सोमनाथ मंदिर के रेनोवेशन के बाद मई 1951 में उद्घाटन कार्यक्रम के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बुलाया गया था। हमने पिछले हिस्से में देखा कि कैसे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इतना हंगामा किया कि राष्ट्रपति खुद कार्यक्रम में जाएँ, फिर भी राजेंद्र प्रसाद कार्यक्रम में शरीक हुए। सोमनाथ मामले को लेकर नेहरू के कुछ और लेटर देखते हैं।
सोमनाथ मंदिर का प्रोग्राम पास आ रहा था। इसी बीच, अप्रैल 1951 में, ट्रस्ट के अध्यक्ष जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा ने कुछ पड़ोसी देशों में इंडियन एम्बेसी को लेटर लिखकर वहाँ की नदियों का पानी भेजने का आग्रह किया। इनका इस्तेमाल उद्घाटन के मौके पर किया जाना था। ‘सेक्युलर’ जवाहरलाल ने इस पर एतराज जताया। दर्द इतना ज़्यादा था कि नेहरू ने एक साथ कई लेटर फाड़ दिए।

नेहरू आगे कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आता कि हम इस बात की चिंता क्यों नहीं करते कि दूसरे हमारे कामों, हमारी एक्टिविटीज के बारे में क्या सोचते हैं।’ वे आगे कहते हैं, ‘मुझे यह भी समझ नहीं आता कि चीन से नदी का पानी भारत कैसे लाया जाएगा? मैं इन सब से बहुत परेशान हूँ।’ चिट्ठी में आगे नेहरू मुंशी से पूछते हैं कि अगर ऐसी चिट्ठियाँ दूसरे उच्चायोग को भेजी गई हैं तो उन्हें बताया जाए, ताकि वे उन्हें भी चिट्ठी लिख सकें।
अगर आप इस चिट्ठी को देखें, तो यह साफ है कि पहले प्रधानमंत्री को एक हिंदू मंदिर के जीर्णोद्धार से ज्यादा इस बात की चिंता थी कि कोई दूसरा देश क्या सोचेगा। वे कहते रहते थे कि तुम ऐसा मत करो, नहीं तो दूसरे देश हमारे बारे में क्या सोचेंगे। मोदी जैसे युगपुरुष की तुलना नेहरू जैसे व्यक्ति से नहीं हो सकती। ऐसा इरादा भी नहीं है, क्योंकि अब तो विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी मंदिरों में जाने लगे हैं। मोदी के आने के बाद यह बदलाव आया है।

सौराष्ट्र सरकार के पाँच लाख के फंड खर्च करने पर दिक्कत
अब बात करते हैं पाँच लाख के फंड की। नेहरू इस बात से परेशान थे कि सौराष्ट्र सरकार (उस समय गुजरात नहीं था) इस प्रोग्राम पर खर्च क्यों कर रही थी। जवाहरलाल ने इस गुस्से में कई चिट्ठियाँ लिखी थीं।
21 अप्रैल को सौराष्ट्र के उस समय के मुख्यमंत्री यू. एन. ढेबर को लिखे एक लेटर में नेहरू कहते हैं कि उन्हें खबरों से पता चला कि सौराष्ट्र सरकार ने सोमनाथ मंदिर में उद्घाटन कार्यक्रम के लिए 5 लाख की रकम मंजूर की है।
नेहरू कहते हैं, ‘मैं यह पढ़कर हैरान रह गया और मैं जानना चाहता हूँ कि क्या यह सच है। सोमनाथ मंदिर की जो भी अहमियत हो, यह सरकार का काम नहीं है और मंदिर के लिए पैसे इकट्ठा करना गैर-सरकारी लोगों का काम है। मुझे नहीं लगता कि आम लोगों के पैसे का सही इस्तेमाल हो रहा है।’
22 अप्रैल को नेहरू ने उस समय के जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा को एक चिट्ठी लिखी। पत्र में नेहरू बिना किसी औपचारिकता के सीधे अपनी बात शुरू की।

नेहरू कहते हैं, ‘मैं सोमनाथ मंदिर में होने वाले इस प्रोग्राम को लेकर बहुत परेशान हूँ। अगर यह कोई पर्सनल/प्राइवेट मामला होता तो ठीक था, लेकिन ऐसी बातें फैल रही हैं कि सरकार भी इसमें शामिल है। कुछ लोगों को लगता है कि भारत सरकार भी इसमें शामिल है और सौराष्ट्र सरकार को 100 परसेंट ऐसा लगता है। खबरों में कहा गया है कि सौराष्ट्र सरकार इस प्रोग्राम के लिए पाँच लाख रुपए खर्च करेगी।’
नेहरू के मुताबिक, ‘जहाँ तक भारत सरकार की बात है, मैं पार्लियामेंट में साफ-साफ कह दूँगा कि सरकार का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मुझे सौराष्ट्र सरकार पर शक है और मुझे लगता है कि सरकार होने के नाते उन्हें इसमें शामिल नहीं होना चाहिए और पैसे का खर्च भी गलत है। मैंने चीफ़ मिनिस्टर (ढेबर) को भी बता दिया है।’
यहाँ नेहरू फिर से राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का मुद्दा उठाते हैं। वे लिखते हैं, ‘मेरी दिक्कत यह है कि राष्ट्रपति प्रोग्राम में जा रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि इससे गलत मैसेज जाएगा, लेकिन अब यह उनका पर्सनल मामला है, इसलिए मैं इसमें दखल नहीं देना चाहता।’
इसके बाद, नदियों के पानी के बारे में नेहरू जाम साहेब से कहते हैं, ‘मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि आपने अलग-अलग उच्चायोग से अपनी नदियों का पानी भेजने के लिए कहा था। कुछ उच्चायोग ने इस पर एतराज जताया है और इससे हम मुश्किल में पड़ गए हैं। याद रखें कि आप सिर्फ सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टी ही नहीं हैं, बल्कि सौराष्ट्र के राजप्रमुख भी हैं।’
एक बार फिर नेहरू कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इसमें क्या कर सकता हूँ। लेकिन प्रोग्राम जो भी हो, मुझे यह साफ करना है कि भारत सरकार का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। पाकिस्तान इस मामले का फायदा उठा रहा है और यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि हम ‘सेक्युलर देश’ नहीं हैं। ‘गरीब’ (जवाहरलाल ने यहाँ इंग्लिश में ‘गरीब’ शब्द का इस्तेमाल किया है) अफगानिस्तान को भी इसमें घसीटा जा रहा है।’
खुद नेहरू का लिखा यह लेटर दिखाता है कि नेहरू पाकिस्तान से धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट लेने के लिए कितने बेचैन थे। पहले PM को इस बात की चिंता थी कि अफगानिस्तान से लेकर बर्मा और चीन तक सभी देश क्या कहेंगे, उनकी चिंता सिर्फ सोमनाथ मंदिर के प्रोग्राम की नहीं थी। उनके साथ जो होगा, सो होगा!
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को चिट्ठी
अब बात करते हैं एक जरूरी चिट्ठी की, जो 21 अप्रैल, 1951 को लिखी गई थी। किसे? पाकिस्तान के उस समय के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को ‘मेरे प्यारे नवाबजादा’ कहकर बुलाते हुए, नेहरू लिखते हैं, ‘मैं आम तौर पर रेडियो पाकिस्तान के ब्रॉडकास्ट की तरफ़ आपका ध्यान नहीं खींचता। लेकिन मैंने यह भी कहा है कि कुछ ब्रॉडकास्ट, खासकर पश्तो भाषा में, अक्सर पूरी तरह से झूठे आरोप लगाते हैं। 17 अप्रैल को पेशावर से पश्तो में किया गया ब्रॉडकास्ट इसका एक उदाहरण है और अगर आप इस मामले पर ध्यान देंगे तो मैं आभारी रहूँगा।’

आगे, ‘यह कहानी कि सोमनाथ मंदिर के दरवाजे अफगानिस्तान से भारत लाए जाएँगे, पूरी तरह झूठी है। इसमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है। इसे सार्वजनिक तौर पर मना किया जा चुका है। असलियत यह है कि किसी को नहीं पता कि ऐसे कोई दरवाज़े हैं भी या नहीं और अफ़गानिस्तान से ऐसा कुछ भी भारत नहीं भेजा जा रहा है। फिर भी यह सब पाकिस्तानी प्रेस में चल रहा है। ब्रॉडकास्ट या रिपोर्ट्स कितना सच कह रहे हैं, यह तय करना मैं आप पर छोड़ता हूँ।’
नेहरू इस बात को लेकर कितने परेशान थे कि ‘प्यारे नवाबज़ादा’ का देश क्या सोचेगा, वहाँ का प्रेस क्या कह रहा है। यह लेटर इसका सबूत है।
22 अप्रैल को एक तरफ नेहरू ने जाम साहेब को लेटर भेजा और दूसरी तरफ जाम साहेब का लेटर नेहरू के पास पहुँचा। जाम साहेब ने प्रोग्राम के लिए प्राइम मिनिस्टर को एक औपचारिक आमंत्रण पत्र भेजा था। लेटर के जवाब में, नेहरू ने जाम साहेब को एक और लेटर लिखा। तारीख 24 अप्रैल, 1951।
इसमें नेहरू आमंत्रण के लिए शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं कि वह अभी दिल्ली नहीं छोड़ सकते। फिर प्रोग्राम को लेकर अपना गुस्सा निकालने लगते हैं।
सेक्युलर नेहरू ‘पुनरुत्थान’ से परेशान थे
17 अप्रैल, 1951 को विदेश मंत्रालय के सेक्रेटरी जनरल और विदेश सचिव को भेजे एक नोट में नेहरू लिखते हैं, “मैंने प्रेसिडेंट और मुंशी दोनों से कहा है कि मुझे ये सब एक्टिविटीज़ बिल्कुल पसंद नहीं हैं। क्या विदेश मंत्रालय को पता है कि ऐसे लेटर (नदी के पानी के बारे में) विदेश में हमारी एम्बेसी को भेजे जा रहे हैं? मैं चाहता हूँ कि आप (विदेश मंत्रालय) एम्बेसी को लिखकर बता दें कि वे इन आग्रह पर कोई ध्यान न दें।”

नेहरू ने उसी दिन चीन में भारतीय राजदूत के. एम. पनीकर को एक चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी में PM नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने प्रेसिडेंट से कहा था कि इस प्रोग्राम में शामिल न हों, लेकिन उन्होंने पहले ही न्योता स्वीकार कर लिया था और तब से मैं ज़्यादा दखल नहीं दे सकता था। इसलिए अब मैं उनके दौरे और वहाँ जो कुछ भी हो रहा है, उसे जितना हो सके कम करने की कोशिश कर रहा हूँ।’
17 तारीख को, उस समय के होम मिनिस्टर सी. राजगोपालाचारी को एक और चिट्ठी लिखी गई। इस चिट्ठी में, नेहरू चीन में भारत के राजदूत पनीकर की एक चिट्ठी को कोट करते हैं और कहते हैं, ‘मैं आपका ध्यान उस ओर दिला रहा हूँ, जो उन्होंने (पनीकर) सोमनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। मैं यह सब देखकर परेशान हो रहा हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ। अपनी एम्बेसी को चिट्ठी लिखना और किसी प्रोग्राम के लिए उनकी नदी से पानी माँगना कितना अजीब है!’ इस चिट्ठी में नेहरू इस बात को लेकर भी परेशान दिखते हैं कि बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी क्या कहेगी। नेहरू इस बात को लेकर भी परेशान थे कि पाकिस्तान क्या सोचेगा। इस पर आगे बात होगी।
17 तारीख को केएम मुंशी को एक और लेटर लिखा जाता है। लेटर में नेहरू कहते हैं कि उन्हें चीन में भारतीय एम्बेसडर (पानीकर) का एक लेटर मिला है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों ने उन्हें लिखा है और नदी का पानी भेजने के लिए कहा है। इसका इस्तेमाल मंदिर में धार्मिक समारोहों के लिए किया जाएगा। नेहरू लिखते हैं, ‘इस लेटर ने हमारी एम्बेसी को मुश्किल में डाल दिया है और मैं भी उतना ही परेशान हूँ। अगर किसी और ने यह आग्रह की होती, तो बात अलग होती। अगर सरकार से जुड़े लोग ऐसा लेटर भेजते हैं और उसमें प्रेसिडेंट का नाम भी है, तो इससे विदेश में हमारे लिए शर्मिंदगी वाली स्थिति पैदा होगी।’

नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने इस बारे में आपको पहले भी लिखा है। मैं इस ‘पुनरुत्थान’ से बहुत परेशान हूँ और इस बात से भी कि राष्ट्रपति, कुछ मंत्री और आप राजप्रमुख के तौर पर इस प्रोग्राम में शामिल हो रहे हैं। मुझे लगता है कि यह हमारी सरकार के उसूलों के खिलाफ है। इसके नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर बुरे नतीजे हो सकते हैं। निजी तौर पर, हर कोई जो चाहे कर सकता है, लेकिन हम सार्वजनिक तौर पर ऐसा नहीं कर सकते।’
केएम मुंशी को एक और लेटर लिखा गया।
लेटर में नेहरू लिखते हैं, ‘मैं इस बात से बहुत परेशान हूँ कि सरकार विदेश में सोमनाथ प्रोग्राम से जुड़ी हुई है। इस मामले पर पार्लियामेंट में सवाल उठाए जाएँगे और मैं यह साफ कर दूँगा कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मैं सौराष्ट्र सरकार के बारे में ऐसा नहीं कह सकता, जो इस प्रोग्राम पर पाँच लाख खर्च कर रही है। मुझे लगता है कि इस हालत में सरकार का यह खर्च उठाना पूरी तरह से गलत है।’
जामसाहेब पर अप्रत्यक्ष आरोप
जामसाहेब का जिक्र करते हुए नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने इस मामले पर प्रेसिडेंट और जामसाहेब को लेटर लिखे हैं। जामसाहेब न सिर्फ सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों के चेयरमैन हैं, बल्कि सौराष्ट्र के राजप्रमुख भी हैं।’ यहाँ नेहरू जामसाहेब पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि उन्होंने एम्बेसी को जो लेटर लिखे, उन्होंने हमें मुश्किल में डाल दिया है! यह उन लेटर के बारे में है, जिनमें नदियों के पानी के बारे में रिक्वेस्ट की गई थी।
24 अप्रैल को मृदुला साराभाई को लिखे अपने लेटर में भी नेहरू इन सभी बातों का जिक्र करते हैं और अपने दिल की बात कहते हैं। वह प्रेसिडेंट के प्रोग्राम में शामिल होने, उन्हें सौराष्ट्र सरकार द्वारा फंड के इस्तेमाल से कैसे नहीं रोक पाए, और भी बहुत कुछ बताते हैं। वह आगे कहते हैं कि मृदुला को प्रेसिडेंट से मिलकर उन्हें समझाना चाहिए और गुजराती प्रेस में हो रही बुराई के बारे में बताना चाहिए।
प्रोग्राम का कवरेज कम करने की कोशिशें
सारी कोशिशें नाकाम होने के बाद, 28 अप्रैल को नेहरू ने उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री आर. आर. दिवाकर को एक चिट्ठी लिखी। वजह? यह निर्देश देने के लिए कि प्रोग्राम का कवरेज कम किया जाए और ऐसा न लगे कि सरकार किसी भी तरह से इसमें शामिल है।

नेहरू दिवाकर को लिखते हैं, ‘इस सोमनाथ प्रोग्राम में सरकार को शामिल करने से देश और विदेश में हमें नुकसान होगा। मुझे कई शिकायतें भी मिल रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या एक ‘सेक्युलर’ सरकार इस तरह से बर्ताव कर सकती है? मैं बस इतना कह सकता हूँ कि यह कोई ‘सरकारी प्रोग्राम’ नहीं है।’
इसके बाद नेहरू कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि अगर हालात ऐसे बने, तो हमारे रेडियो ब्रॉडकास्ट को सोमनाथ प्रोग्राम का कवरेज पूरी तरह से कम कर देना चाहिए, ताकि किसी भी तरह से ऐसा न लगे कि यह कोई सरकारी प्रोग्राम है।’
सोमनाथ प्रोग्राम की तारीख पास आ रही थी। इसी बीच 2 मई, 1951 को नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक लेटर लिखा। लेटर में 19 अलग-अलग बिन्दू थे। इनमें 17वां पॉइंट सोमनाथ मंदिर से जुड़ा था।
नेहरू एक बार फिर मुख्यमंत्रियों के सामने साफ करते हैं कि सरकार इसमें किसी भी तरह से शामिल नहीं है। वह यह भी चेतावनी देते हैं कि भले ही इसके लिए पब्लिक सपोर्ट हो, हमें याद रखना होगा कि ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सकता, जिससे सेक्युलरिज्म को नुकसान हो। उन्होंने आगे यह डर भी जताया कि देश में कई कम्युनल ताकतें एक्टिव हैं और हमें उनसे लड़ना होगा। एक समझदारी भरी सलाह देते हुए नेहरू ने लिखा, ‘सरकारों के लिए हमेशा सेक्युलर और नॉन-कम्युनल रुख अपनाना जरूरी है।’
कार्यक्रम से दो दिन पहले, 9 मई को नेहरू ने विदेश मंत्रालय को एक नोट भेजा, जिसमें यह सारी भावनाएँ हैं, इसलिए अलग से चर्चा की कोई ज़रूरत नहीं है।
13 जून, 1951 को नेहरू ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन को एक चिट्ठी लिखी। तब तक सोमनाथ का कार्यक्रम पूरा हो चुका था।
इस चिट्ठी में नेहरू लिखते हैं, ‘आपने सोमनाथ कार्यक्रम में कुछ मंत्रियों के होने का ज़िक्र किया। मैं सहमत हूँ। सच तो यह है कि मैंने उन्हें रोकने की कई कोशिशें कीं, लेकिन वे जाने के लिए तैयार थे। सोमनाथ में जो हुआ, उससे मैं बहुत दुखी था। मैंने यह कहने की बहुत कोशिश की कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सरदार पटेल के कुछ फैसलों की वजह से सरकार पहले ही कुछ हद तक इसमें शामिल हो चुकी थी।
आखिरी चिट्ठी 1 अगस्त, 1951 को लिखी गई थी, जो मुख्यमंत्रियों को भेजी गई चिट्ठी थी। यहाँ भी नेहरू ने एक बार फिर सोमनाथ प्रोग्राम का जिक्र किया और कहा कि इससे भारत की इमेज खराब हुई और पाकिस्तान ने इसका पूरा फ़ायदा उठाकर प्रोपेगैंडा फैलाया।
कुल मिलाकर, नेहरू ने सोमनाथ मुद्दे पर सत्रह चिट्ठियाँ लिखीं। उनको एतराज था कि सरकार भी किसी न किसी तरह से इसमें शामिल थी, जबकि सच तो यह था कि पैसा लोगों ने इकट्ठा किया था। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता आड़े आ रही थी। नेहरू को इस बात की ज्यादा चिंता थी, कि दूसरे देश क्या कहेंगे, पड़ोसी आतंकवादी देश पाकिस्तान क्या कहेगा।
इन देशों से मान्यता पाने की इतनी ज्यादा इच्छा थी कि उन्होंने हजारों साल बाद फिर से बनाए जा रहे हिंदू मंदिर के गर्व को एक तरफ रख दिया, लेकिन इस बात पर जोर देते रहे कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। मानो सरकार को इस प्रोग्राम पर शर्म आ रही हो! नेहरू की बातें कम से कम इसी ओर इशारा करती हैं।
अगर एक हिंदू देश में हिंदू मंदिर बन रहा है, तो हिंदुओं द्वारा चुनी गई सरकार इसमें क्यों शामिल नहीं होनी चाहिए? नेहरू ने सेक्युलरिज़्म की इम्पोर्टेड परिभाषाओं के असर में आकर बहुसंख्यक के साथ खराब बर्ताव करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। एक तरह से इन चिट्ठियों के जरिए कहा जा सकता है कि उन्होंने बार-बार बहुसंख्यक का अपमान किया।
आज समय बदल गया है। आज सरकार ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मना रही है। चलिए उसी मुद्दे पर बात खत्म करते हैं जिससे हमने पहला हिस्सा शुरू किया था। यह सब करने में मौजूदा सरकार को सेक्युलरिज़्म परेशान नहीं करता। यह 2014 में बदली सोच की हवा का सुखद नतीजा है। राम मंदिर भी इसी का नतीजा था। दो आर्टिकल की यह सीरीज़ इस शुभकामना के साथ खत्म करते हैं कि कुछ सालों बाद इसमें काशी-मथुरा भी जुड़ जाएगा।
(ये लेख मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )


