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अहमदाबाद में बढ़ती ‘ग्रीन बेल्ट’ क्या भविष्य की राजनीति और सामाजिक संतुलन के लिए बड़ा खतरा? समझें- निकाय चुनाव के नतीजों ने क्यों बढ़ाई चिंता

अहमदाबाद के कई इलाकों में बदले जनसंख्या संतुलन और एकतरफा वोटिंग पैटर्न ने शहर की राजनीति और भविष्य को लेकर नई चिंताएँ बढ़ा दी हैं।

गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव खत्म हो चुके हैं और नतीजे भी सामने आ गए हैं। हर बार की तरह इस बार भी भाजपा ने बड़ी और ऐतिहासिक जीत हासिल की है। लेकिन इस जीत के बीच कुछ ऐसे इलाके भी हैं जहाँ भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।

खास तौर पर अहमदाबाद के कुछ क्षेत्रों में भाजपा पीछे रह गई, जहाँ अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। भाजपा की बड़ी जीत के बीच अब हम उस दूसरे पहलू की बात कर रहे हैं, जिस पर ध्यान देना भी काफी जरूरी है।

अहमदाबाद नगर निगम यानी AMC चुनाव में भाजपा ने 160 से ज्यादा सीटें जीतकर बड़ा रिकॉर्ड बनाया है। लेकिन इन नतीजों का दूसरा पक्ष भी चर्चा में है। जिन वार्डों में कॉन्ग्रेस को जीत मिली है उनमें मक्तमपुरा, दरियापुर, जमालपुर, बहरामपुरा, दानिलिमदा, गोमतीपुर और खड़िया शामिल हैं। इन इलाकों में मुस्लिम आबादी करीब 30 से 40 प्रतिशत तक है, जबकि कुछ जगहों पर यह आँकड़ा करीब 60 प्रतिशत तक है।

सवाल ये नहीं है कि कॉन्ग्रेस ने इन क्षेत्रों में जीत हासिल की या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि इन क्षेत्रों में भाजपा के लिए रास्ता क्यों बंद कर दिया गया?

बदलते जनसंख्या संतुलन का असर

जब किसी इलाके में अल्पसंख्यक आबादी 40 प्रतिशत से ज्यादा हो जाती है, तो वहाँ चुनाव का पूरा गणित बदल जाता है। विकास, पानी, सीवर और सड़क जैसे मुद्दे धीरे-धीरे पीछे चले जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असर ब्लॉक वोटिंग का देखने को मिलता है।

मुस्लिमों ने एकजुट होकर कॉन्ग्रेस के पक्ष में वोट किया है। चुनाव नतीजे यह दिखाते हैं कि यहाँ वोटिंग सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर नहीं हुई, बल्कि धार्मिक पहचान और संख्या के आधार पर भी मतदान देखने को मिला। यही वजह है कि कई इलाकों में कॉन्ग्रेस को सीधा फायदा मिला और आज पार्टी काफी हद तक इसी वोट बैंक के सहारे अपनी मौजूदगी बनाए हुए है।

शहर के दो अलग-अलग चेहरे

अहमदाबाद के पश्चिम और पूर्व के हिंदू बहुल इलाकों में मतदान अलग-अलग मुद्दों पर बंटा हुआ दिखाई देता है। वहाँ लोग विकास, विचारधारा और स्थानीय कामकाज को ध्यान में रखकर वोट देते हैं। लेकिन जिन इलाकों को अब ‘ग्रीन बेल्ट’ कहा जा रहा है, वहाँ तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है।

पिछले दस वर्षों में इन क्षेत्रों की आबादी के संतुलन में तेजी से बदलाव हुआ है, जिसे कई लोग चिंता का विषय मान रहे हैं। राजनीतिक और सामाजिक तनाव के बीच यह जनसांख्यिकीय बदलाव भविष्य में शहर की शांति और राजनीतिक स्थिरता पर असर डाल सकता है।

कभी पूरे गुजरात पर शासन करने वाली कॉन्ग्रेस अब कुछ चुनिंदा इलाकों तक सीमित होती दिखाई दे रही है। पार्टी को लगता है कि हिंदू वोटों में पकड़ मजबूत करने से ज्यादा आसान मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखना है।

इसी कारण भाजपा के लिए उन इलाकों में पारंपरिक तरीके से चुनाव लड़ना कठिन होता जा रहा है, जहाँ आबादी का संतुलन तेजी से बदल रहा है। AMC के ये नतीजे सिर्फ सामान्य चुनाव परिणाम नहीं माने जा रहे, बल्कि इन्हें अहमदाबाद के भविष्य के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।

आँकड़े साफ बताते हैं कि अगर जनसंख्या संतुलन में यह बदलाव इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले समय में कुछ इलाकों में चुनावी राजनीति पूरी तरह संख्या आधारित होती चली जाएगी।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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લિંકન સોખડિયા
લિંકન સોખડિયા
Journalist | Editor | Multimedia Producer Bridging the gap between ground reality and digital storytelling. Specializing in hard-hitting regional news, investigative reports, and high-impact digital media production.

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