Friday, April 16, 2021
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​आतंकियों के जिस एनकाउंटर पर रोईं सोनिया, उसमें सिब्बल के सामने हुई थी पुलिस की पेशी

करनाल सिंह ने अपनी पुस्तक में खुलासा किया है कि पुलिस द्वारा मीडिया को एक-दो बार ब्रीफ करने के बाद, उन्हें, जो कि उस समय स्पेशल सेल में संयुक्त पुलिस आयुक्त थे, को पुलिस आयुक्त से एक कॉल आई कि गृह मंत्रालय नहीं चाहता कि आगे से वह इस जाँच की कोई भी जानकारी मीडिया ब्रीफिंग में दें।

बाटला हाउस एनकाउंटर (सितंबर 19, 2008) पर पूर्व आईपीएस अधिकारी करनाल सिंह ने एक किताब लिखी है। नाम है- बाटला हाउस: एन एनकाउंटर दैट शुक द नेशन। इस एनकाउंटर के वक्त सिंह दिल्ली पुलिस के संयुक्त पुलिस आयुक्त थे और इस ऑपरेशन को लीड किया है।

उनकी पुस्तक ने इस एनकाउंटर को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने एनकाउंटर को तुष्टिकरण, वोट बैंक की राजनीति, मीडिया टीआरपी और षड्यंत्र के लिए प्रभावित किया था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को समझाना पड़ा था कि बाटला हाउस एनकाउंटर वास्तविक था।’

गृह मंत्रालय ने दिए थे मीडिया से बात ना करने के आदेश

अपनी पुस्तक ‘Batla House: An Encounter That Shook the Nation’ में करनाल सिंह ने बताया है कि दिल्ली पुलिस ने बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसके बाद गृह मंत्रालय ने निर्देश दिया था कि जाँच की प्रगति के बारे में मीडिया को और जानकारी न दी जाए।

1984 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी करनाल सिंह वर्ष 2018 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे। करनाल सिंह ने वर्ष 2008 में दिल्ली में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों की जाँच की थी। उन्होंने लिखा है कि आतंकवाद से निपटने के लिए एक राजनीतिक सहमति की कमी ने इसे निपटने के लिए कठोर नीतियाँ बनाना मुश्किल बना दिया था।

सितंबर 19, 2008 को दिल्ली के जामिया नगर में हुई मुठभेड़ के बारे में कई अन्य जानकारियाँ शामिल की है। बाटला हाउस एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के दो आतंकवादी मारे गए थे। इसके साथ ही, बाटला हाउस इलाके में पुलिस की कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा ने भी इस ऑपरेशन के दौरान अपनी जान गँवाई थी।

करनाल सिंह ने अपनी पुस्तक में खुलासा किया है कि पुलिस द्वारा मीडिया को एक-दो बार ब्रीफ करने के बाद, उन्हें, जो कि उस समय स्पेशल सेल में संयुक्त पुलिस आयुक्त थे, को पुलिस आयुक्त से एक कॉल आई कि गृह मंत्रालय नहीं चाहता कि आगे से वह इस जाँच की कोई भी जानकारी मीडिया ब्रीफिंग में दें।

UPA सरकार को अल्पसंख्यकों की नाराजगी का था डर

करनाल सिंह ने किताब में एनकाउंटर के जुड़े पहलुओं की आँखों देखी जानकारी दी है। वे लिखते हैं, “राजनीतिक गलियारों के कुछ वर्ग अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित आतंकवादियों के खिलाफ सामने आ रहे तथ्यों से परेशान थे। मैंने तर्क दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और पुलिस अधिकारियों के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम अपने विश्वास के बावजूद आतंकवादियों का नेतृत्व करें और उन्हें गिरफ्तार करें।”

करनाल सिंह के अनुसार, मीडिया जानकारी माँग रही थी, लेकिन उनके साथ जाँच की जानकारी ना देने के सख्त आदेश थे। उन्होंने लिखा है कि वहाँ अराजकता थी और दिल्ली पुलिस ‘परसेप्शन’ की लड़ाई हार रही थी। उन्होंने लिखा है कि बाटला हाउस मुठभेड़ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक ऐतिहासिक घटना बन गई।

सिंह ने लिखा, “इसने आईएम को एक महत्वपूर्ण झटका दिया, क्योंकि इसमें उनके प्रमुख सदस्य मारे गए और भारत में उनके नेटवर्क की रीढ़ टूट गई। हमने सबसे बुद्धिमान और बहादुर अधिकारियों में से एक को खो दिया, जिसके निष्कर्षों ने हमें मुख्य आईएम सदस्यों तक पहुँचाया था।”

उन्होंने कहा कि इस मामले ने एक राजनीतिक तूफान ला दिया, स्पेशल सेल अधिकारियों के खिलाफ एक ‘व्हिच हंटिंग’ जारी की गई। जनता की अलग-अलग राय और मीडिया ने इसे हमेशा के लिए एक विवादास्पद विषय बना दिया, जो आज तक जारी है।

इस पुस्तक में लिखा गया है कि बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद सभी मोर्चों से सरकार पर दबाव बढ़ रहा था। दिल्ली में सीरियल ब्लास्ट हुए थे और सरकार पर आरोप लगाया जा रहा था कि वह आतंकवाद के प्रति नरम है।

‘मजहब के खिलाफ साजिश’

करनाल सिंह लिखते हैं, “इसके बाद 14 अक्टूबर को एनकाउंटर को एक नया आयाम दिया गया जब भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के कुछ वरिष्ठ राजनेताओं ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मिलने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया। एनकाउंटर को ‘समुदाय विशेष के साथ अन्याय’ बताते हुए इसकी न्यायिक जाँच की माँग की गई।”

इसके बाद करनाल सिंह को दिल्ली के तत्कालीन लेफ्टिनेन्ट गवर्नर तेजेंद्र खन्ना का फोन आया और उन्होंने कहा कि कपिल सिब्बल, जो कि एक केंद्रीय मंत्री थे, मुठभेड़ से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना चाहते थे। खन्ना ने सिंह को ‘तैयार होकर आने’ की सलाह दी थी।

करनाल सिंह लिखते हैं कि सिब्बल ने उन्हें मीडिया सहित कई विभिन्न मुद्दों के बारे में बताने के लिए कहा और उन्होंने हर मुद्दे पर जवाब दिया और पुलिस के पास उपलब्ध सभी सूचनाओं को सिब्बल से शेयर किया।

करनाल सिंह के अनुसार, दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल के घर पर कैबिनेट मंत्री कपिल सिब्बल को एनकाउंटर के सारे तथ्य दिखाए गए। इन तथ्यों से तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को भी अवगत कराया गया। बाद में एक मुलाकात में मनमोहन सिंह ने खुद उन्हें बेहतरीन जाँच के लिए बधाई दी।

जामिया के किसी भी गवाह को नहीं थी जानकारी, तब भी दी गवाही

सिंह कहते हैं कि बाटला हाउस मुठभेड़ को एक सार्वजनिक मुकदमे में रखा गया था। पुस्तक के अनुसार, अक्टूबर 12, 2008 को जामिया मिलिया इस्लामिया के शिक्षकों के एक समूह ने एक जन सुनवाई की। जूरी में राजनेता और कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, मानवाधिकार राजनीतिक कार्यकर्ता जॉन दयाल और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तृप्ता वाही, विजय सिंह और निर्मलंगशु मुखर्जी शामिल थे। करनाल सिंह आगे लिखते हैं कि जामिया के दर्जनों निवासियों ने उस बैठक में गवाही दी। बाद में जूरी ने अपने निष्कर्ष दिए, जो बात पहले से ही मीडिया के कुछ हिस्सों में कही जा रही थी। हमारे विभाग द्वारा पहले से ही इन बातों के जवाब दे दिए गए थे।

वह लिखते हैं कि जन सुनवाई के निष्कर्ष बेकार थे। जिन लोगों को इसमें शामिल किया गया था, उनमें से किसी को भी घटना की जानकारी नहीं थी। यही कारण है कि उनमें से कोई भी बाद में इन गवाही को शेयर करने के लिए आगे नहीं आया या उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में कोई हलफनामा नहीं दिया।

बाटला हाउस एनकाउंटर पर रोई थीं सोनिया गाँधी

फरवरी 2012 में आजमगढ़ में एक रैली को संबोधित करते वक्त कॉन्ग्रेस नेता और तत्‍कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर का जिक्र करते हुए कहा था कि जब उन्होंने इसकी तस्वीरें सोनिया गाँधी को दिखाई, तब उनकी आँखों में आँसू आ गए और उन्होंने पीएम से बात करने की सलाह दी थी।

फरवरी 2020 में दिल्ली की एक चुनावी रैली को सम्बोधित करते हुए पीएम मोदी ने भी कहा था कि जो लोग बाटला हाउस के आतंकवादियों के लिए रोते हैं, वो दिल्ली का विकास नहीं कर सकते।

अक्टूबर, 2008 को तृणमूल कॉन्ग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी कहा था कि यह एक फर्जी एनकाउंटर था। ममता ने यहाँ तक कहा था कि अगर वो गलत साबित हुई तो राजनीति छोड़ देंगी।

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह शुरू से ही बटला हाउस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते रहे। वास्तव में, इस मुद्दे की राजनीतिकरण की शुरुआत उन्होंने ही की थी।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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