Monday, November 29, 2021
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पुलवामा का वो गाँव जिसने पूरे भारत को लिखना सिखाया: PM मोदी ने ‘मन की बात’ में किया जिक्र

पीएम मोदी ने आज 'मन की बात' रेडियो प्रसारण में कहा कि कश्मीर घाटी में चिनार की लकड़ी में नमी की अच्छी मात्रा और कोमलता है, जो इसे पेंसिल के उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त बनाती है। एक समय में हम पेंसिल के लिए लकड़ी का आयात करते थे, लेकिन पुलवामा अब इस क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बना रहा है।"

कमजोर राजनीतिक नेतृत्व और इच्छाशक्ति के कारण जम्मू कश्मीर राज्य सदियों तक आतंक और कट्टरपंथ का शिकार रहा। यही वजह है कि भारत के इस सबसे महत्वपूर्ण हिस्से की पहचान मात्र जिहाद और आतंकवाद बनकर रह गया। हालाँकि, घाटी से आर्टिकल 370 के निष्क्रीय होते ही लोगों के जनजीवन पर भी इसका प्रभाव देखने को मिला है और हालात बहुत हद तक सुधरते नजर आ रहे हैं।

केंद्र सरकार और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घाटी के लोगों के जीवन, अर्थव्यवस्था सुधारने और उन्हें पहचान दिलाने में पूरी कोशिश कर रहे हैं। लोग अब जान पा रहे हैं कि कश्मीर या पुलवामा का हमारे दैनिक जीवन से जुड़ी वस्तुओं में सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यही नहीं, पुलवामा ने इस देश को साक्षर बनाने में भी अहम भूमिका निभाई है।

कश्मीर का ‘पेंसिल वाला गाँव’ – उक्खू

आज पीएम मोदी ने अपने रेडियो प्रसारण मन की बात करते समय ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ के तहत जम्मू-कश्मीर के बारे में एक ऐसी अनोखी बात का जिक्र किया जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते होंगे। पढ़ाई के शुरुआती दौर में हम सबने हाथों में पेंसिल पकड़कर लिखना-पढ़ना सीखा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका उत्पादन कश्मीर के पुलवामा जिले के उक्खू गाँव से होता है, जो कि ‘पेंसिल वाले गाँव’ के नाम से भी जाना जाता है।

‘मन की बात’ के 70वें कार्यक्रम में पीएम मोदी ने आज (अक्टूबर 25, 2020) कहा कि आज पुलवामा पूरे देश को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आज यदि देश भर के छात्र अपना होमवर्क करते हैं, नोट्स तैयार करते हैं तो यह पुलवामा के लोगों की कड़ी मेहनत की वजह से है। देश में पेंसिल स्लेट की माँग का लगभग 90% कश्मीर घाटी से पूरा होता है। इसमें पुलवामा की बड़ी हिस्सेदारी है।

पुलवामा के एक छोटे से गाँव से शुरू हुई पेंसिल स्लेट बनाने की प्रक्रिया अब पूरे पुलवामा ज़िले में फैल गई है। पेंसिल स्लेट के इस उद्योग से पुलवामा में हर साल 100 करोड़ का कारोबार किया जाता है। कुल मिला कर यहाँ इसकी 17 यूनिट है जिसके जरिए पूरे देश में 90% पेंसिल स्लेट की सप्लाई की जाती है।

जानकारी के मुताबिक, देश की सभी बड़ी पेंसिल कंपनियाँ कश्मीर के पुलवामा से पेंसिल बनाने के लिए कच्चा माल खरीदती हैं। पेंसिल स्लेट का उत्पादन करने वाले बताते हैं कि अगर उन्हें कच्चा माल मिलेगा तो इस कारोबार को पूरे कश्मीर में फैलाया जा सकता है। इससे प्रदेश में रोजगार बढ़ेगा और प्रदूषण भी नहीं होगा।

रिपोर्ट्स के अनुसार, कश्मीर के इन नम इलाकों में पाया जाने वाला यह पेड़ चिनार की ही एक किस्म है। यहाँ दर्जनों छोटी-छोटी इकाइयाँ इस लकड़ी को पेंसिल इंडस्ट्री को मुहैया कराने के कारोबार में लगी हुई हैं।

पीएम मोदी ने भी इन लकड़ियों का जिक्र करते हुए कहा, “कश्मीर घाटी में चिनार की लकड़ी में उच्च नमी की मात्रा और कोमलता है, जो इसे पेंसिल के उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त बनाती है। एक समय में हम पेंसिल के लिए लकड़ी का आयात करते थे, लेकिन पुलवामा अब इस क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बना रहा है। यहाँ का उक्खू देश विदेश में पेंसिल विलेज के नाम से जाना जाता है।”

समाचार पत्र ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नटराज और अप्सरा पेंसिल जैसे ब्रांड बनाने वाली हिंदुस्तान पेंसिल्स को यहीं से कच्चा माल मिलता है। यह कंपनी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी पेंसिल निर्माता है।

महिलाओं को रोजगार का बड़ा साधन

गौरतलब है कि इस उद्योग में बड़ी संख्या में महिलाएँ काम कर रही है। लगभग 2000 लोगों को इस उद्योग के चलते रोजगार मिला है। उक्खू गाँव के घरों में ही छोटी-छोटी यूनिट्स में महिलाएँ कुशलता से कारीगरी कर रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस उद्योग में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही महिलाओं की प्रशंसा करते हुए कहा, “यहाँ पेंसिल स्लेट के उत्पादन के लिए कई इकाइयाँ काम कर रही हैं, जिनसे रोज़गार पैदा हो रहा है। इन यूनिट्स में महिलाएँ बड़ी संख्या में काम कर रही हैं।”

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री ने ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ के तहत पुलवामा के पेंसिल स्लेट उद्योग की तारीफ करते हुए कहा, “पुलवामा ने यह विशिष्ट पहचान तब हासिल की, जब यहाँ के स्थानीय लोगों ने कुछ अच्छा करने का फैसला किया। उन्होंने इसके लिए जोखिम उठाया और खुद को इसके लिए पूरी तरह से समर्पित कर दिया।” प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं पुलवामा के भाइयों और बहनों और उनके परिवारों की सराहना करता हूँ, जो भारत को शिक्षित करने में योगदान दे रहे हैं।”

 

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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