Wednesday, July 6, 2022
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दूसरी सीट से नहीं लड़ेंगी ‘दीदी’ से ‘बेटी’ बनीं ममता: हिंदुत्व की लहर के बीच ‘विक्टिम कार्ड’ कितना कारगर?

प्रशांत किशोर ने बताया कि ‘दीदी’ एक सशक्त व्यक्तित्व को दर्शाता है, किन्तु ‘बेटी’ इस बात पर जोर डालता है कि लोगों को साथ खड़े होने की आवश्यकता है। इसलिए स्लोगन दिया गया, ‘बांग्ला निजेर मेये-केइ चाए’ जिसका अर्थ है कि बंगाल अपनी बेटी को चाहता है।

पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव 2021, कई मायनों में अलग है। इसे काफी समय तक याद रखा जाएगा। इस चुनाव में एक ओर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनैतिक महत्वाकांक्षा है तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, अमित शाह की रणनीति और बीजेपी की सांगठनिक क्षमता के साथ-साथ हिंदुत्व की लहर है। इस बीच ममता बनर्जी के नंदीग्राम के अलावा किसी और सीट से लड़ने की संभावनाओं को टीएमसी ने खारिज कर दिया है।

बंगाल के चुनावों को लेकर चुनावी विद्वान कुछ भी आकलन करते रहें, किन्तु ममता बनर्जी का व्यवहार उनकी पराजय के भय की कहानी कहता है। चाहे वो ‘जय श्री राम’ के नारे से खीझने की बात हो अथवा मुस्लिम तुष्टिकरण की, पीएम मोदी के विरुद्ध उनकी कड़वी भाषा हो अथवा बंगाल की राजनैतिक हिंसाओं पर उनकी चुप्पी, सभी इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि ममता बनर्जी अपनी पराजय के भय को महसूस कर रही हैं। अपने शुरुआती राजनैतिक जीवन से ही एक राजनैतिक योद्धा के रूप में पहचान बनाने वाली ममता बनर्जी अचानक से पीड़ित कैसे बन गईं? क्या सच में बंगाल की ‘दीदी’ कमजोर हो रही है अथवा यह उनकी रणनीति का हिस्सा है?

इसका उत्तर तो उनके चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ही दे सकते हैं, जिन्होंने ममता बनर्जी को बंगाल की ‘दीदी’ से ‘बेटी’ में बदल दिया।

इंडियन एक्सप्रेस के आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में प्रशांत किशोर ने बताया कि ‘दीदी’ एक सशक्त व्यक्तित्व को दर्शाता है, किन्तु ‘बेटी’ इस बात पर जोर डालता है कि लोगों को साथ खड़े होने की आवश्यकता है। इसलिए स्लोगन दिया गया, ‘बांग्ला निजेर मेये-केइ चाए’ जिसका अर्थ है कि बंगाल अपनी बेटी को चाहता है। बंगाल में भाजपा की बढ़ती लहर का सामना करने के लिए तृणमूल कॉन्ग्रेस ने प्रशांत किशोर की इसी रणनीति को अपनाया।    

प्रशांत किशोर की इस रणनीति का अर्थ था कि बंगाल में ममता बनर्जी को ‘दीदी’ के स्थान पर एक ऐसी ‘बेटी’ के रूप में प्रदर्शित किया जाए जो बाहरी लोगों से लड़ रही है। लक्ष्य साफ था ममता बनर्जी को एक ‘विक्टिम’ के रूप में दिखाना। नंदीग्राम में ममता बनर्जी के साथ धक्का-मुक्की का जो ड्रामा रचा गया वह इसी रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है।  

ममता का नंदीग्राम वाला एपिसोड

पिछले महीने ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि उनके साथ चार-पाँच लोगों ने धक्का-मुक्की की जिससे उनके पैरों में चोट आ गई थी। ममता ने कहा कि उस समय वहाँ पुलिस भी नहीं थी। ममता ने इसे एक साजिश कहा था जिससे उन्हें चुनाव प्रचार से दूर रखा जा सके। हालाँकि प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि पूरी घटना एक छोटा सा एक्सीडेंट था और वहाँ धक्का-मुक्की जैसा कुछ हुआ ही नहीं था। साथ ही ममता पुलिस से घिरी हुईं थी।

ममता का यह विक्टिम कार्ड बुरी तरह से असफल रहा। बंगाल में ममता बनर्जी का ‘दीदी’ से ‘बेटी’ तक का सफर एक रणनीति का ही हिस्सा था जो बंगाल में ममता को ‘विक्टिम’ बताकर वोट लेने के तरीके पर आधारित थी। प्रशांत किशोर ने यही तय किया था कि ममता को बंगाल की एक ऐसी ‘बेटी’ के रूप में दर्शाया जाए जो अपने ही राज्य में ‘बाहरी’ लोगों से लड़ रही है और बंगाल की जनता को उसके साथ खड़े होने की आवश्यकता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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