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धर्म प्रचार का अधिकार, लेकिन बल-लालच-धोखे से धर्मांतरण अपराध: गुजरात HC ने खारिज की ASHA कार्यकर्ताओं पर धर्म परिवर्तन का दबाव डालने वाली महिला की याचिका

गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि धर्म प्रचार का अधिकार संविधान देता है, लेकिन बल, धोखे, लालच, धमकी या अधिकार के दुरुपयोग से धर्मांतरण कराने वाली गतिविधियों को संरक्षण नहीं मिल सकता। कोर्ट ने आरोपित महिला स्वास्थ्यकर्मी की याचिका खारिज कर मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में जारी रखने का आदेश दिया है।

गुजरात हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि किसी व्यक्ति को अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार है, लेकिन बल, लालच, धोखे या दबाव से जुड़े ऐसे काम, जिनका उद्देश्य धर्म परिवर्तन कराना हो, कानून के तहत अपराध हो सकते हैं।

कोर्ट एक महिला स्वास्थ्यकर्मी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिस पर अपने अधीन काम करने वाली ASHA कार्यकर्ताओं पर ईसाई धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने का आरोप है। हाई कोर्ट ने FIR और चार्जशीट को रद्द करने से इनकार कर दिया और मामले को ट्रायल कोर्ट के सामने आगे बढ़ने की अनुमति दे दी।

क्या था मामला?

यह मामला गुजरात के आनंद जिले में स्थित बामणवा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में काम करने वाली एक महिला स्वास्थ्यकर्मी के खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़ा है। उसके खिलाफ एक ASHA फैसिलिटेटर और चार अन्य ASHA कार्यकर्ताओं ने शिकायत की थी।

शिकायत के अनुसार, करीब तीन साल तक ASHA कार्यकर्ताओं को सरकारी काम और स्वास्थ्य से जुड़ी आधिकारिक बैठकें खत्म होने के बाद भी रुकने के लिए कहा जाता था। इसके बाद उनसे ईसाई मजहब के बारे में बात की जाती थी, उन्हें बाइबल पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और बताया जाता था कि हिंदू धर्म में की जाने वाली मूर्ति पूजा गलत है।

शिकायत में आगे कहा गया कि महिला अपने मोबाइल फोन पर ASHA कार्यकर्ताओं को यूट्यूब पर ईसाई मजहब से जुड़े वीडियो दिखाती थी। इन वीडियो में जीसस क्राइस्ट के वापस आने, मौजूदा दुनिया के खत्म होने के बाद एक नई दुनिया बनने और ईसाई मजहब की अलग-अलग शिक्षाओं के बारे में बताया जाता था।

महिलाओं ने कहा कि जब हिंदू कर्मचारी वीडियो देखने या ऐसी चर्चाओं को सुनने से इनकार करती थीं, तो उन्हें काम से जुड़े परिणाम भुगतने की धमकी दी जाती थी। शिकायत के अनुसार, उन्हें बताया जाता था कि उनका मासिक भत्ता या वेतन काटा जा सकता है और उनकी नौकरी भी जा सकती है।

शिकायत में कहा गया कि इससे महिलाएँ लगातार मानसिक दबाव में रहती थीं। मामले में वडोदरा की एक घटना का भी जिक्र किया गया है। महिलाओं को बताया गया था कि उन्हें सरकारी स्वास्थ्य विभाग की एक बैठक के लिए वहाँ ले जाया जा रहा है। लेकिन वडोदरा पहुँचने के बाद उन्हें पता चला कि वहाँ एक बड़ा ईसाई कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

शिकायत के अनुसार, महिलाओं को सरकारी बैठक के नाम पर वहाँ ले जाया गया था, जहाँ धर्मांतरण की कोशिश के तहत नाटक और भाषण आयोजित किए गए थे।

आरोपित महिला ने किया हाई कोर्ट का रुख

मामले में आरोपित महिला ने FIR और चार्जशीट को रद्द कराने की माँग को लेकर गुजरात हाई कोर्ट का रुख किया। उसके वकील ने कोर्ट को बताया कि वह Jehovah’s Witnesses की अनुयायी है और बाइबल की शिक्षाओं का प्रचार करना उसकी धार्मिक मान्यता का हिस्सा है।

वकील ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का मौलिक अधिकार देता है। बचाव पक्ष ने कहा कि किसी को धर्म परिवर्तन के लिए न तो मजबूर किया गया और न ही कोई लालच दिया गया।

उसका कहना था कि महिला ने केवल कर्मचारियों को मजहबी साहित्य दिया था और उन्हें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री दिखाई थी। वकील ने यह भी कहा कि वडोदरा का कार्यक्रम स्वेच्छा से आयोजित था। बचाव पक्ष ने आगे दावा किया कि शिकायत व्यक्तिगत दुश्मनी की वजह से दर्ज कराई गई थी।

उसने यह सवाल भी उठाया कि क्या शिकायतकर्ता दूसरे कर्मचारियों की ओर से शिकायत दर्ज करा सकती थी। एक और दलील यह दी गई कि जिला मजिस्ट्रेट से पहले अनुमति लिए बिना चार्जशीट दाखिल की गई थी और इसलिए पूरी कार्रवाई को रद्द कर दिया जाना चाहिए।

पुलिस की जाँच और बैंक लेन-देन

सरकारी वकील ने याचिका का विरोध किया और कोर्ट को जाँच के दौरान जुटाए गए सबूतों के बारे में बताया। सरकार के अनुसार, पुलिस को पता चला कि शिकायतकर्ता और अन्य महिलाओं को What the Holy Bible Teaches नाम की बाइबल की प्रतियाँ दी गई थीं। आरोपित महिला का मोबाइल फोन और लैपटॉप भी जाँच के लिए FSL भेजा गया है।

सरकारी वकील ने कहा कि आरोपित महिला सीधे Jehovah’s Witnesses of India (JWI) नाम के संगठन से जुड़ी हुई थी। सरकार ने बताया कि संगठन के साथ उसके संबंधों और वित्तीय लेन-देन की जाँच में करोड़ों रुपए के लेन-देन का भी पता चला है।

कोर्ट के सामने रखी गई जानकारी के अनुसार, JWI के एक खाते से आरोपित महिला के ICICI बैंक खाते में 10 करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए थे। बाद में इस खाते से 7 करोड़ रुपए से अधिक निकाले गए। इसी तरह JWI की ओर से उसके HDFC बैंक खाते में 20 करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए थे, जिनमें से 19 करोड़ रुपए से अधिक निकाल लिए गए।

पुलिस ने आरोपित महिला के घर की तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में ईसाई मजहब और बाइबल से संबंधित साहित्य भी बरामद किया। बरामद सामग्री में गुजराती और हिंदी भाषा की बाइबल की किताबें, बाइबल के अध्ययन और Jehovah’s Witnesses से संबंधित किताबें, साथ ही 2025 Great Convention–Devotion to Jehovah से जुड़े पर्चे शामिल थे। पुलिस ने कई किताबें, डायरियाँ और नोटबुक भी बरामद कीं।

गुजरात हाई कोर्ट ने क्या कहा?

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 लोगों को अपने धर्म को मानने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। हालाँकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

कोर्ट ने कहा कि स्वेच्छा से अपने धर्म का प्रचार करने पर कोई रोक नहीं है। लेकिन जब इसमें बल, धोखा, लालच, धमकी या अधिकार का गलत इस्तेमाल शामिल हो, तो ऐसी गतिविधियों को संविधान के तहत सुरक्षा नहीं मिलती और ये अपराध हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी दूसरे धर्म या मूर्ति पूजा की आलोचना करते हुए अपने संप्रदाय को श्रेष्ठ बताना भारतीय धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि शिकायतकर्ता को मामला दर्ज कराने का अधिकार नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि अवैध धर्म परिवर्तन से जुड़े गंभीर मामलों में ‘पीड़ित व्यक्ति’ यानी ‘Aggrieved person’ के अर्थ को व्यापक रूप से समझना होगा। कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कोई भी पीड़ित व्यक्ति या संगठन पुलिस के पास जा सकता है।

हाई कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट से पहले अनुमति लेने से जुड़ी दलील को भी खारिज कर दिया। राज्य सरकार ने ऐसे दस्तावेज कोर्ट के सामने पेश किए, जिनसे पता चला कि आनंद के जिला मजिस्ट्रेट ने 6 मार्च 2026 को जरूरी कानूनी मंजूरी दे दी थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हालांकि आरोपी महिला के पास ASHA कार्यकर्ताओं के वेतन पर सीधा नियंत्रण नहीं था, लेकिन वह उनकी सुपरवाइजर थी। उसने अपने पद का इस्तेमाल ASHA कार्यकर्ताओं को प्रभावित करने या उन पर दबाव बनाने के लिए किया था या नहीं, इसकी जाँच ट्रायल कोर्ट में की जाएगी।

हाई कोर्ट ने कहा कि जाँच के दौरान जुटाए गए सबूत पहली नजर में यह दिखाते हैं कि अपराध बनता है। इसलिए Bhajan Lal मामले में तय किए गए सिद्धांतों के तहत इस चरण पर FIR और चार्जशीट को रद्द नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह मामले की स्वतंत्र रूप से और कानून के अनुसार सुनवाई करे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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