Saturday, September 18, 2021
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हलाल मीट हिंदू-सिख के लिए वर्जित, होटलों-मीट की दुकानों को लगाना होगा बोर्ड: SDMC का प्रस्ताव पास

हिंदू और सिख के लिए हलाल मीट खाना वर्जित है। दिल्ली के ऐसे होटल या मीट की दुकान जो SDMC (दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन) के अंतर्गत आते हैं, उन्हें अब हलाल या झटका बोर्ड टाँग कर रखना जरूरी होगा।

मीट या चिकन आप हलाल खा रहे हैं या झटका? होटलों में शायद ही पता चलता है। लेकिन अब नहीं! दिल्ली के ऐसे होटल या मीट की दुकान जो SDMC (दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन) के अंतर्गत आते हैं, उन्हें अब हलाल या झटका बोर्ड टाँग कर रखना जरूरी होगा।

SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमिटी ने यह प्रस्ताव गुरुवार (24 दिसंबर 2020) को पास कर दिया। इस प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि हिंदू और सिख के लिए हलाल मीट खाना वर्जित है। पास हुआ यह प्रस्ताव अब SDMC सभा में जाएगा, जहाँ भाजपा का बहुमत है।

SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमिटी के अध्यक्ष राजदत्त गहलोत ने बताया कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य ग्राहकों को जानकारी उपलब्ध कराना है कि वो जो खा रहे हैं, वो क्या है। साथ ही उन्होंने कहा, “अभी समस्या यह है कि लाइसेंस किसी और चीज के लिए दिया जाता है और बेचा कुछ और ही जाता है।”

आपको बता दें कि इसके संबंध में छतरपुर काउंसिलर अनिता तँवर ने प्रस्ताव रखा था, जिसे मेडिकल रिलीफ ऐंड पब्लिक हेल्थ पैनल ने 9 नवंबर 2020 को स्टैंडिंग कमिटी के सामने प्रस्तावित किया था।

ईसाइयों ने किया हलाल माँस का विरोध

क्रिसमस से ठीक पहले ईसाइयों ने हलाल माँस का बहिष्कार करने का फैसला किया है। ईसाई समुदाय के इस फैसले को हिंदू समूहों ने भी अपना समर्थन दिया है। उनका कहना है कि राज्य में हिंदू धर्म के लोग हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर हैं। क्रिश्चियन एसोसिएशन CASA ने ईसाइयों से अपील की है कि हलाल भोजन को अब उनकी खाने की टेबल पर नहीं लाया जाना चाहिए।

ईसाई समुदाय का कहना है कि ईसा मसीह के जन्मदिन पर हलाल माँस क्यों खाना चाहिए? इस विवाद पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। हिंदू समूहों का दावा है कि ईसाई और हिंदू दोनों को हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर किया जाता है।

हलाल मतलब जिहाद और आतंक

किसी भी भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए- जिसे वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के ही बराबर मानते हैं, क्योंकि हमारे पास यह जानने का कोई ज़रिया नहीं है कि ज़कात के नाम पर गया पैसा ज़कात में ही जा रहा है या जिहाद में। और जिहाद काफ़िर के खिलाफ ही होता है- जब तक यह इस्लाम स्वीकार न कर ले!

यानी जब कोई गैर-मुस्लिम हलाल वाला भोजन खरीदता है, तो वह उसका एक हिस्सा अपने ही खिलाफ होने जा रहे जिहाद को आर्थिक सहायता देने में खर्च करता है। इसे वह ‘हलालो-नॉमिक्स’ यानी हलाल का अर्थशास्त्र कहते हैं। “हलालो-नॉमिक्स का अर्थ है आप अपनी सुपारी खुद दे रहे हैं।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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