फिरोज खान की नियुक्ति पर अड़े BHU वीसी, छात्रों से बातचीत विफल

BHU प्रशासन ने अपनी प्रक्रिया को पारदर्शी बताया। आंदोलनकारी छात्र 7 नवम्बर से विरोध प्रदर्शन पर बैठे हुए हैं। आन्दोलन कर रहे छात्रों से मिलने के बाद...

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के धर्म-विज्ञान संकाय में फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर छात्रों का प्रदर्शन लगातार जारी है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा की गई इस नियुक्ति में आन्दोलनरत छात्रों ने कुलपति से मुलाक़ात भी की मगर तीन दिन के बाद भी इस वार्ता का कोई भी हल नहीं निकल सका है।

छात्रों के आरोपों और उनकी माँगे सुनने के बाद प्रशासन ने अपने कदम को जायज़ ठहराते हुए फ़िरोज़ खान की नियुक्ति को सही बताया। अपनी बात स्पष्ट करते हुए प्रशासन ने अपनी इस प्रक्रिया को पारदर्शी बताया। बता दें कि यह छात्र 7 नवम्बर से विरोध प्रदर्शन पर बैठे हुए हैं। शुक्रवार देर रात आन्दोलन कर रहे छात्रों से मिलने के बाद कुलपति राकेश भटनागर ने इस विषय पर विधि विशेषज्ञ की राय लेने की बात कही है।

बता दें कि देश भर में तमाम मीडिया समूहों ने इस न्यूज़ को ऐसे चलाया हुआ है कि जैसे पूरे BHU में मुस्लिम टीचर की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। अलीगढ़ के तर्ज पर बेशक BHU के नाम में कुछ समानताएँ हो लेकिन वहाँ किसी का सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से विरोध कभी नहीं हुआ। फिर इस बार ऐसा क्या है कि इस नियुक्ति को रद्द करने की माँग SVDV के छात्र कर रहे हैं।

पढ़ें: ‘केवल हिन्दुओं’ के लिए बने BHU धर्म संकाय में डॉ. फ़िरोज़ खान की नियुक्ति कैसे हो गई: ग्राउंड रिपोर्ट

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आपको बता दें कि संकाय के मंदिरनुमा भवन के प्रवेश द्वार पर दो स्तंभों पर शंकर-पार्वती की मूर्तियाँ स्थापित हैं जिनका संस्कृत विद्या धर्म संकाय के अधिकांश प्रोफेसर्स प्रदक्षिणा करते हुए संकाय में प्रवेश करते हैं। क्या ऐसा तब भी होगा जब इस संकाय में कल कई सारे मुस्लिम प्रोफ़ेसर होंगे। आपको शायद न पता हो कि BHU के इसी संकाय से प्रकाशित होने वाला ‘विश्व हिंदू पंचांग’ पूरे विश्व के हिन्दू धर्म के तिथि त्योहार सम्बन्धी सभी विवादों का समाधान करता है। लेकिन, आज दुर्भाग्य यह है कि इसके बारे में हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत सारे लोग ही नहीं जानते। और तब की सोचिए जब आज से 20 साल बाद गैर हिन्दू लोग यहाँ संकाय-प्रमुख और विभागाध्यक्ष होंगे तब हिन्दू-परम्पराओं की न जाने क्या-क्या और कैसी-कैसी व्याख्याएँ की जाएँगी।

मीडिया द्वारा इस मुद्दे को सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम तक सीमित कर देने से चिंतित वहाँ के छात्रों ने बताया की इस आधुनिक दौर में इन छात्रों को आप वह पारंपरिक रूढ़िवादी आदिवासी या कुछ भी समझ सकते हैं जो अपनी छोटी सी पुरखों की जमीन, सनातन परम्परा और ग्रामदेवता पर आए संकट से बचने के लिए आज भाला बरछी निकाल लिए हैं। क्योंकि, इनके सामने आधुनिक असलहों से लैस वाईसचांसलर(VC) JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर ‘सरकार’ हैं और विभागाध्यक्ष व एक्सपर्ट्स ‘पूँजीपति और अधिकारी।’ तथाकथित विकास और आधुनिकता का समर्थन करने वाली लिबरल जनता (गैंग) भी सामने है। यह छात्र आज खुद में कल का कश्मीरी हिन्दू भी देख रहे हैं। इनके लिए त्रासद यह है कि आज इनके पलायन की भूमिका ‘संघ समर्थित हिन्दू सरकार’ के शासन-काल में लिखी जा रही है। और लोग मौन हैं। आखिर अपनी परम्पराओं के संरक्षण के लिए हम अब खड़े नहीं हुए तो आने वाले समय जो थोड़ा-बहुत संरक्षित पारम्परिक ज्ञान-विज्ञान बचा है उसे भी आज के ‘दीमक’ चाट जाएँगे।

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एक छात्र के मुताबिक “आज से बहुत पहले जब दिसंबर में काशी में राष्ट्रीय महासभा हुई और उसी अवसर पर 31 दिसंबर सन 1905 ई० को बरार के श्री वी०एन० महाजनी एम्० ए० के सभापतित्व में काशी के टाउन हॉल में एक बड़ी भारी सभा हुई थी। सब धर्मों के प्रतिनिधि देशभर के प्रसिद्ध शिक्षा प्रेमियों के सामने आज की यह योजना रखी गई। यहाँ भी हिंदू विश्वविद्यालय की योजना का सबने स्वागत किया। 1 जनवरी सन 1906 ई० को वहीं कॉन्ग्रेस के पंडाल में हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा हुई थी।”

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