Friday, November 27, 2020
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राहुल गाँधी ने मोदी के लिए कहा ‘डंडे मारेंगे’, समुदाय विशेष ने धुनिया बन कॉन्ग्रेस को धुना

नतीजों ने साफ कर दिया है कि सामान्य मुस्लिमों की नजर में अब कॉन्ग्रेस और उसके नेतृत्व की साख नहीं बची है। यही कारण है कि उन 16 सीटों पर जहॉं 15 से 50 फीसदी मुस्लिम आबादी है 12 आप के पास चली गईं। 4 पर भाजपा जीत गई। बीजेपी का वोट 2015 के 32.7 फीसदी से बढ़कर 38.51 फीसदी हो गया।

गोपालदास ‘नीरज’ ने लिखा है;
ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी
हालत यही है आजकल हिन्दुस्तान की

कहार की जगह भारतीय सियासत के वोट बैंक (मुस्लिमों) और दुल्हन की जगह कॉन्ग्रेस को रख दें तो ऐसा लगता है कि कभी जो पंक्तियॉं हिन्दुस्तान के नाम लिखी गई थी, वह देश की सबसे पुरानी पार्टी के हाल पर बिल्कुल फिट बैठती है। इस वोट बैंक के लिए कॉन्ग्रेस ने क्या-क्या नहीं किए। शाहबानो से इंसाफ छीन लिया। अयोध्या में जन्मभूमि से राम की मूर्ति हटवानी चाही। गॉंधी की प्रतिमा से किनारा कर कश्मीर को जिहाद की आग में जलने दिया। सियासत में टोपी और चादर का रंग घोला। देश के संसाधनों पर पहला हक उनका बताया। बहुसंख्यकों की भावनाओं को बार-बार लात मारी। काल की गति देखिए उसी वोट बैंक ने दिल्ली में 15 साल तक सरकार चलाने वाली कॉन्ग्रेस को अब की दफन कर दिया।

असल में 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा के नतीजों को अगर सीटों के लिहाज से देखेंगे तो कुछ हाथ नहीं आएगा। क्योंकि, 2015 के विधानसभा चुनावों में भी कॉन्ग्रेस 0 थी, आज भी 0 है। लेकिन, जब वोट शेयर के हिसाब से इन नतीजों को समझेंगे तो एहसास होगा कि यह आप के पक्ष में प्रचंड जनादेश नहीं है, जिस तरह इसे प्रचारित किया जा रहा। इसका विकास से कोई लेना-देना नहीं है। न ही यह फ्री बिजली-पानी की राजनीति पर मुहर है। असल में यह ध्रुवीकरण की जीत है। बिना लड़े हथियार डालने की राजनीति का फलाफल है। ध्रुवीकरण से न केवल वोटों में कॉन्ग्रेस की हिस्सेदारी सिमट कर पॉंच फीसदी से कम हो गई है, बल्कि उसके 66 उम्मीदवारों में से 63 की जमानत जब्त हो गई।

2015 में भले कॉन्ग्रेस का खाता नहीं खुला था, लेकिन उसे 9.7 फीसदी वोट मिले थे। उस चुनाव में उसके परंपरागत वोटरों का बड़ा तबका आप के साथ चला गया था, जिसकी वजह से 70 में से 67 सीटें आप को मिली। सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रहने पर एंटी इंकबेंसी फैक्टर के कारण अमूमन ऐसा होता है। लेकिन, समय के साथ ऐसे वोटर फिर पुरानी पार्टी की ओर लौट जाते हैं। इसका एहसास 2017 के दिल्ली नगर निगम के चुनावों और 2019 के आम चुनावों में हुआ भी था। निगम चुनावों में कॉन्ग्रेस को 21.1 फीसदी वोट मिले थे और वोट शेयर के लिहाज से आप से वह केवल पॉंच फीसदी पीछे रह गई थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने करीब 22.5 फीसदी वोट हासिल किए जो आप से करीब साढ़े चार फीसदी ज्यादा थे।

लेकिन, विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। कॉन्ग्रेस इस चुनाव में कहीं नजर नहीं आई। न प्रचार में और नतीजों की तो पूछिए मत। गौर करने की बात यह है कि राजनीति में चुनावी परिदृश्य से गायब होना खुदकुशी मानी जाती है। कुछ जानकार मानते हैं कि मोदी को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने खुद यह चुनाव किया। लेकिन, कॉन्ग्रेस को यह याद रखना चाहिए था कि दिल्ली की सत्ता में आप उसे हराकर आई न कि बीजेपी को। इसलिए यह बीजेपी से अधिक कॉन्ग्रेस की साख का सवाल था। लेकिन, दिवंगत हो चुकी शीला दीक्षित की तस्वीर लगाकर प्रचार करने वाली कॉन्ग्रेस ने प्रदेश में पार्टी का प्रभार उस पीसी चाको के ही हाथों में छोड़ रखा था जो लोकसभा चुनाव के पहले भी पार्टी को आप की पिछलग्गू बनाना चाहते थे। फिर चुनाव के दौरान उसके समर्पण और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी के बयानों ने उसे दफन ही कर दिया। राहुल गॉंधी ने 6 फरवरी की रैली में कहा, “ये जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, 6 महीने बाद ये घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे…”

राहुल भूल गए कि कॉन्ग्रेस दिल्ली का विधानसभा चुनाव लड़ रही थी, जहॉं वह आप से मुकाबिल थी। इसका असर यह हुआ कि निगम और आम चुनावों में कॉन्ग्रेस की ओर वोटरों के लौटने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह थम गया। नतीजतन, उसके ज्यादातर उम्मीदवार कुल वैध मतों का छठा भाग भी हासिल नहीं कर पाए जो जमानत बचाने के लिए जरूरी होता है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा की बेटी शिवानी चोपड़ा की कालकाजी सीट से जमानत जब्त हो गई। प्रचार समिति के अध्यक्ष कीर्ति आज़ाद की पत्नी पूनम आजाद भी संगम विहार से जमानत नहीं बचा पाईं। उन्हें केवल 2,604 वोट यानी मात्र 2.23 फीसदी वोट ही मिले।

पॉंच मुस्लिम चेहरों को टिकट देने के बावजूद इस बिरादरी ने भी ‘हाथ’ का साथ देना गॅंवारा नहीं किया। कॉन्ग्रेस के पॉंचों मुस्लिम उम्मीदवार जमानत गॅंवा बैठे। सीलमपुर से मतीन अहमद को 15.61 फीसदी वोट मिले। 2013 के विधानसभा में यहॉं कॉन्ग्रेस कैंडिडेट को 46.52 और 2015 में 21.28 फीसदी वोट मिले थे। ओखला सीट, जिसमें शाहीन बाग आता है कॉन्ग्रेस के परवेज हाशमी महज 2.6 फीसदी वोट ही ला पाए। यहॉं 2013 में कॉन्ग्रेस को 36.34 तो 2015 में 12.08 फीसदी वोट मिले थे। बल्लीमारान से हारून युसूफ 4.73 फीसदी वोट मिले हैं। 2013 में उन्हें 36.18 तो 2015 में 13.80 फीसदी वोट मिले थे। कॉन्ग्रेस के दो अन्य मुस्लिम उम्मीदवारों मुस्तफाबाद से अली मेहदी को 2.89 तो मटियामहल से मिर्जा जावेद को 3.85 प्रतिशत वोट मिले हैं। इन सीटों पर क्रमशः 2013 में 38.24, 27.68 तो 2015 में 31.68 तथा 26.75 फीसदी वोट मिले थे। कुछ इसी तरह चांदनी चौक और बाबरपुर की सीट जहॉं अच्छी-खासी संख्या में मुस्लिम वोटर हैं, कॉन्ग्रेस कैंडिडेट को क्रमश: 5.03 और 3.59 फीसदी वोट ही मिले हैं।

वैसे, मुस्लिम मतदाताओं के ध्रुवीकरण का अंदाजा 8 फरवरी को ही लग गया था। दिल्ली के अन्य हिस्सों में मतदान धीमा था लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों में सुबह से ही लंबी कतारें लगी थी। सीलमपुर में तो रिकॉर्ड मतदान हुआ। लेकिन, नतीजों ने साफ कर दिया है कि सामान्य मुस्लिमों की नजर में अब कॉन्ग्रेस और उसके नेतृत्व की साख नहीं बची है। यही कारण है कि उन 16 सीटों पर जहॉं 15 से 50 फीसदी मुस्लिम आबादी है 12 आप के पास चली गईं। 4 पर भाजपा जीत गई। उन दर्जनभर सीटों पर जहॉं कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार अपने बलबूते मजबूती से लड़ रहे थे वहॉं भी प्रचार के दौरान साथ दिखने वाले लोगों ने मतदान के दिन कॉन्ग्रेस से किनारा कर लिया। यह मुमकिन केवल कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के सरेंडर से हुआ। इसका ही नतीजा है कि बीजेपी का वोट 2015 के 32.7 फीसदी से बढ़कर 38.51 फीसदी हो गया। इनमें एक बड़ा हिस्सा उन वोटरों का है जिसने 1998, 2003 और 2008 के विधानसभा चुनावों में बड़े उत्साह से कॉन्ग्रेस के लिए वोट किया था।

अब कॉन्ग्रेस के इस आत्मघाती कदम को भाजपा को रोकने के नाम पर जोर-शोर से प्रचारित किया जाएगा। लेकिन, खुदकुशी से पहले कॉन्ग्रेस को याद रखना चाहिए था कि राजनीति में जीत से ज्यादा बड़ा सत्य जमीन पर दिखना है। दिल्ली की राजनीति में कॉन्ग्रेस ने यह जमीन खो दी है। वह उस जगह पर पहुॅंच गई जहॉं से मुख्य लड़ाई में लौटना उसके लिए मुमकिन नहीं दिखता।

इस नियति को कॉन्ग्रेस ने खुद चुना है। उसने अतीत के अपने अनुभवों से नहीं सीखा है। वरना वह समझ सकती थी कि इसी तरह के सरेंडर ने यूपी और बिहार में उसे साफ किया। लेकिन, शीर्ष नेतृत्व की मोदी घृणा ने उसे इतना कुंठित कर रखा है कि अब वह आप की जीत में ही अपने लिए संभावनाएँ तलाश रही है। यही कारण है कि नतीजों के बाद चाको ने कहा, “इस चुनाव में दिल्ली की जनता ने ध्रुवीकरण की राजनीति करने तथा करंट लगाओ और गोली मारने की बात करने वाली बीजेपी को जिस तरह से खारिज किया है और विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह को करारी शिकस्त दी है हम उसका स्वागत करते हैं।”

शायद इसी दिन की कल्पना कर गोपालदास ‘नीरज’ ने लिखा होगा,
औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद हो
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की

लेकिन कॉन्ग्रेस चाहे तो प्रेरणा भी गोपालदास ‘नीरज’ के ही लिखे से ले सकती है। उन्होंने यह भी कहा है,
हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो
आ जाएगी जमीन पे छत आसमान की

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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