Thursday, January 28, 2021
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मी लॉर्ड ने बख्श दिया पर राहुल गाँधी को मन से माफ नहीं कर पाएँगे कॉन्ग्रेसी

केंद्र में सरकार बनाने के लिए जरूरी आँकड़ा है 272। शायद कम ही लोग जानते हों कि भाजपा ने ठीक इतनी ही सीटें राहुल गॉंधी के सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर 'चौकीदार चोर है' कहने से लेकर माफी मॉंगने तक जीत लिए थे।

2019 के आम चुनावों का बिगुल तो 10 मार्च को चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही बज गया था। लेकिन, असली खेल शुरू हुआ था इसके ठीक एक महीने बाद जब 10 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर केंद्र सरकार की प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज कर दिया। अगले दिन पहले चरण की वोटिंग होनी थी। लिहाजा, कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गॉंधी (जिनके लिए वामपंथियों का मानना था कि प्रधानमंत्री पद की शपथ बस वक्त की बात है) ने सुप्रीम कोर्ट के इस कदम को हाथोंहाथ लिया। अमेठी के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर के दफ्तर के बाहर दिन के करीब डेढ़ बजे मीडिया से राहुल गॉंधी बोले,

सुप्रीम कोर्ट ने क्लियर कर दिया है कि चौकीदार जी ने चोरी करवाई है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि राफेल मामले में कोई न कोई करप्शन हुआ, कोई न कोई भ्रष्टाचार हुआ है।

इसके बाद बिहार जाकर भी उन्होंने यह बयान दोहराया। 12 अप्रैल को भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी ने राहुल गॉंधी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहीं भी ‘चौकीदार चोर है’ शब्द का प्रयोग नहीं किया, लेकिन राहुल गॉंधी शीर्ष अदालत का हवाला देकर कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चौकीदार चोर है।

असल में, 2018 के आखिर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों के नतीजों से उत्साहित राहुल सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले ही ‘चौकीदार चोर है’ कैंपेन चला रहे थे। पत्रकार संतोष कुमार ने अपनी किताब ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय’ में लिखा है कि इस अभियान से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद आहत थे। इसके बाद पीएम की प्रोफेशनल टीम ने इस नारे और राफेल को लेकर राहुल के आरोपों पर लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए सर्वेक्षण किया। फीडबैक से पता चला कि इस नारे को लेकर लोगों में बेहद नाराजगी है। खासकर, बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर में। इसके बाद भाजपा ने 16 मार्च को ‘मैं भी चौकीदार’ कैंपेन लॉन्च किया।

संतोष कुमार की माने तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी कर राहुल गॉंधी ने भाजपा को एक और मौका ही दिया। लेखी की याचिका पर सुनवाई करते हुए 15 अप्रैल को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने स्पष्ट कर दिया कि कोर्ट की टिप्पणियों को राहुल गॉंधी ने मीडिया और जनता के बीच गलत ढंग से पेश किया। कोर्ट ने राहुल से उनके बयान के लिए स्पष्टीकरण मॉंगा। कोर्ट की यह टिप्पणी दूसरे चरण की वोटिंग से ठीक पहले आई थी। तीसरे चरण की वोटिंग से एक दिन पहले 22 अप्रैल को राहुल गॉंधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया। उन्होंने राजनीतिक सरगर्मी का हवाला देकर अपने बयान का बचाव करने की कोशिश की और बयान के लिए खेद जताया। लेकिन, लेखी ने 23 अप्रैल को स्पष्ट रूप से माफी नहीं मॉंगने पर आपत्ति जताई। जवाब में राहुल गॉंधी के वकील ने कहा कि कोर्ट ने उनसे केवल स्पष्टकीरण मॉंगा था। इस पर नाराजगी जताते हुए सीजेआई गोगोई ने कहा, “कोर्ट ने जो पहले नहीं किया अब कर रही है। हम आपको नोटिस जारी कर रहे हैं। हम आपके पूर्व के जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। नोटिस का जवाब दीजिए।”

बावजूद इसके राहुल नहीं सॅंभले। उन्होंने चौथे चरण की वोटिंग के दिन 29 अप्रैल को दूसरा हलफनामा दायर किया। पुरानी गलती दोहराई। हलफनामे में कुछ हेरफेर के साथ खेद ही जताया। इसके बाद 30 अप्रैल को सीजेआई गोगोई ने उन्हें कड़ी फटकार लगाई और राहुल यह कहने को मजबूर हुए कि ‘चौकीदार चोर है’, कॉन्ग्रेस का मोदी के खिलाफ राजनीतिक नारा है। कोर्ट ने कहा कि उसकी दिलचस्पी उनके पॉलिटिकल स्टैंड में नहीं है। राहुल की ओर से तत्काल मौखिक माफी मॉंगते हुए नया हलफनामा दायर करने की अनुमति मॉंगी गई। फिर 8 मई को (12 मई को छठे चरण की वोटिंग थी) राहुल गॉंधी ने तीसरा हलफनामा दायर कर साफ शब्दों में माफी मॉंगी। 10 मई को कहा कि उन्होंने बिना शर्त माफी मॉंग ली है और अदालत से आग्रह करते हैं कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई बंद कर दी जाए। लेकिन, लेखी कार्रवाई को लेकर अड़ी रहीं।

गुरुवार यानी 14 नवंबर को सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने भविष्य में ऐसी बयानबाजी से बचने की नसीहत देते हुए अवमानना याचिका खारिज कर दी। जस्टिस कौल ने कहा, “कोर्ट को राजनीतिक बयानबाज़ी में नहीं घसीटा जा सकता।” दिलचस्प संयोग है कि गुरुवार को इसी पीठ ने राफेल मामले में समीक्षा याचिकाएँ भी खारिज कर दी। इन्हीं याचिकाओं को जब अदालत ने सुनवाई के लिए मंजूर किया था तो राहुल गॉंधी ने वह बयान दिया था, जिस पर बीजेपी ने करीब-करीब पूरा चुनाव खींच दिया था।

उल्लेखनीय है कि सात चरणों में आम चुनाव के लिए वोटिंग हुए थे। 11 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग से एक दिन पहले यह मामला शुरू हुआ था और राहुल का तीसरा हलफनामा छठे चरण से बस चंद दिन पहले ही दाखिल हुआ था। इसका कितना नुकसान कॉन्ग्रेस को हुआ इसका अंदाजा इन आँकड़ों से लगाया जा सकता है। ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय ‘ के मुताबिक भाजपा को पहले चरण की 91 में से 31, दूसरे चरण की 96 में से 38, तीसरे चरण की 115 में से 67, चौथे चरण की 71 में से 49, पॉंचवें चरण की 51 में से 42 और छठे चरण की 59 में से 45 सीटें मिली थी। यानी, बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों का आँकड़ा तो भाजपा ने राहुल के एक नारे से ही जुटा लिया था।

उस भूल के लिए अब सुप्रीम कोर्ट ने भी राहुल गॉंधी को बख्श दिया है। मोदी और भाजपा ने तो शायद आम चुनावों के नतीजों के बाद ही माफ कर दिया हो। लेकिन, क्या वे कॉन्ग्रेसी और वामपंथी राहुल गाँधी को कभी मन से माफ कर पाएँगे जिनके सपने में वे आज भी शपथ लेते रहते हैं?

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

 

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