जिसने किया भारत पर सबसे पहला हमला, उसी संग नेहरू ने किया समझौता: इसी कारण बनी CAB

लियाकत अली खान विभाजन और आजादी से पूर्व भारत में एक अस्थायी और कम समय की सरकार में पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल सहयोगी रहे थे। उन्हीं के कार्यकाल में भारत पर पाकिस्तान की ओर से पहला सैन्य हमला किया गया था।

लोकसभा में सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को नागरिकता संशोधन बिल 2019 की बहस के दौरान सदन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नेहरू-लियाकत समझौते को नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) की वजह बताई। साथ ही उन्होंने 1950 में लागू हुए इस समझौते के बारे में उन्होंने कई सवाल भी उठाए। विधेयक पेश करने के दौरान विपक्षियों ने इसे मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव बताया था, मगर अमित शाह ने नेहरू-लियाकत समझौते का उल्लेख करते हुए नए कानून को सही ठहराया।

उन्होंने कहा कि नेहरू-लियाकत समझौता विफल रहा। इसलिए यह बिल लाने की आवश्कता पड़ी। यदि पाकिस्तान द्वारा संधि का पालन किया गया होता, तो इस विधेयक को लाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। असम के मंत्री हेमंत विस्व शर्मा ने भी लोगों को नेहरू लियाकत समझौता की याद दिलाई। विस्व शर्मा ने ट्वीट कर कहा कि यह बिल नेहरू-लियाकत समझौता की ऐतिहासिक भूलों को ठीक करने वाला है।

क्या है नेहरू-लियाकत समझौता

ये वो दौर था जब भारत और पाकिस्तान विभाजन का दंश झेल रहे थे। स्वतंत्र भारत और नए बने पाकिस्तान बँटवारे के बाद हुए भीषण दंगों से लोग पीड़ित थे। सैकड़ों दंगा पीड़ित लोग इस सीमा से उस सीमा को पार करते रहते थे। इसी पृष्ठभूमि में 1950 में इस समझौते पर दिल्ली के गवर्मेंट हाउस में दोनों देशों के पहले प्रधानमंत्री पंड़ित जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान ने दस्तखत किए थे। समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने-अपने देश में अल्पसंख्यक आयोग गठित किए थे। इस समझौते के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच दिल्ली में 6 दिनों तक बातचीत हुई थी। इसे दिल्ली पैक्ट (Delhi Pact) के नाम से भी जाना जाता है।

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तात्कालिक चिंता पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं और पश्चिम बंगाल के मुसलमानों का पलायन था। भारत और पाकिस्तान के बीच पहले ही जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की घुसपैठ के की वजह से संबंध तनावपूर्ण बन गए थे। भारत और पाकिस्तान के बीच दिसंबर 1949 तक आर्थिक संबंध टूट गए थे। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिखों, जैन और बौद्धों के पलायन और भारत में मुसलमानों को गंभीर शरणार्थी संकट का सामना करना पड़ा।

समझौते की मुख्य बातें:-

1. प्रवासियों को ट्रांजिट के दौरान सुरक्षा दी जाएगी। वे अपनी बची हुई संपत्ति को बेचने के लिए सुरक्षित वापस आ-जा सकते हैं।

2. जिन औरतों का अपहरण किया गया है, उन्हें वापस परिवार के पास भेजा जाएगा। अवैध तरीके से कब्जाई गई अल्पसंख्यकों की संपत्ति उन्हें लौटाई जाएगी।

3. जबरदस्ती धर्म परिवर्तन अवैध होगा, अल्पसंख्यकों को बराबरी और सुरक्षा के अधिकार दिए जाएँगे। दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी तरह का कुप्रचार नहीं चलाने दिया जाएगा।

4. दोनों देश, युद्ध को भड़ाकाने वाले और किसी देश की अखंडता पर सवाल खड़ा करने वाले प्रचार को बढ़ावा नहीं देंगे।

समझौते के समय गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल भी मौजूद थे। इस समझौते का विरोध करते हुए नेहरू सरकार के उद्योगमंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा दे दिया था। मुखर्जी तब हिंदू महासभा के नेता थे। उन्होंने पैक्ट को मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाला करार दिया था।

बता दें कि लियाकत अली खान विभाजन और आजादी से पूर्व भारत में एक अस्थायी और कम समय की सरकार में पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल सहयोगी रहे थे। वित्त मामलों को देखने की जिम्मेदारी को तरीके से नहीं निभाने के कारण लियाकत काफी विवादित रहे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़े लियाकत बाद में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने। उन्हीं के कार्यकाल में भारत पर पाकिस्तान की ओर से पहला सैन्य हमला किया गया।

मोहम्मद अली जिन्ना से राजनीति सीखने वाले लियाकत ने अपना पहला चुनाव मुजफ्फरनगर (यूनाइटेड प्रोविंसेज) से लड़ा था। पाक के प्रधानमंत्री के तौर उनकी एकमात्र बड़ी उपलब्धि 1949 में नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान बनाने का है। 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी के कंपनी बाग में लियाकत अली खान की गोली मारकर हत्या कर दी गई। लियाकत की हत्या के बाद पहले दशक में ही पाकिस्तान में लगातार रहने वाले सैन्य शासन की शुरुआत हो गई।

आखिर क्यों पड़ी नागरिकता संशोधन बिल (CAB) लाने की जरूरत

लोकसभा में विपक्ष को जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा कि इस देश का विभाजन धर्म के आधार पर नहीं होता, तो इस बिल को लेकर आने की जरूरत ही नहीं पड़ती। बिल पर शाह ने कहा कि 1950 में नेहरू-लियाकत एक समझौता हुआ। उस समझौते के तहत ये निश्चित किया गया कि दोनों देश अपने-अपने अल्पसंख्यकों का ध्यान रखेगा। बाद में बांग्लादेश बना। भारत-पाक दोनों देशों के सरकार ने ये विश्वास दिलाया था कि पाकिस्तान के अंदर जो हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी हैं, उनका पाकिस्तान ध्यान रखेगा और भारत में जो माइनॉरिटी है उसका हिंदुस्तान ध्यान रखेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। भारत ने तो उसका अनुसरण किया, लेकिन पाकिस्तान में 1950 का नेहरू-लियाकत समझौता धरा का धरा रह गया।

इसी का परिणाम है कि 1947 में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी 23 फीसदी थी, लेकिन 2011 में 3.7 फीसदी हो गई। इसी तरह बांग्लादेश में 1947 में 22 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी थी, लेकिन 2011 में यह 7.8 पर्सेंट हो गई। अफगानिस्तान में 1992 से पहले दो लाख से अधिक हिंदू और सिख थे, जिनकी संख्या 500 से कम बची है। आखिर ये लोग कहाँ चले गए? या तो मार दिए गए या भगा दिए गए या फिर इनका धर्मांतरण करा दिया गया। आखिर उनका क्या दोष था? हम चाहते हैं कि इन लोगों का सम्मान बना रहे। इसलिए इस बिल को लाने की आवश्यकता पड़ी।

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