Wednesday, August 4, 2021
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8 साल की उम्र में AK-47 और कुरान: अब्बू-अम्मी-भाई-बहन की मौत के बाद 13 साल के ‘आतंकी’ को लंदन की याद

“लंदन में जन्मदिन मनाते थे, केक खाते थे। मैं अम्मी को याद करता हूँ। वो मर गई। दो बहनें, दो भाई थे। बड़ा भाई अल शद्दादी में मरा, छोटा अम्मी और बहन के साथ। बड़ी बहन की शादी ISIS के आदमी से हुई थी।”

ISIS में बर्बरता की कहानियों में आज मामला एक 13 साल के लड़के का है, जिसे ISIS आतंकियों ने तब से अपने कब्जे में रखा, जब से वो 8 साल का था। अब्दुल्ला नाम का ये बच्चा मूलत: तो पाकिस्तान से है लेकिन पला-बढ़ा ये लंदन में। बाद में इसे इसके अब्बू-अम्मी छोटी बहन और 2 भाइयों के साथ सीरिया ले आए। आज वो सब मर चुके हैं और ये अकेला लड़का डिटेंशन कैंप में है, जहाँ से वह अपने ब्रिटेन वाले घर लौटना चाहता है।

अब्दुल्ला की कहानी पत्रकार एंड्रियू ड्रूरी के माध्यम से हम तक पहुँचती है, जिन्होंने जून की शुरुआत में अपनी आने वाली फिल्म ‘डेंजर जोन’ के लिए वहाँ जाकर अबदुल्ला से बात की। डेलीमेल की खबर के अनुसार, अब्दुल्ला ने बात करते हुए बताया कि वह फुटबॉल क्लब चेल्सी (chelsea) और फास्टफूड चेन मैकडोनल्ड (mcdonalds) का फैन है।

अब्दुल्ला के अनुसार उसके परिवार के अधिकांश लोग मार्च 2019 में अमेरिकी हवाई हमलों में मारे गए। उसे अब कुर्द द्वारा संचालित होरी सेंटर में रखा जा रहा है। ये एक तरह से उन लड़कों के लिए पुनर्वास सुविधा है, जो ISIS की हिंसा में आरोपित हैं।

अब्दुल्ला अपनी ठीक-ठाक अंग्रेजी में ये बताने की कोशिश करता है कि उसे सीरिया में आए 1 साल से भी कम का समय हुआ था, जब उसे एके-47 राइफल का इस्तेमाल करना सिखाया गया। वह ये भी दावा करता है कि उसने कभी इसका इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन आईएसआईएस चाहता था कि वह और अन्य बच्चे ऐसा करें।

अब्दुल्ला उन बच्चों में से एक है, जिन्हें ISIS ने ‘खिलाफत कब्स’ के रूप में बिलकुल उसी तरह बढ़ावा दिया, जैसे हिटलर ने युवाओं को दिया था। उसने बताया कि जब वह पहली बार ISIS स्कूल गया तो उसे सिखाया ये गया था कि कैसे हथियार चलाना है। यह बात अब्दुल्ला ने अपनी अम्मी को बताई थी।

अब्दुल्ला ने अपनी अम्मी से कहा था,

“मैं ये सब नहीं कर सकता। मेरी अम्मी ने मुझे कहा कि मैं दूसरे स्कूल जाऊँ। फिर दूसरे स्कूल में भी मुझे कुरान और यही सब चीजें सिखाई गईं। मैं लंदन से हूँ और मूलत: पाकिस्तान से। लेकिन मेरे पास पासपोर्ट लंदन का है। मुझे याद ही नहीं है कि बघौज (जहाँ उसकी माँ-बहन मारी गई) में कब आए। यहाँ बहुत एयरस्ट्राइक होती थी। इनमें से कई को तो मैं भूल चुका हूँ।”

डेली मेल की खबर के अनुसार अब्दुल्ला का झुकाव जापानी कार्टून बनाने की ओर है। हालाँकि उसे ये तक नहीं मालूम कि उसका जन्मदिन कब आता है। अब्दुल्ला के अनुसार, उसे पहले इसकी जानकारी थी लेकिन अब वो भूल चुका है। वह कहता है,

“लंदन में जब हम थे तो जन्मदिन मनाते थे, केक खाते थे। लेकिन यहाँ कभी ऐसा नहीं हुआ। मैं अपनी माँ को याद करता हूँ। उन्हें बघौज में मारा गया। कई लोगों ने मुझे बताया कि वो मर गई हैं। दो बहनें थीं। एक मुझसे बड़ी और एक छोटी और दो भाई थे। बड़ा भाई अल शद्दादी में मरा और छोटा मेरी माँ और बहन के साथ। मेरी बड़ी बहन की शादी हुई थी और वह आदमी ISIS का था, मैं उस आदमी के साथ रह रहा था, लेकिन फिर उसकी हत्या कर दी गई।”

वह बताता है कि उसके जीजा की मौत के बाद लोगों ने उसे कहा कि वह बघौज से बाहर आए क्योंकि ये जगह उसके लिए सही नहीं है। वह ये भी मानता है कि ISIS का कोई अपना भविष्य नहीं है। बघौज में उसने एक आदमी को खुद को उड़ाते हुए देखा था।

आज अब्दुल्ला और उसके जैसे 50 लड़कों के पुनर्वास के लिए उन्हें 9 घंटे डिटेंशन सेंटर में बंद रखा जाता है, जहाँ कुर्द डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी (पीवाईडी) युवाओं के लिए काम कर रही है। लेकिन अब्दुल्ला को अब उसका लंदन वाला घर याद आता है। वह कम्प्यूटर और फास्टफूड को मिस करता है। प्लेस्टेशन पर गेम खेलने की सोचता है। लेकिन वह ये नहीं कर सकता क्योंकि वह एक तरह की जेल में है।

उसके मुताबिक, वहाँ 9 बजे दरवाजे बंद हो जाते हैं और उन्हें 6 बजे उठा दिया जाता है। इसके बाद उन्हें खिलाया जाता है। फिर ब्रेकफास्ट और फिर लंच और इसके बाद फिर वो खाली बैठते हैं और मिल कर आपस में बात करते हैं। इस डिटेंशन सेंटर में अब्दुल्ला डेढ़ साल है। इससे पहले एक साल रक्का में भी रहा, जो बघौज से बेहतर जगह थी। वहाँ उसे इंटरनेट मिला और कार भी। लेकिन अब जहाँ वह है, वहाँ मैकडॉनल्ड भी नहीं है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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