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‘मुस्लिम पीड़ित’ का नैरेटिव फैलाने वाले APCR की साजिश, TCS नासिक कांड में जिहादियों को क्लीन चिट देने की कोशिश: बनाई प्रोपेगेंडा रिपोर्ट

रिपोर्ट में किए गए दावों के मुताबिक, TCS नासिक मामले में जाँच एजेंसियों ने किसी भी तरह की संगठित धर्मांतरण साजिश की पुष्टि नहीं की है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस मामले में 'धर्म के आधार पर जबरदस्ती' के पहलू को जरूरत से ज्यादा अहम बना दिया गया है जबकि APCR की टीम के अनुसार ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के प्रेस क्लब में गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को विवादास्पद संगठन ‘एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स’ यानी APCR ने एक कथित फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि नासिक के टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के आफिस में उत्पीड़न मामले में धर्म परिवर्तन की किसी संगठित गतिविधि का कोई सबूत नहीं मिला है।

गौरतलब है कि नासिक TCS कांड के बाद पूरे देश में गुस्सा है। TCS दफ्तर में काम करने वालीं कई हिंदू महिलाओं ने BPO यानी बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग दफ्तर में कुछ मुस्लिम कर्मचारियों द्वारा यौन उत्पीड़न और धार्मिक रूप से दबाव बनाए जाने की कहानियाँ सामने रखीं।

APCR का कहना है कि उसकी 5 सदस्यीय टीम ने नासिक जाकर जमीनी हकीकत जानने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट जारी करते समय APCR के साथ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (PUCL), सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP), बॉम्बे कैथोलिक सभा (BCS) और अन्य संगठनों के कार्यकर्ता भी मौजूद थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस मामले में दर्ज 9 FIR में अलग-अलग शिकायतकर्ताओं के आरोप एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। साथ ही रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि जाँच एजेंसियों ने धर्म परिवर्तन की किसी संगठित साजिश की पुष्टि नहीं की है। APCR ने यह भी कहा कि इस मामले में धार्मिक दबाव के पहलू को बिना की खास वजह से केंद्र में रखा जा रहा है जबकि उनकी टीम को ऐसी किसी भी गतिविधि का कोई ठोस सबूत नहीं मिला।

APCR ने की ‘मुस्लिम पीड़ित’ का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश

रिपोर्ट में किए गए दावों के मुताबिक, TCS नासिक मामले में जाँच एजेंसियों ने किसी भी तरह की संगठित धर्मांतरण साजिश की पुष्टि नहीं की है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस मामले में ‘धर्म के आधार पर जबरदस्ती’ के पहलू को जरूरत से ज्यादा अहम बना दिया गया है जबकि APCR की टीम के अनुसार ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जो किसी संगठित या व्यवस्थित धर्मांतरण गतिविधि को साबित करता हो।

APCR के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान ने रिपोर्ट जारी करते समय कहा कि सिविल सोसायटी संगठनों को नासिक पुलिस की जाँच पर भरोसा नहीं है। नदीम ने माँग की कि इस मामले की जाँच किसी रिटायर्ड हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज से कराई जाए। नदीम पर नवंबर 2024 में दिल्ली पुलिस ने एक सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील प्रदर्शनी के दौरान आपराधिक साजिश रचने और समाज में वैमनस्य फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया था।

पीड़ितों के बयानों पर सवाल उठाते हुए खान ने इस मामले को मुसलमानों को कॉरपोरेट नौकरियों से दूर रखने की साजिश बताया। नदीम ने कहा, “इस मुद्दे का इस्तेमाल मुसलमानों को कॉरपोरेट क्षेत्र में नौकरी पाने से रोकने के लिए किया जाएगा। यह मानना मुश्किल है कि किसी को 24 घंटे रोजा रखने के लिए मजबूर किया जा सकता है। पुलिस द्वारा दर्ज FIR में कई सवाल खड़े होते हैं और उनकी भूमिका भी संदिग्ध लगती है।”

खान ने नासिक पुलिस द्वारा किए गए उस अंडरकवर ऑपरेशन पर भी सवाल उठाए जिसके जरिए पूरे मामले का खुलासा हुआ था। उन्होंने पूछा कि जब पुलिसकर्मी तीन हफ्तों तक बीपीओ में काम कर रहे थे, तो वे आरोपित निदा खान की नौकरी की भूमिका क्यों नहीं समझ पाए। गौरतलब है कि TCS ने हाल ही में एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि निदा खान बीपीओ में HR मैनेजर नहीं बल्कि प्रोसेस एसोसिएट के पद पर कार्यरत है।

‘एक्टिविस्ट’ तीस्ता सीतलवाड़ ने भी इस मामले को ‘मनगढ़ंत’ बताया है। उन्होंने कहा, “नासिक का यह मामला बनाया हुआ है और अदालत में टिक नहीं पाएगा। यहाँ प्रक्रिया ही सजा बन गई है। किसी भी अपराध को धर्म या जाति के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि निदा खान को उनके जेंडर के कारण निशाना बनाया जा रहा है।” इसी दौरान, तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा कि महाराष्ट्र में दर्ज कुल 12,019 मामलों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों की संख्या सबसे कम है।

रिपोर्ट जारी करने के दौरान मौजूद अन्य तथाकथित एक्टिविस्टों ने पूरे मामले को नासिक के ज्योतिषी अशोक खरात से जुड़े कथित यौन शोषण के मामले को दबाने की साजिश बताया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि TCS नासिक मामला, सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए नासिक नगर निगम द्वारा कथित तौर पर पेड़ों की कटाई और एक अन्य कथित हाउसिंग घोटाले से जनता का ध्यान भटकाने के लिए रचा गया है।

FIR में दर्ज पीड़िताओं का दर्द

APCR की रिपोर्ट में किए गए दावे नासिक TCS ऑफिस उत्पीड़न मामले में दर्ज कई FIR में पीड़ितों द्वारा बताए गए यौन उत्पीड़न और धार्मिक दबाव के मामलों को देखने के बाद कमजोर नजर आते हैं। इस कथित ‘ग्रूमिंग जिहाद’ मामले में पहली FIR 23 मार्च को नासिक के देवळाली कैंप पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी।

FIR दर्ज होने के बाद मामले की जाँच के लिए कुछ महिला पुलिसकर्मियों को कंपनी में अंडरकवर भेजा गया। इस जाँच में ऐसे कई मामलों का खुलासा हुआ जिनमें पीड़ित महिलाओं ने बताया कि उन्हें वर्षों तक यौन उत्पीड़न, अश्लील टिप्पणियाँ, जबरन नजदीकी बढ़ाने की कोशिश, निजी जीवन से जुड़े आपत्तिजनक सवाल और हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक बातें झेलनी पड़ीं। इसके बाद कई पीड़ित सामने आईं और आरोपितों के खिलाफ FIR दर्ज कराई।

पीड़ितों की शिकायतों के अनुसार, कंपनी में काम करने वाले छह मुस्लिम कर्मचारी हिंदू महिलाओं पर इस्लाम कबूल करने, नमाज पढ़ने और गोमांस खाने का दबाव बना रहे थे। यह उत्पीड़न करीब चार साल तक चलता रहा।

3 अप्रैल 2026 की एक एफआईआर में 23 साल की एक हिंदू पीड़िता ने बताया कि रजा मेमन और शाहरुख कुरैशी ने उसके साथ अश्लील टिप्पणियां कीं और हिंदू परंपराओं का मजाक उड़ाया। 2 अप्रैल 2026 को दर्ज एक अन्य एफआईआर में एक और 23 वर्षीय हिंदू महिला ने 5 आरोपितों के नाम लिए और बताया कि उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया और उसे धार्मिक अपमान सहना पड़ा।

एक अन्य FIR में बताया गया कि आरोपितों ने हिंदू देवी-देवताओं ब्रह्मा, राम और सीता का मजाक उड़ाया। आरोपितों ने ब्रह्मा को अपनी ही बेटी का अपराधी बताया और यह दावा किया कि राम और सीता ने वनवास के दौरान मांस खाया था। इसके अलावा भगवान शिव के अस्तित्व का भी मजाक उड़ाया गया और भगवान गणेश के पिता को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गईं।

पीड़िताओं ने अपनी शिकायतों में यह भी बताया कि आरोपितों के गलत व्यवहार, खासकर हिंदू धार्मिक मान्यताओं के लगातार मजाक उड़ाने की शिकायतें बार-बार करने के बावजूद उन पर ध्यान नहीं दिया गया। पीड़ितों के बयानों से यह भी सामने आता है कि आरोपितों ने कार्यस्थल पर अपने पद का फायदा उठाकर यौन उत्पीड़न, शोषण और कथित धार्मिक दबाव से जुड़ी शिकायतों को दबाने की कोशिश की जिससे उन्हें इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया जा सके।

इन सभी तथ्यों के बावजूद APCR की रिपोर्ट में पीड़ितों द्वारा बताई गई इन बातों को नजरअंदाज किया गया और रिपोर्ट को चुनिंदा व तोड़े-मरोड़े गए तथ्यों के आधार पर तैयार किया गया है।

APCR का ‘मुस्लिम पीड़ित’ नैरेटिव को बढ़ावा देने का इतिहास

APCR खुद को एक गैर-लाभकारी संगठन के रूप में पेश करता है जो ‘कानून और न्याय के बीच की दूरी को कम करने’ का काम करता है लेकिन इसका ट्रैक रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बताता है। साल 2006 में गठित और सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत यह संगठन दावा करता है कि वह मुफ्त कानूनी सहायता, आर्थिक मदद और वर्कशॉप व सेमिनार के जरिए कानूनी जागरूकता कार्यक्रम चलाता है।

हालाँकि, यह संगठन कई बार विवादित मामलों में नजर आया है, जहाँ इसने हिंसक घटनाओं में आरोपित लोगों को कानूनी सहायता दी है। संभल हिंसा और दिल्ली में हुए दंगों के मामलों में। इसके तथाकथित ‘फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट’ अक्सर निष्पक्ष दस्तावेज की बजाय एकतरफा नजरिए वाली रिपोर्ट लगती हैं, जिनका मकसद कुछ समूहों को बचाना और दूसरों को कठघरे में खड़ा करना बताया जाता है।

यह पहली बार नहीं है जब APCR पर ‘मुस्लिम पीड़ित’ का नैरेटिव गढ़ने का आरोप लगा हो। जुलाई 2024 में भी इस संगठन ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें दावा किया गया था कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भारत में मुस्लिम विरोधी अपराध बढ़ गए हैं। इस रिपोर्ट का इस्तेमाल कई मीडिया संस्थानों जैसे फ्री प्रेस जर्नल, क्लैरियन, मुस्लिम मिरर आदि ने भी इसी तरह के दावे करने के लिए किया था।

APCR पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वह चुनिंदा तथ्यों को उठाकर और आंशिक जानकारी के आधार पर रिपोर्ट तैयार करता है। आलोचकों के मुताबिक, इससे देश में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने की कोशिश की जाती है। APCR के इन दावों की हमने ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में पोल खोली थी।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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