फेज-2 के बाद स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत जैसे ही ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी हुई तो कुछ लोगों ने उस पर नाराजगी जतानी शुरू कर दी। इस कथित नाराजगी का पहले से ही अनुमान लगाया गया था। विरोध करने वालों ने इसे ऐसे दिखाने की कोशिश की मानो चुनाव आयोग ने बीजेपी के साथ मिलकर लोगों से उनका वोट देने का हक छीन लिया हो।
21 दिसंबर को, खुद को न्यूज पोर्टल बताने वाले यूट्यूब चैनल ‘द रेड माइक’ से बातचीत करते हुए कॉन्ग्रेस से जुड़े वकील योगेंद्र यादव ने दावा किया कि SIR की वजह से तमिलनाडु में 97 लाख मतदाताओं के वोटिंग अधिकार खत्म हो गए हैं।
यह बात भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा तमिलनाडु और गुजरात की ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करने के बाद कही गई। ECI के आँकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु में 97.3 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं जबकि गुजरात में 73.7 लाख नाम हटाए गए।
आँकड़े सामने आते ही योगेंद्र यादव जैसे लोग यह कहने लगे कि बड़ी संख्या में लोगों से मतदान का अधिकार छीन लिया गया है। हकीकत यह है कि ये दावे आँकड़ों को सही तरह से समझने पर नहीं बल्कि सिर्फ बड़ी संख्या दिखाकर लोगों को डराने और गुमराह करने पर आधारित हैं। तथ्यों को ईमानदारी से देखने के बजाय ऐसे बयान सिर्फ भ्रम फैलाते हैं।
ड्राफ्ट रोल असल में क्या दिखाते हैं
तमिलनाडु में मतदाताओं की संख्या पहले 6.4 करोड़ थी, जो मौजूदा ड्राफ्ट सूची में घटकर 5.4 करोड़ रह गई है। यानी कुल 97.3 लाख नाम हटाए गए हैं। इनमें से 26.9 लाख मतदाताओं को मृत पाया गया।
लगभग 66.4 लाख ऐसे लोग थे जो या तो दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से वहाँ नहीं रह रहे थे, या फील्ड जाँच के दौरान अपने पते पर नहीं मिले। वहीं, करीब 4 लाख नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि वे एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज पाए गए।
इसी तरह की स्थिति गुजरात में भी सामने आई। यहाँ मतदाताओं की संख्या 5.1 करोड़ से घटकर 4.3 करोड़ रह गई। कुल 73.7 लाख नाम सूची से हटाए गए। इनमें 18.1 लाख मतदाता मृत पाए गए जबकि करीब 51.8 लाख लोग अपने दर्ज पते पर नहीं मिले या दूसरी जगह जा चुके थे। इसके अलावा, लगभग 3.8 लाख नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज होने के कारण हटाए गए।
वहीं, तमिलनाडु में 1.2 करोड़ मतदाताओं के नाम नोटिस के लिए चिह्नित किए गए हैं। ये नाम मतदाता सूची से हटाए नहीं गए हैं। दरअसल, इनमें रिकॉर्ड से जुड़ी कुछ गड़बड़ियाँ पाई गई हैं, जैसे माता-पिता और बच्चों की उम्र में असामान्य अंतर या एक ही माता-पिता से बहुत अधिक बच्चों का दर्ज होना। ये केवल जाँच के संकेत हैं, न कि नाम हटाने की कोई कार्रवाई।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की साजिश
चुनाव आयोग (ECI) ने जो डेटा स्पष्ट रूप से दिया है, उसके बावजूद योगेंद्र यादव जैसे कुछ एक्टिविस्ट जो अक्सर ऐसे मामलों पर डर फैलाते हैं, यह दावा कर रहे हैं कि मतदाता हटाने का काम जानबूझकर और बिना वजह किया गया। ऐसे दावे भ्रामक हैं और गंभीर खतरा पैदा करते हैं क्योंकि इससे आम लोगों के मन में यह गलत संदेश जाता है कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने के इरादे से काम कर रहा है।
SIR के दौरान अकेले तमिलनाडु में 97 लाख नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए—इतनी आबादी तो दुनिया के कई देशों में भी नहीं होती। SIR के दूसरे दौर में 6.5 करोड़ों लोगों के वोट कट रहे हैं, और अतिरिक्त 6 करोड़ों नागरिकों पर तलवार लटकी है। अफ़सोस कि देश का अधिकांश मीडिया इसे लोकतंत्र का संकट… pic.twitter.com/H4fMk1V8so
— Yogendra Yadav (@_YogendraYadav) December 22, 2025
यादव का निष्कर्ष डेटा की सही व्याख्या से नहीं निकला है। नाम हटाने का मुख्य कारण यह रहा कि संबंधित मतदाता या तो अब मौजूद नहीं थे, अपने दर्ज पते पर नहीं रहते थे, या फिर एक से अधिक जगह पंजीकृत पाए गए। एक ही व्यक्ति के कई पंजीकरण होने की स्थिति में केवल एक वोटर ID ही मान्य होती है, बाकी को रद्द किया जाता है। यह प्रक्रिया ECI द्वारा मतदाता धोखाधड़ी रोकने के लिए जरूरी और तय नियमों के तहत की जाती है।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एक संवैधानिक प्रक्रिया है
SIR यानी मतदाता सूची का संशोधन कोई नई या असामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह संविधान के तहत नियमित रूप से किया जाने वाला काम है, जिसका मकसद मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना होता है। अगर ऐसी समीक्षा न हो, तो सूची में मृत मतदाताओं के नाम, दूसरी जगह जा चुके लोगों की एंट्री और डुप्लीकेट नाम लगातार बने रहते हैं। समय के साथ जब ऐसी गलतियाँ बढ़ती जाती हैं, तो चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगते हैं।
SIR को लोकतंत्र पर हमला कहना खतरनाक है। इससे लोगों का भरोसा उसी प्रक्रिया से उठ सकता है, जिसे चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और सुरक्षित बनाए रखने के लिए बनाया गया है।
समाधान पर ध्यान नहीं, समस्या पर गढ़ी जा रही कहानी
चुनाव आयोग ने साफ तौर पर बताया है कि 18 जनवरी 2026 तक मतदाता या राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के एजेंट शिकायत और आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। अगर कोई योग्य मतदाता मानता है कि उसका नाम गलत तरीके से चिह्नित किया गया है, तो उसे तय समय सीमा के भीतर शिकायत करने का पूरा अधिकार है। इसके बावजूद सार्वजनिक बहस में प्रक्रिया और तथ्यों पर बात करने के बजाय डर फैलाने और मनगढ़ंत कहानी गढ़ने को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।
लोकतंत्र में सटीकता की जरूरत होती है, बढ़ा-चढ़ाकर बताने की नहीं
चुनावी सुधार कभी भी दिखावटी या आकर्षक नहीं होते और मतदाता सूची की जाँच को अक्सर गलत तरीके से पेश किया जाता है। कभी-कभी इसे जानबूझकर योगेंद्र यादव जैसे एक्टिविस्ट और राहुल गाँधी जैसे नेता गलत रंग से पेश करते हैं।
जब सामान्य प्रक्रिया के तहत होने वाले मतदाता सूची सुधार को जानबूझकर वोटरों को हटाने की साजिश बताया जाता है, तो सच और अफवाह के बीच फर्क मिटने लगता है। ऐसे बयान असली प्रक्रिया पर बेवजह शक पैदा करते हैं और लोगों को भ्रमित करते हैं और यही इनका मकसद होता है।
(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी टीम के अनुराग ने लिखी है, जिस इस लिंक पर क्लिक करे पढ़ सकते हैं)


