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चाचा मर गए क्योंकि उनका अनुभव मेरे जितना ही था: राहुल गाँधी बॉंच रहे राजीव-संजय-एयरोप्लेन पर ‘ज्ञान’, सुनिए आप

संजय गाँधी का निधन 23 जून 1980 को सफदरजंग हवाई अड्डे के पास विमान दुर्घटना में हुआ था। उन्हें लेकर राहुल ने कहा, "मेरे चाचा एक विशेष प्रकार का प्‍लेन उड़ा रहे थे- वह पिट्स था। वह बेहद अग्रेसिव प्‍लेन था। मेरे पिता ने उनसे कहा कि ऐसा मत करो...लेकिन उन्होंने उड़ाया और वही हुआ जो उड़ाने का अनुभव न होने पर होता है।"

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कल (सितंबर 2, 2021) अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो शेयर करते हुए उन दिनों को याद किया जब वह अपने पिता राजीव गाँधी के साथ एयरोप्लेन में बैठ कर आनंद लिया करते थे। अपनी वीडियो में उन्होंने बताया कि पायलट होने से सार्वजनिक जीवन में भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है और बड़े स्तर पर चीजों को देखने का नजरिया विकसित होता है।

भारतीय युवा कॉन्ग्रेस की ओर से आयोजित राजीव गाँधी फोटो प्रदर्शनी में राहुल गाँधी की यह 5 मिनट 48 सेकेंड की वीडियो बनाई गई। इसमें वह अपने पिता के साथ बिताए पलों को याद करते दिखाई पड़ रहे हैं। वो बताते हैं कि कैसे उनके पिता उनसे प्लेन के पार्ट्स के नाम पूछा करते थे। बाद में जब वह कॉलेज गए तो उन्होंने प्लेन चलाना सीखा भी।

साभार: राहुल गाँधी का यूट्यूब अकॉउंट

इस दौरान राहुल ने अपने चाचा संजय गाँधी के साथ हुई दुर्घटना को भी याद किया। उन्होंने बताया, “मेरे चाचा एक विशेष प्रकार का प्‍लेन उड़ा रहे थे- वह पिट्स था। वह बेहद अग्रेसिव प्‍लेन था। मेरे पिता ने उनसे कहा कि ऐसा मत करो। मेरे चाचा के पास उतना अनुभव नहीं था। मेरे चाचा के पास तीन से साढ़े तीन सौ घंटे प्‍लेन उड़ाने का अनुभव था, यानी उतना ही जितना मुझे है। उन्हें वह प्‍लेन नहीं उड़ाना चाहिए था लेक‍िन उन्होंने उड़ाया। और वही हुआ जो उड़ाने का अनुभव न होने पर होता है। आसानी से खुद की जान ली जा सकती है।”

बता दें कि संजय गाँधी का निधन 23 जून 1980 को सफदरजंग हवाई अड्डे के पास विमान दुर्घटना में हुआ था। राहुल आगे बताते हैं कि जब भी उनके पिता प्लेन उड़ाने जाते थे तो उनकी माँ बहुत ज्यादा चिंतित हो जाती थीं। वह कहती थीं, “वह प्लेन उड़ाने गए हैं, ये बेहद खतरनाक होगा।”

वह कहते हैं पायलटों में एक विशेष प्रकार का गुण होता है जो उन्हें ट्रेन‍िंग से प्राप्त होता है और वह यह है कि उन्हें 30 हजार फीट की ऊँचाई से दिखने वाले दृश्य से अपनी नजर को कॉकपिट के भीतर के दृश्य में लाना होता है। अगर उस कॉकपिट के भीतर चीजों को नहीं रख पाएँगे तो परेशानी खड़ी होगी।

वह बताते हैं कि पायलट जब विमान उड़ाता है, उसकी कल्पनाशीलता रोड, रेलवे लाइन द्वारा अवरुद्ध नहीं होती। उनकी कल्पनाशीलता 30 हजार फुट पर होती है, इसलिए उनकी भी क्षमता बड़े तंत्र को देखने की है। राहुल कहते हैं, “इसी तंत्र ने मेरे पिता की मदद की। वो जाते थे, लोगों से मिलते थे, उन्हें समझते थे और फिर 30-40 फीट ऊपर चले जाते थे। उनका काम हमेशा इन दो नजरियों में चलता था।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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