Thursday, May 23, 2024
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महिला आरक्षण बिल पर संसद ने तो लगा दी मुहर, पर अब आगे क्या: जानिए कैसे और कब तक सदन में बढ़ेगी आधी आबादी की हिस्सेदारी

मौजूदा कानून के तहत अगला परिसीमन 2026 से पहले नहीं हो सकता। ऐसे में 2027 में होने जा रहे 8 राज्यों के चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू हो पाएगा। इस हिसाब से देखा जाए तो...

आधी आबादी की संसद में धमक बढ़ाने वाला महिला आरक्षण विधेयक 27 साल से अधर में लटका था। आखिरकार वो संसद के पाँच दिनों के खास सत्र में महज 3 दिनों में पास हो गया। इस ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर लोकसभा में 454 सांसदों ने पक्ष में वोट किया और विरोध में केवल दो वोट पड़े।

वहीं राज्यसभा में मौजूद सभी 214 सांसदों ने इस बिल का समर्थन किया। अब बस राष्ट्रपति की मंजूरी की देर है और ये अधिनियम कानून बन जाएगा। देखा जाए तो साल 2024 के आम चुनावों में लगभग 6 महीने ही शेष है।

ऐसे में आम जनता के मन में भी सवाल है कि अगले साल ही ये अधिनियम लागू हो जाएगा, लेकिन यहाँ हम आपको बताने जा रहे हैं कि ऐसा नहीं होने जा रहा है। इसमें टेक्नीकल लोचा है। इस वजह से ये 2029 के लोकसभा चुनावों में ही लागू हो पाएगा।

क्या है ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ 2023

लोकसभा और राज्यसभा में विधेयक पास होने के बाद ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के कानून बनने की राह साफ हो गई है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये कानून का रूप ले लेगा, लेकिन इसके बाद भी ये कानून अगले साल 2024 में लागू नहीं होगा।

संविधान के 128वें संवैधानिक संशोधन के तहत जो विधेयक पेश किया गया था उसमें महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान है। इसके मुताबिक लोकसभा, विधानसभाओं सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभा में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

यही नहीं संसद में एससी/एसटी के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई कोटा होगा। हालाँकि पुदुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित नहीं हैं।

कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने बिल पेश करते हुए कहा था कि इससे लोकसभा में महिलाओं की संख्या 82 से 181 हो जाएगी। इसमें 15 साल के लिए आरक्षण का प्रावधान है। संसद को इसे बढ़ाने का अधिकार होगा।

वहीं उन्होंने राज्यसभा में बिल पेश करते हुए गुरुवार 21 सितंबर को कहा था कि इसके तहत एससी-एसटी महिलाओं को भी आरक्षण मिलेगा। इसलिए जनगणना और परिसीमन महत्वपूर्ण हैं, जैसे ही विधेयक पारित होगा, जनगणना और परिसीमन होगा। यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है; कौन-सी सीट महिलाओं को जाएगी, ये परिसीमन आयोग तय करेगा।

मौजूदा लोकसभा की कुल 543 सीटों पर महिला आरक्षण लागू होने के बाद कितनी महिलाएँ संसद में होगी उसे ऐसे समझ सकते हैं। अभी महिला सांसदों की संख्या 78 हैं। यदि 33 फीसदी आरक्षण के हिसाब से देखा जाए तो महिलाओं के लिए 181 सीट आरक्षित होंगी। इन्हीं 181 सीट में से जातिगत आरक्षण के कोटे के तहत भी महिलाओं की हिस्सेदारी होगी।

अभी संसद में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण नहीं मिलता है। केवल अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए कोटा लागू है। इसके तहत 543 सीट पर 131 सांसद एससी/ एसटी से चुने जाते हैं। अब महिलाओं को इस एससी/ एसटी कोटे में भी 33 फीसदी आरक्षण मिलेगा।

एससी/ एसटी के 131 के 33 फीसदी के हिसाब से एससी की 28 और एसटी की 16 सीट महिलाओं को मिलेंगी। यानी कुल 44 सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएगी और एससी/ एसटी के पुरुषों के लिए इस कोटे में 87 सीटें ही रहेंगी।

543 में से 131 का एससी/ एसटी कोटा घटाने पर इसमें ओबीसी और सामान्य वर्ग के लिए 412 सीट होंगी। इस 412 में से भी 33 फीसदी यानी 137 सीट ओबीसी और सामान्य कोटे की महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी।

इस तरह से एससी/एसटी की 44 और ओबीसी/सामान्य कोटे की 137 सीट मिलाकर लोकसभा में कुल 181 सीट महिलाओं के लिए होंगी। अगर परिसीमन के बाद लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ती है तो महिला आरक्षण कोटे की सीट भी उसी अनुपात में बढ़ जाएगी।

जनगणना और परिसीमन पर टिका महिला आरक्षण लागू होना

महिला आरक्षण बिल के मसौदे के मुताबिक, कानून बनने के बाद पहले जनगणना और परिसीमन में महिला आरक्षित सीटें तय की जाएगी। देखा जाए तो जनगणना और परिसीमन के बाद ही ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ कानून के तौर पर लागू हो पाएगा।

राज्यसभा में जब 2010 में पारित महिला आरक्षण बिल पास हुआ था तो इसमें परिसीमन की शर्त नहीं थी। जबकि इस नए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में महिला सीटों के आरक्षण के लिए अनुच्छेद 334 ए जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है महिला आरक्षण के लिए परिसीमन जरूरी होगा।

ये बात भी तय है कि जब जनगणना होगी इसके बाद ही परिसीमन संभव हो पाएगा। गौरतलब है कि कोराना महामारी के चलते 2021 में होने वाली जनगणना ​अब तक नहीं हो सकी है। ऐसे में सरकार परिसीमन से पहले जनगणना कराएगी।

परिसीमन का अर्थ है किसी देश में आबादी का प्रतिनिधित्व करने हेतु किसी राज्य में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं का निर्धारण करना है। हर जनगणना के बाद भारत की संसद अनुच्छेद-82 के तहत एक परिसीमन अधिनियम लागू करती है।

अगर सरकार 2021 की जनगणना न कराने का फैसला ले और देश में हुई आखिरी 2011 की जनगणना को आधार मानकर परिसीमन कराना चाहेगी तो उसमें एक मुश्किल पेश आएगी।

जैसा कि देश के संविधान में अनुच्छेद अनुच्छेद-82 के मुताबिक, सदन में 550 से अधिक निर्वाचित सदस्य नहीं होंगे। वहीं संविधान के अनुच्छेद 170 के मुताबिक हर राज्य की विधानसभा में 500 से अधिक और 60 से कम सदस्य नहीं होंगे।

अगर ऐसे में सीटों की संख्या बढ़ती है, तो संविधान संशोधन की जरूरत पड़ सकती है। यही वजह है कि परिसीमन के बाद ही नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ 2023 कानून लागू हो पाएगा। इस हिसाब से मोटे तौर पर जनगणना में कम से कम 2 साल लगेंगे।

मौजूदा कानून के तहत अगला परिसीमन 2026 से पहले नहीं हो सकता। ऐसे में 2027 में होने जा रहे 8 राज्यों के चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू हो पाएगा। इस हिसाब से देखा जाए तो 2026 के परिसीमन में तय होगा कि कौन-सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

क्यों लटका रहा 27 साल ये बिल?

महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 12 सितंबर, 1996 को पीएम एचडी देवेगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार ने पेश किया था। संविधान के 81वें संशोधन के तहत पेश इस विधेयक में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण के प्रस्ताव के अंदर ही अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए उप-आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था।

इस बिल में प्रस्ताव रखा गया कि लोकसभा के हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटें रोटेट की जाएँगी। इसमें आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन से दिए जाने का प्रस्ताव रखा गया था। वहीं इसमें ये भी प्रस्ताव दिया गया था कि इस अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण खत्म हो जाएगा। इसके बाद 1997 में इस विधेयक को पेश करने की फिर से एक नाकाम कोशिश हुई थी।

इसके एक साल बाद ही अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने 1998, 1999, 2002, 2003-04 में बिल को पास करवाने की कोशिश की, लेकिन इसमें वो कामयाब नहीं हो पाई। साल 2004 में कॉन्ग्रेस की अगुवाई में यूपीए सरकार आने के बाद मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। तब 2008 में इस बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के तौर पर राज्यसभा में पेश किया गया।

हालाँकि, साल 2008 में इस बिल को क़ानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था, लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार 9 मार्च, 2010 को यूपीए सरकार ने राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल को एक के मुकाबले 186 वोट के भारी बहुमत से पास करवा लिया। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के सात सांसदों ने बिल को लेकर खासा हंगामा काटा। राज्यसभा अध्यक्ष ने उन्हें निलंबित कर दिया। ये दोनों यूपीए सरकार के साथी थे। वहीं सरकार गिरने का खतरा मंडराने की वजह से कॉन्ग्रेस ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया।

पहली बार 13 साल बाद महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में ही पारित नहीं हुआ बल्कि मोदी सरकार ने इसे संसद के दोनों सदनों राज्यसभा और लोकसभा में पास करा लिया। इससे लोकसभा और विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित होने की राह खुल गई है।

‘पीएम मोदी चाहें तो आज लागू हो…’

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर एक बार फिर से पीएम मोदी को घेरने की कोशिश की है। उनका कहना है कि सरकार चाहे तो महिला आरक्षण बिल को आज ही लागू किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण बिल में दो कमियाँ हैं। एनडीए सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जातीय गणना और परिसीमन की शर्त हटा लें।

उनका आरोप है कि सरकार इस बिल के जरिए महज ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी कहते हैं, “ऐसा क्या है जिससे आपका ध्यान ओबीसी जनगणना से हटाया जा रहा है? मैंने भारत सरकार के तहत चलाई जाने वाली संसद के कैबिनेट सचिव और सचिव से पूछा कि 90 में से महज 3 लोग ओबीसी समुदाय से क्यों हैं। मुझे समझ नहीं आता कि पीएम मोदी हर दिन ओबीसी की बात करते हैं लेकिन उन्होंने उनके लिए क्या किया?” अब ये तो राहुल गाँधी ही जाने की सरकार क्या कर रही है?

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रचना वर्मा
रचना वर्मा
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