Thursday, August 13, 2020
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‘केवल हिन्दुओं’ के लिए बने BHU धर्म संकाय में डॉ. फ़िरोज़ खान की नियुक्ति कैसे हो गई: ग्राउंड रिपोर्ट

"अगर हमने आज विरोध नहीं किया तो 15 साल बाद इस संकाय में एक मुसलमान प्रोफेसर होगा, विभागाध्यक्ष होगा, डीन होगा। कई अन्य मुस्लिमों की नियुक्ति करेगा, और एक ऐसा दौर भी आएगा जब हिन्दू विश्वविद्यालय के 'हिन्दू धर्म संकाय' का संचालन गैर-हिन्दू करेंगे। वे जिनका इन विषयों से, सनातन परंपरा से, यज्ञ और ज्योतिष से कोई आत्मीय लगाव नहीं होगा....."

‘पंडित कृष्णकांत चतुर्वेदी जल्द ही इस्लाम, शरीयत और इस्लामी तौर तरीकों की शिक्षा देंगे…’ क्या हुआ? ये सुनकर आपको झटका लगा खैर ऐसा फ़िलहाल कहीं नहीं हो रहा है, लेकिन सोचिए अगर ऐसा सच में हो किसी विश्वविद्यालय में तो क्या जो पूरी तरह दिनी तालीम के लिए किसी मदरसे या ऐसे विशेष विभाग में गए होंगे उन्हें झटका नहीं लगेगा? लगना स्वाभाविक है।

हाल-फिलहाल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के साहित्य विभाग में एक मुस्लिम सहायक प्रोफेसर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति 5 नवम्बर को हुई, संकाय के विद्यार्थियों को जैसे ही इसकी जानकारी हुई इस नियुक्ति के खिलाफ विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और पिछले कई दिनों से लगातार छात्रों द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में कुलपति के आवास के सामने धरना जारी है।

लेकिन, तमाम मीडिया समूहों ने इस न्यूज़ को ऐसे चलाया जैसे पूरे BHU में मुस्लिम टीचर की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। ऐसा बिलकुल नहीं है। अलीगढ़ के तर्ज पर बेशक BHU के नाम में कुछ समानताएँ हो लेकिन वहाँ किसी का सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से विरोध कभी नहीं हुआ। फिर इस बार ऐसा क्या है कि इस नियुक्ति को रद्द करने की माँग SVDV के छात्र कर रहे हैं। इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के विद्यार्थियों से बात की कि उनका विरोध किस बात को लेकर है, क्यों है? इस नियुक्ति को लेकर वहाँ के छात्रों ने हमें बहुत कुछ बताया। जिस पर ये पूरी ग्राउंड रिपोर्ट आधारित है।

यहाँ एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि ये छात्र कौन हैं जो एक संस्कृत के ‘मुसलमान’ छात्र को अध्यापक के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। क्या यह एक उन्मादी रूढिवादी हिन्दू भीड़ है? क्या यह फिरोज़ खान का विश्वविद्यालय में नियुक्ति का विरोध है? क्या यह एक मुस्लिम अध्यापक के साथ भेदभाव है? ऐसे कई प्रश्न उठाए जा सकते हैं और तर्कों से कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है। जैसा कि मीडिया गिरोह और कुछ फेसबुकिया विद्वान इस मुद्दे को लेकर आक्रोशित हैं और BHU को अपने-अपने तरीके से बदनाम करने में लगे हैं।

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इन सभी सवालों का जवाब हमें वहाँ के धरनारत कई छात्रों ने दिया। उन्ही में से एक शशिकांत मिश्रा ने हमें बताया यह विरोध एक गैर-हिन्दू का ‘धर्म-विज्ञान संकाय’ में नियुक्ति का विरोध है। अगर यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के ही किसी अन्य संकाय में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो विरोध नहीं होता। विरोध का मूल इस विशेष संकाय में गैर-हिन्दू की नियुक्ति में निहित है। और विरोध करने वाले छात्र परम्परावादी हिन्दू हैं जो सनातन हिन्दू परम्पराओं, वेद, वेदांग, कर्मकाण्ड, ज्योतिष के प्रति पूरी श्रद्धा और भाव से समर्पित हैं और अब इस प्रकरण के बाद अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी।

उन धरनारत छात्रों में से उनके लीडर चक्रपाणि ओझा ने हमें बताया, “अगर हमने आज विरोध नहीं किया तो 15 साल बाद इस संकाय में एक मुसलमान प्रोफेसर होगा, विभागाध्यक्ष होगा, डीन होगा। जो कई अन्य मुस्लिमों की नियुक्ति करेगा, और एक ऐसा दौर भी आएगा जब हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू धर्म संकाय’ का संचालन गैर-हिन्दू करेंगे। वे जिनका इन विषयों से, सनातन परंपरा से, यज्ञ और ज्योतिष से कोई आत्मीय लगाव नहीं होगा, बस यह उनकी जीविका का साधन होगा तो महामना मालवीय जी के इस बगिया में इस संकाय की स्थापना का मूल उद्देश्य ही छिन्न-भिन्न हो जाएगा।”


शोध छात्र चक्रपाणि ओझा ने विद्यार्थियों का पक्ष रखा

इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई करने वाले शोध छात्र चक्रपाणि ने आगे बताया कि इस विरोध को समझने के लिए संकाय की संरचना को समझने की भी जरूरत है। ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ यह पूरा नाम है, जिसमें दो हिस्से हैं। पहला ‘संस्कृत विद्या’ और दूसरा ‘धर्म विज्ञान’ (Theology)। समझने की बात यह है कि ‘संस्कृत विद्या’ कोई भी किसी भी धर्म का व्यक्ति पढ़-पढ़ा सकता है। लेकिन ‘धर्म विज्ञान’ की बात जब कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति करे जिसका उन सनातन मूल्यों में कोई भरोसा ही न हो तो उसमें वह विश्वसनीयता नहीं रह जाती जिसकी जरुरत है।

चक्रपाणि ने कहा, “इसी कारण से यह संकाय भारत के अन्य संस्कृत संकायों/विभागों से भिन्न है। ‘हिन्दू’ विश्वविद्यालय में मालवीय जी ने इस संकाय की स्थापना संस्कृत विद्या के संरक्षण-संवर्धन के लिए इस उद्देश्य से किया कि हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं के वैज्ञानिक स्वरूप की व्याख्या की जा सके। जब किसी हिन्दू धार्मिक मान्यता को (इस्लामिक और इसाई संगठनों द्वारा पोषित) वामपंथी या कोई अन्य तथाकथित बुद्धिजीवी दकियानुसी कह कर मजाक उड़ाता है तब इस संकाय की जिम्मेदारी होती है कि ये उस धार्मिक मान्यता का वैज्ञानिक पक्ष सबके सामने रखे।”

आपको बता दें कि संकाय के मंदिरनुमा भवन के प्रवेश द्वार पर दो स्तंभों पर शंकर-पार्वती की मूर्तियाँ स्थापित हैं जिनका संस्कृत विद्या धर्म संकाय के अधिकांश प्रोफेसर्स प्रदक्षिणा करते हुए संकाय में प्रवेश करते हैं। क्या ऐसा तब भी होगा जब इस संकाय में कल कई सारे मुस्लिम प्रोफ़ेसर होंगे। आपको शायद न पता हो कि BHU के इसी संकाय से प्रकाशित होने वाला ‘विश्व हिंदू पंचांग’ पूरे विश्व के हिन्दू धर्म के तिथि त्योहार सम्बन्धी सभी विवादों का समाधान करता है। लेकिन, आज दुर्भाग्य यह है कि इसके बारे में हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत सारे लोग ही नहीं जानते। और तब की सोचिए जब आज से 20 साल बाद गैर हिन्दू लोग यहाँ संकाय-प्रमुख और विभागाध्यक्ष होंगे तब हिन्दू-परम्पराओं की न जाने क्या-क्या और कैसी-कैसी व्याख्याएँ की जाएँगी।

SVDV BHU

इस विरोध प्रदर्शन को लीड कर रहे संस्कृत विद्या धर्म संकाय के छात्र चक्रपाणि ओझा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “हमारे दो आरोप हैं- सबसे पहला तो यह कि ये नियुक्ति षडयंत्र के तहत की गई है। इंटरव्यू और पूरा प्रॉसेस डॉ. फिरोज खान के हिसाब से तय किया गया है। दूसरा आरोप यह है कि जब बीएचयू के शिलालेख पर लिखा है कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में ‘गैर हिंदू’ ना ही अध्ययन कर सकता है और ना ही अध्यापन तो एक मुस्लिम की नियुक्ति क्यों की गई।”

उन्होंने यह भी कहा कि ‘हिन्दू संस्थाएँ’ गैर-हिन्दुओं के प्रवेश निषेध जैसे नियम कायदे संविधान में नहीं लिखवातीं थीं, शिलालेखों पर लिखवाकर परम्परा का संरक्षण समझ लेती थीं। इसलिए इस नियुक्ति का विरोध संवैधानिक नहीं है, शायद तार्किक भी नहीं है। अपितु भावनात्मक ज़्यादा है। लेकिन आपको पता होना चाहिए कि मुस्लिम संस्थाएँ इस संदर्भ में कोई चूक नहीं करतीं।

शिलालेख SVDV BHU

मीडिया द्वारा इस मुद्दे को सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम तक सीमित कर देने से चिंतित वहाँ के छात्रों ने बताया की इस आधुनिक दौर में इन छात्रों को आप वह पारंपरिक रूढ़िवादी आदिवासी या कुछ भी समझ सकते हैं जो अपनी छोटी सी पुरखों की जमीन, सनातन परम्परा और ग्रामदेवता पर आए संकट से बचने के लिए आज भाला बरछी निकाल लिए हैं। क्योंकि, इनके सामने आधुनिक असलहों से लैस वाईसचांसलर(VC) JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर ‘सरकार’ हैं और विभागाध्यक्ष व एक्सपर्ट्स ‘पूँजीपति और अधिकारी।’ तथाकथित विकास और आधुनिकता का समर्थन करने वाली लिबरल जनता (गैंग) भी सामने है। यह छात्र आज खुद में कल का कश्मीरी हिन्दू भी देख रहे हैं। इनके लिए त्रासद यह है कि आज इनके पलायन की भूमिका ‘संघ समर्थित हिन्दू सरकार’ के शासन-काल में लिखी जा रही है। और लोग मौन हैं। आखिर अपनी परम्पराओं के संरक्षण के लिए हम अब खड़े नहीं हुए तो आने वाले समय जो थोड़ा-बहुत संरक्षित पारम्परिक ज्ञान-विज्ञान बचा है उसे भी आज के ‘दीमक’ चाट जाएँगे।

ऑपइंडिया से बात करते हुए वहाँ के छात्रों ने हमें वो पुराने दस्तावेज भी दिखाए जिसके बल पर आज वे मालवीय जी के सपनों के लिए लड़ रहे हैं आने वाली पीढ़ियों के लिए आज उठ खड़े हुए हैं। चक्रपाणि ओझा ने बताया कि आज से बहुत पहले जब दिसंबर में काशी में राष्ट्रीय महासभा हुई और उसी अवसर पर 31 दिसंबर सन 1905 ई० को बरार के श्री वी०एन० महाजनी एम्० ए० के सभापतित्व में काशी के टाउन हॉल में एक बड़ी भारी सभा हुई थी। सब धर्मों के प्रतिनिधि देशभर के प्रसिद्ध शिक्षा प्रेमियों के सामने आज की यह योजना रखी गई। यहाँ भी हिंदू विश्वविद्यालय की योजना का सबने स्वागत किया। 1 जनवरी सन 1906 ई० को वहीं कॉन्ग्रेस के पंडाल में हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा हुई थी।

अगले ही वर्ष सन 1907 ई० में 20 से 26 जनवरी तक प्रयाग में परमहंस परिव्राजकाचार्य जगद्गुरु श्री स्वामी शंकराचार्य जी के सभापतित्व में सुप्रसिद्ध साधुओं तथा विद्वानों की सनातनधर्म महासभा में यह प्रस्ताव स्वीकार हो गया कि-

भारतीय विश्वविद्यालय के नाम से काशी में एक हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए, जिसके निम्नांकित उद्देश्य हों-

  • श्रुतियों तथा स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रम धर्म के पोषक, सनातन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए धर्म के शिक्षक तैयार करना।
  • संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन की अभिवृद्धि।
  • भारतीय भाषाओं तथा संस्कृत के द्वारा वैज्ञानिक तथा शिल्प-कला से संबंधित शिक्षा के प्रचार में योगदान देना।

विश्वविद्यालय में निम्नांकित संस्थाएँ होंगी-

वैदिक विद्यालय (वर्तमान में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) -जहाँ वेद वेदांग स्मृति इतिहास तथा पुराणों की शिक्षा दी जाएगी ज्योतिष विभाग में एक ज्योतिष संबंधित तथा अंतरिक्ष विद्या संबंधित वेधशाला भी निर्मित की जाएगी।

इस विश्वविद्यालय का धर्म संबंधी कार्य तथा वैदिक कॉलेज (वर्तमान में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) का कार्य उन हिंदुओं के अधिकार में होगा जो श्रुति, स्मृति तथा पुराणों द्वारा प्रतिपादित सनातन धर्म के सिद्धांतों को मानने वाले होंगे।

  • इस विश्वविद्यालय में वर्णाश्रम धर्म के नियमानुसार ही प्रवेश होगा।
  • इस विद्यालय (संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) के अतिरिक्त अन्य सभी विद्यालयों में सब धर्मावलंबियों तथा सब जातियों का प्रवेश हो सकेगा तथा संस्कृत भाषा के अन्य शाखाओं की शिक्षा बिना जाति-पाती का भेदभाव किए सबको दी जाएगी।

आज हम इन्ही मूल्यों के लिए लड़ रहे हैं। इन्हीं आदर्शों को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज जब विश्विद्यालय अपनी हट पर अड़ा है क्योंकि जो कुछ हाल-फिलहाल में किया गया है। अगर उस पर जाँच बैठाई जाए तो कई लोग बेनकाब होंगे और हम इस नियुक्ति पर जाँच की माँग कर रहे हैं।

धरने पर बैठे एक दूसरे पीएचडी छात्र ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया, “इस संकाय में शिक्षक नहीं गुरू होते हैं। यहाँ सब चोटी रखते हैं, बड़ों के पैर छूते हैं और हवन-यज्ञ करते हैं। जिस मुस्लिम प्रोफेसर फिरोज खान को नियुक्त किया गया है, उनके फेसबुक अकाउंट पर धर्म के कॉलम में मुसलमान लिखा हुआ है। अगर उन्हें डिपार्टमेंट में जगह दी जाती है तो क्या यह हम वैदिक सनातन परम्पराओं को मानने वाले छात्रों के साथ भेदभाव नहीं होगा।”

यहाँ यह भी बता दें कि डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति पर हो रहे इस विरोध प्रदर्शन के विषय में बीएचयू के प्रवक्‍ता डॉ. राजेश सिंह ने मीडिया के लिए प्रशासन का पक्ष जारी किया है। उन्होंने बताया कि कुलपति की अध्‍यक्षता में चयन समिति की बैठक में विषय विशेषज्ञों ने पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए असिस्‍टेंट प्रोफ़ेसर पद पर डॉ. फिरोज खान को योग्‍य पाया। उन्होंने कहा कि बीएचयू की स्‍थापना इस उद्देश्‍य से की गई थी कि यह विश्‍वविद्यालय धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के भेदभाव से ऊपर उठकर राष्‍ट्र निर्माण के लिए सभी को अध्‍ययन एवं अध्‍यापन के समान अवसर प्रदान करेगा। इस उद्देश्‍य का बीएचयू प्रशासन द्वारा पालन किया जा रहा है।

समझिए पूरा नेक्सस

जबकि संस्कृत विद्या धर्म संकाय के एक पूर्व शोध छात्र सौरभ द्विवेदी ने जो आरोप लगाया वह और भी चौकाने वाला है। पूर्व शोध छात्र सौरभ ने हमें बताया कि साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी हैं। मेरे शोध-निर्देशक हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 5 साल पहले एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में आए। इसके पहले राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के जयपुर कैम्पस में कार्यरत थे। पूर्व संस्था से इनका लगाव भी है और इनके विश्वस्त लोग आज भी वहीं हैं। इनका व्यक्तित्व धनलोलुपता की पराकाष्ठा है। इनकी धनलोलुपता को समझने के लिए इनसे किसी भी विषय पर 15 मिनट बात करना ही पर्याप्त है। अगर इनका वश चले तो BHU के शोधार्थियों के JRF के पैसों में भी अपना हिस्सा निश्चित कर लें।

शोध छात्र ने आगे कहा कि इस नियुक्ति की सारी फिल्डिंग इन्होंने ही सेट की है। 6 महीने पहले से, मेरा मानना है कि अगर निष्पक्ष जाँच हो जाए तो ये रंगे हाथ पकड़े भी जा सकते हैं। इस नियुक्ति का सबसे बड़ा कारण है पैसा। सुरक्षित और गोपनीय ढंग से पैसे लेने के लिए प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी के लिए सबसे उपयुक्त अभ्यर्थी हैं डॉ फ़िरोज खान, जो कि संस्थान के जयपुर कैंपस के छात्र हैं, OBC केटेगरी से हैं। 10 अभ्यर्थियों का साक्षात्कार हुआ उनमें से कई हिन्दू विश्वविद्यालय के भी पूर्व शोधछात्र थे। लेकिन इन 5 वर्षों में विभागाध्यक्ष को किसी पर इतना विश्वास न था कि पैसे की बात चला सकें। विभागाध्यक्ष को इस बात का भी अंदेशा नहीं था कि बस चयनित अभ्यर्थी के मुसलमान होने की वजह से भी विवाद हो सकता है।

इन्होंने इंटरव्यू एक्सपर्ट के रूप में जयपुर के ही एक प्रोफेसर ताराशंकर शर्मा पाण्डेय को बुलाया, जो संभवतः इनके सबसे विश्वस्त और हाँ में हाँ मिलाने वाले मित्र हैं। इनके बारे में मैं अधिक नहीं जानता। दूसरे एक्सपर्ट एक्स प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी को बुलाया गया। विचारधारा के संदर्भ में अवसरवादी रूप से कभी ‘वामपंथी-कॉन्ग्रेसी’ कभी ‘पारंपरिक विद्वान’ कभी संस्कृत साहित्य के ‘आधुनिक समालोचक’ हैं। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में ये राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति रहे हैं। बहुत सारे पदों को अलंकृत कर चुके हैं। इनका वैदुष्य निर्विवाद है। इन्होंने संस्कृत साहित्य को समृद्ध करने के लिए बहुत परिश्रम भी किया है। लेकिन स्याह पक्ष यह है कि इन्होंने अपने सम्पूर्ण विद्वत्ता और पद-प्रतिष्ठा का दुरुपयोग विश्वविद्यालयों में ‘अपने’ लोगों की नियुक्तियों में किया है।

लगभग 20 वर्षों से विश्वविद्यालय स्तर की सभी नियुक्तियों पर इनके ‘गैंग’ का एकाधिपत्य है। संस्कृत के हर संस्थान में इनके नियुक्त किए हुए लोगों का एक नेक्सस है। यह नेक्सस अपने झुण्ड से इतर किसी अन्य को संस्कृत प्रोफेसर बनने की मान्यता नहीं देता। इनकी तुलना एक समय के जाने माने हिन्दी समालोचक से कुछ अंश तक की जा सकती है।

इसी नेक्सस के ये तीनों लोग विद्वान हैं, योग्य हैं। इसलिए इनके द्वारा नियुक्त अभ्यर्थी की योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगाना तार्किक रूप से सामान्य व्यक्ति की दृष्टि में गलत है। और इनका पूरा गैंग किसी भी अपने गुट के व्यक्ति को प्रोफेसर बनने के लिए सर्वाधिक योग्य मानता है, साबित भी करता है। प्रोफेसर उमाकान्त चतुर्वेदी के अध्यक्ष रहते यह नियुक्ति बिना पैसे के नहीं हो सकती थी, लेकिन यह अभ्यर्थी एक ‘हिन्दू OBC’ होता तो विरोध नहीं होता, यह बात भी सच है। दिलचस्प यह भी है कि सरकार किसी की भी हो विश्वविद्यालय की नियुक्तियाँ एक विशिष्ट विचारधारा (वामपंथी) के लोग ही करते हैं।

चौथे व्यक्ति हैं संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय प्रमुख (डीन) प्रोफेसर विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र। विद्वान सीधे सादे।
अंतिम में हैं प्रोफेसर राकेश भटनागर जो कि हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। JNU के प्रोफेसर हैं और लोग इन्हें वैचारिक रूप से वामपंथी मानते हैं। कभी एक छोटे से राज्य के विश्वविद्यालय के कुलपति रहे, न चला पाने के कारण पद छोड़ दिया था। आज भारी भरकम विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। इतने से तो आप समझ सकते हैं कि यहाँ दाल में काला नहीं है बल्कि पूरी दाल ही काली है।

चलते-चलते यह भी बता दूँ की ऊपर दिए गए बयान कितना सही है इसकी भनक संस्कृत संकाय के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उमाकांत चतुर्वेदी की इस बातचीत से भी चल जाता है, “संस्कृत विद्या धर्म संकाय के इस पोस्ट के लिए 29 लोगों ने फॉर्म भरे थे, जिसमें से 10 लोगों का इंटरव्यू के लिए सेलेक्शन हुआ था। इंटरव्यू के दिन 9 लोग ही हाजिर हुए। उन 9 लोगों में चयनित हुआ अभ्यर्थी सबसे ज्यादा योग्य था। बाकी अभ्यर्थियों को 10 में से 0 और 2 नंबर मिले तो चयनित अभ्यर्थी को 10 नंबर मिले।”

अब शायद आपको छात्रों की बातों में दम दिख सकता है। फिलहाल अभी की स्थिति यह है की कुलपति आवास के बाहर धरना जारी है विश्वविद्यालय ने कोई कार्रवाई नहीं की है। संस्कृत के छात्र दिन रात वहाँ प्रदर्शन कर रहे हैं अब देखना यह है कि पूरी प्रक्रिया का अंजाम क्या होता है? क्या विश्वविद्यालय मालवीय जी की थाती और मूल्यों के प्रति अपनी सजगता दिखाता है? या केवल आज के अपने हट की वजह से आने वाले समय में ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ की नींव में खुद ही मट्ठा डालने का काम करता है?

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