछले साल जब कंप्यूटर बाबाजी को मार्च में शिवराज सरकार ने राज्यमंत्री का दर्जा दिया था, उस समय वह और योगेन्द्र महंतजी 15-दिवसीय नर्मदा स्कैम यात्रा निकालने की तैयारी कर रहे थे। पर उस नियुक्ति के पश्चात समाचार एजेंसी से यह खबर आई कि कंप्यूटर बाबा ने अपने ऊपर भरोसा जताए जाने के लिए प्रदेश सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया, वह भी सम्पूर्ण संत समाज की ओर से। शिवराज सरकार ने पाँचों संतों को नर्मदा के किनारे वृक्षारोपण, जल संरक्षण, और स्वच्छता के प्रति जागरुकता वर्धन हेतु बनी समिति में नियुक्त किया था। विकिपीडिया के अनुसार इससे पहले 2014 लोकसभा चुनावों में कंप्यूटर बाबाजी ने आम आदमी पार्टी से भी मध्य प्रदेश में टिकट देने की गुज़ारिश की थी।

हम न तो आध्यात्मिक व्यक्तियों की राजनीतिक राय होने के विरोधी हैं और न ही सत्ता को प्रभावित करने के उनके प्रयासों के। लोकतंत्र में एक बाबा और एक सीईओ का वोट और राजनीतिक अधिकार बराबर के दिए गए हैं और हम इसका न केवल सम्मान बल्कि पुरज़ोर समर्थन करते हैं। पर राजनीति में यदि वायु वेग से और सुविधानुसार किसी शिक्षक, राजनेता या व्यापारी की राजनीतिक राय बदलने पर सवाल पूछे जाएँगे तो अध्यात्म जगत से राजनीति में आए महानुभावों को भी छूट नहीं दी जा सकती। हमारा यह मानना है कि श्री कंप्यूटर बाबाजी को स्वयं इस विषय पर स्पष्टीकरण देकर मामला ख़त्म कर देना चाहिए।

इसके अलावा कॉन्ग्रेस पार्टी को भी यह साफ़ करना चाहिए कि इन्हीं कंप्यूटर बाबाजी की पर्यावरण संरक्षण और मध्य प्रदेश के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र नर्मदा नदी के उद्धार हेतु बनी समिति में नियुक्ति यदि गलत और हिन्दुओं का ‘तुष्टिकरण’ थी तो आज हालातों में ऐसे क्या बदलाव हुए हैं कि उन्हीं बाबाजी की नियुक्ति अब सही हो गई है? वह भी बिना उनके अधिकारों, पद, सुविधाओं आदि को रेखांकित किए।

जनता के स्वनामधन्य रिपोर्टरों से भी हमारा विनम्र आग्रह है कि यदि आपका उद्देश्य भाजपा का येन-केन प्रकारेण विरोध करना नहीं बल्कि ‘इश्यू-बेस्ड स्टैंड’ लेना है तो किसी भी ‘इश्यू’ पर भाजपा का नाम आते ही एकतरफ़ा रिपोर्टिंग चालू कर देने की बजाय उसी मुद्दे पर भाजपा के आलावा बाकियों पर भी अपनी ‘कृपा-दृष्टि’ ज़रूर डालें। क्योंकि कृपा वहीं से रुक रही है।

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