इस्लामो-वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग अपने समर्थकों का खुलकर बचाव करते हैं। अब चाहे उन पर आतंकवाद से सहानुभूति, देश विरोधी गतिविधियों या दंगों की साजिश जैसे गंभीर आरोप ही क्यों न हों। ऐसा ही एक नाम है उमर खालिद, जो 2020 के दिल्ली दंगों का आरोपित है और पिछले पाँच साल से अधिक समय से जेल में बंद है।
उमर खालिद को लेकर देश और विदेश के वामपंथी और तथाकथित उदारवादी मीडिया से लेकर तमाम नेता तक लगातार उसके समर्थन में आवाज उठाते रहे हैं। इसी कड़ी में अब अमेरिका से उमर खालिद प्रेम नया मामला सामने आया है, जिसे ‘फ्री उमर खालिद’ अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को अमेरिका के डेमोक्रेट पार्टी के 8 सांसदों ने भारत सरकार को एक पत्र लिखकर उमर खालिद को जमानत देने और निष्पक्ष सुनवाई की माँग की है।
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में इल्हान उमर, राशिदा तलीब, प्रमिला जयपाल, जिम मैकगवर्न, जैमी रस्किन, क्रिस वैन हॉलन, पीटर वेल्च, जैन शाकोव्स्की और लॉयड डॉगेट शामिल हैं।
यह पत्र भारत में अमेरिका के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के नाम लिखा गया है। इसमें अमेरिकी सांसदों ने लिखा कि वे फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में आरोपितों की लंबे समय से चल रही हिरासत को लेकर परेशान हैं, जिनमें छात्र नेता और शोधकर्ता बताया गया उमर खालिद भी शामिल हैं।
पत्र में इन सांसदों ने लोकतंत्र, आजादी, कानून का शासन, मानवाधिकार और बहुलतावाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए भारतीय सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की है। उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि उमर खालिद निर्दोष है और उसे रिहा किया जाना चाहिए।
इन सांसदों ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण बताया और 2020 के दिल्ली दंगों में मुसलमानों को पीड़ित के रूप में दिखाया गया है।
अमेरिकी सांसद जिम मैकगवर्न ने CAA को मौलिक रूप से भेदभावपूर्ण बताया और कहा कि यह कानून मुसलमानों को बाहर रखता है। हालाँकि, इन सांसदों ने यह नहीं बताया कि इस्लामिक या मुस्लिम बहुल देशों में मुस्लिमों को उनके मजहब होने के कारण कैसे प्रताड़ित किया जा सकता है, जबकि CAA उन्हीं अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात करता है जो वहाँ सताए जाते हैं।
आलोचकों का कहना है कि अमेरिकी डेमोक्रेट नेताओं ने इस पूरे मामले में भारत की संप्रभुता, न्यायिक प्रक्रिया और जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज करते हुए एकतरफा रुख अपनाया है और सामान्य तर्क को भी भेदभाव बताने की कोशिश की है।
Earlier this month, I met with the parents of Umar Khalid, who has been jailed in India for over 5 years without trial. @RepRaskin & I are leading our colleagues to urge that he be granted bail & a fair, timely trial in accordance with international law. pic.twitter.com/tBIbG1aOwc
— Rep. Jim McGovern (@RepMcGovern) December 30, 2025
अमेरिका के डेमोक्रेट सांसदों ने उमर खालिद के लंबे समय से जेल में रहने को सरकार की नाइंसाफी और सही कानूनी प्रक्रिया न होने का नतीजा बताने की कोशिश की। उन्होंने इशारों-इशारों में उसे बेगुनाह भी दिखाने का प्रयास किया। लेकिन हकीकत यह है कि यह बात जमीनी तथ्यों से मेल नहीं खाती है।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 और 2024 में उमर खालिद के मामले में कुल 14 बार सुनवाई टली जिनमें से कम से कम 7 बार तारीख टालने की माँग खुद उमर खालिद की ओर से की गई थी। इससे साफ है कि जमानत याचिका वापस लेने की वजह कोर्ट की देरी नहीं बल्कि बचाव पक्ष द्वारा बार-बार माँगी गई तारीखें थीं।
इसके बावजूद इस्लामो-वामपंथी समूह लगातार नाइंसाफी का शोर मचाते रहे। हकीकत यह है कि उमर खालिद की लंबे समय तक जेल में रहने की एक बड़ी वजह उसके वकीलों द्वारा मनचाहे जज से सुनवाई कराने की कोशिश यानी ‘फोरम शॉपिंग’ रही। इस पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भी टिप्पणी की थी।
उन्होंने कहा था कि समस्या अदालतों में नहीं बल्कि कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की उस सोच में है जो चाहते हैं कि उनके मामले केवल कुछ खास जज ही सुनें। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के नेतृत्व में उमर खालिद की कानूनी टीम ने कम से कम 7 बार सुनवाई टलवाई और आखिरकार फरवरी 2024 में परिस्थितियों में बदलाव का हवाला देकर जमानत याचिका वापस ले ली।
अमेरिकी सांसदों और अमेरिका की संस्था USCIRF (United States Commission on International Religious Freedom) ने दिल्ली दंगों के अन्य आरोपितों शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और खालिद सैफी को भी मजहबी स्वतंत्रता के उल्लंघन का शिकार बताने की कोशिश की। जबकि इन पर गंभीर आरोप हैं।
शरजील इमाम ने भारत के चिकन नेक कॉरिडोर को अलग करने की बात कही थी, जो भारत को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। गुलफिशा फातिमा पर आरोप है कि उसने 2020 में मुस्लिम महिलाओं को हिंसक प्रदर्शनों के लिए उकसाया और पुलिस पर डंडों और लाल मिर्च पाउडर से हमला करवाया। वहीं, अब्दुल खालिद सैफी पर हथियारों की व्यवस्था के लिए फंड जुटाने और प्रदर्शन स्थलों को चलाने का आरोप है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि USCIRF पर पहले से ही भारत विरोधी एजेंडा चलाने के आरोप लगते रहे हैं। इस संस्था पर इस्लामी चरमपंथियों को कार्यकर्ता बताने, हिंदुओं को बदनाम करने और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई मोदी सरकार को निशाना बनाने के आरोप हैं। यह सब भारत में मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर किया जाता है।
डेमोक्रेट सांसदों के पत्र में 2020 के दिल्ली दंगों को भड़काने वालों को और मुस्लिम समुदाय को पीड़ित के तौर पर दिखाया गया, साथ ही इशारों में यह भी कहा गया कि दंगों के लिए हिंदू जिम्मेदार थे। लेकिन इस पत्र में यह उल्लेख नहीं किया गया कि उन्हीं दंगों में दिल्ली पुलिस के एक हेड कांस्टेबल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक कर्मचारी की मौत हुई थी।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी, जो अपने हिंदू और भारत विरोधी बयानों के लिए जाने जाते हैं, उसने उमर खालिद के समर्थन में एक पत्र लिखा। इन सभी तथ्यों को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि अमेरिकी डेमोक्रेट सांसदों का यह पत्र पक्षपाती है, मुस्लिम पीड़ित होने की राजनीति से प्रेरित है और दिल्ली दंगों व भारत की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े अहम तथ्यों को नजरअंदाज करता है।
जिम मैकगवर्न: CAA और धर्मांतरण विरोधी कानूनों का विरोध, भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चिंता बताने की वकालत और अब उमर खालिद के लिए रोना
जेम्स पैट्रिक मैकगवर्न, जिन्हें आमतौर पर जिम मैकगवर्न कहा जाता है, साल 2013 से अमेरिका के मैसाचुसेट्स के दूसरे संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लगातार आलोचक रहे हैं। मैकगवर्न कई बार यह दावा कर चुके हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत में मानवाधिकार, मजहबी स्वतंत्रता और लोकतंत्र कमजोर हो रहे हैं।
जनवरी 2022 में जिम मैकगवर्न ने भारत के 73वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष अमेरिकी संसदीय ब्रीफिंग को संबोधित किया था। इस ब्रीफिंग में उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार हिंदू राष्ट्रवादी नीतियों को बढ़ावा दे रही है और देश में मजहबी स्वतंत्रता व मानवाधिकार पीछे जा रहे हैं।
उन्होंने भारतीय इस्लामो-वामपंथी समूहों द्वारा फैलाए जा रहे इस दावे को भी दोहराया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) मिलकर मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव को संस्थागत रूप देंगे। इस कार्यक्रम में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी शामिल थे।
यह ब्रीफिंग अमेरिका की 17 तथाकथित अधिकार संगठनों के गठबंधन द्वारा आयोजित की गई थी, जिनमें इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC), हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) और सिख कोएलिशन जैसी संस्थाएँ शामिल थीं। इन संगठनों पर लंबे समय से भारत और हिंदुओं के खिलाफ दुष्प्रचार करने और अमेरिका में हिंदू समुदाय के खिलाफ लॉबिंग करने के आरोप लगते रहे हैं।
मैकगवर्न ने दावा किया था कि 2019 में पहली बार भारत में ऐसा कानून पास हुआ जिसने नागरिकता को धर्म से जोड़ा और CAA को NRC के साथ जोड़ते हुए यह डर फैलाया कि इससे मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव होगा।
जबकि हकीकत यह है कि CAA का NRC से कोई संबंध नहीं है और यह कानून भारतीय मुसलमानों से जुड़ा ही नहीं है। CAA को 2024 में लागू किया गया और इसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश व अन्य मुस्लिम-बहुल देशों से आए प्रताड़ित हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और ईसाई अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जा रही है। अब तक किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता नहीं छीनी गई है।
2019 में यह सवाल जरूर उठा था कि CAA में मुसलमानों को क्यों नहीं जोड़ा गया, खासकर जब पाकिस्तान में शिया और अहमदिया समुदाय पर अत्याचार होते हैं। लेकिन इसकी वजह भेदभाव नहीं है। असल में शिया और अहमदिया खुद को मुसलमान मानते हैं, इसलिए उनके साथ होने वाली हिंसा को धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर की सांप्रदायिक हिंसा माना जाता है। इसके बावजूद जिम मैकगवर्न आज भी CAA को भेदभाव वाला कानून बताते हैं।
हाल ही में उमर खालिद को जमानत और निष्पक्ष सुनवाई की माँग वाले पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए भी उन्होंने इसी झूठे नैरेटिव को दोहराया। उन्होंने मदर टेरेसा द्वारा स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी का विदेशी फंडिंग लाइसेंस (FCRA) नवीनीकरण न होने को ईसाइयों के खिलाफ भेदभाव बताया जबकि असल वजह यह थी कि संस्था ने जरूरी दस्तावेज जमा नहीं किए थे। दस्तावेज पूरे होते ही कुछ ही दिनों में लाइसेंस बहाल कर दिया गया।
मैकगवर्न ने यह भी कहा कि मजहबी पहचान के आधार पर भेदभाव की चिंता इतनी गंभीर है कि USCIRF ने भारत को कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न घोषित करने की सिफारिश की है। उन्होंने मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए UAPA और अन्य सख्त आतंकवाद विरोधी कानूनों पर भी आरोप लगाया कि इनका इस्तेमाल पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और असहमति रखने वालों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
हालाँकि, उन्होंने यह नजरअंदाज कर दिया कि इन कानूनों के तहत कार्रवाई पत्रकारिता या एक्टिविज्म के कारण नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की अखंडता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों के आरोपों के आधार पर की जाती है।
जिम मैकगवर्न का झुकाव इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) जैसी खुलकर हिंदू-विरोधी संस्थाओं की ओर भी रहा है। साल 2016 में IAMC ने वॉशिंगटन डीसी में टॉम लैंटोस ह्यूमन राइट्स कमीशन के सामने गवाही दी थी, जिसमें भारत में मजहबी अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव का आरोप लगाया गया। मैकगवर्न ने IAMC के इन दावों को दोहराया। IAMC पर प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़े होने के आरोप भी लग चुके हैं।
दिलचस्प बात यह है कि उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास SIMI के पूर्व सदस्य रह चुके हैं और वह वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के प्रमुख नेता हैं। नवंबर 2025 में इस पार्टी के छात्र संगठन ने दिल्ली में तथाकथित ‘एंटी एयर पॉल्यूशन’ प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसे कई लोग अर्बन नक्सलियों का विरोध प्रदर्शन मानते हैं।
IAMC के संस्थापक शेख उबैद के जरिए इस संगठन के लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जमात-ए-इस्लामी (JeI) से संबंधों के भी आरोप हैं। IAMC पर USCIRF के जरिए भारत को बदनाम करने, फर्जी खबरें फैलाने और इस्लामी एजेंडा आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं। 2021 में इस पर UAPA भी लगाया गया था। यह संगठन अक्सर हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर भारत और अमेरिका के हिंदुओं को बदनाम करने वाली रिपोर्टें जारी करता है और जोहरान ममदानी जैसे भारत-विरोधी नेताओं का समर्थन करता रहा है।
2019 में जब मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35A हटाकर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया, तब भी मैकगवर्न ने भारत पर बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया कि नेताओं को हिरासत में लिया गया, पत्रकारों पर पाबंदी लगाई गई और प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग हुआ। इसी मुद्दे पर मैकगवर्न ने जेमी रस्किन, जैन शाकोव्स्की और लॉयड डॉगेट के साथ मिलकर एक प्रस्ताव का समर्थन किया था, जिसमें भारत से जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंध और हिरासत खत्म करने की माँग की गई थी। इस प्रस्ताव को प्रमिला जयपाल ने पेश किया था, जो उमर खालिद के समर्थन वाले इस पत्र की भी हस्ताक्षरकर्ता हैं।
जून 2025 में मैकगवर्न ने IAMC से जुड़ी संस्था हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स (H4HR) की सदस्य रिया चक्रवर्ती के साथ मिलकर भारत को मजहबी स्वतंत्रता के मामले में कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न घोषित करने की माँग की। उन्होंने खालिस्तानी अलगाववादी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू का भी समर्थन किया और भारत पर ट्रांसनेशनल दमन का आरोप लगाया। मैकगवर्न लगातार खालिस्तानी गतिविधियों को भारत द्वारा सिखों पर अत्याचार के रूप में पेश करते रहे हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो जिम मैकगवर्न लंबे समय से मुस्लिम पीड़ित होने की कहानी, भारत के खिलाफ प्रचार और हिंदुओं को असहिष्णु व दमनकारी बताने वाले इस्लामो-वामपंथी नजरिये को बढ़ावा देते रहे हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने उमर खालिद के समर्थन में लिखे गए पत्र पर भी हस्ताक्षर किए।
जैन शाकोव्स्की: भारत में इस्लामोफोबिया का रोना रोया, राहुल गाँधी से मिलीं और उमर खालिद के लिए माँगी बेल
जैनिस या जैन शाकोव्स्की अमेरिका के इलिनॉय राज्य के 9वें संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह सार्वजनिक रूप से भारत–अमेरिका के अच्छे संबंधों की बात करती रही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ वह भारत के संदर्भ में मुस्लिम पीड़ित होने का नैरेटिव आगे बढ़ाने वाली गतिविधियों में भी शामिल रही हैं। 2021 में जैन शाकोव्स्की ने कॉम्बैटिंग इंटरनेशनल इस्लामोफोबिया एक्ट नामक बिल को को-स्पॉन्सर किया था।
जैसा कि इस बिल के नाम से ही स्पष्ट है, इसका उद्देश्य दुनिया भर में तथाकथित इस्लामोफोबिया के खिलाफ कार्रवाई करना बताया गया था। इस बिल को अमेरिका की सांसद इल्हान उमर ने पेश किया था, जिन्हें कट्टर इस्लामी एजेंडा और भारत-विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। इस तरह, जैन शाकोव्स्की का यह कदम भी भारत के खिलाफ मुस्लिम पीड़ित होने की राजनीति को समर्थन देने के रूप में देखा जाता है।

वर्ष 2023 में अमेरिका की सांसद जैन शाकोव्स्की ने तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन से यह माँग की थी कि वे भारत के साथ बातचीत के दौरान भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाएँ। इस कदम के जरिए जैन शाकोव्स्की ने एक बार फिर भारत के आंतरिक मामलों पर सवाल खड़े करते हुए मानवाधिकार के नाम पर भारत की आलोचना करने वाला रुख अपनाया।
I join my colleagues in urging @POTUS to raise human rights concerns during Indian Prime Minister Modi’s state visit this week. Respect for human rights is essential to the functioning of true democracy and to the maintenance of a strong relationship between India and the US. https://t.co/LciEN9RCGF
— Jan Schakowsky (@janschakowsky) June 21, 2023
सितंबर 2024 में अमेरिका की सांसद जैन शाकोव्स्की और इल्हान उमर ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से मुलाकात की थी। यह मुलाकात राहुल गाँधी की अमेरिका यात्रा के दौरान हुई, जिसे लेकर उस समय काफी विवाद और चर्चा हुई थी।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से मुलाकात के बाद अमेरिकी सांसद जैन शाकोव्स्की ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुशी जताई। उन्होंने लिखा कि उन्हें भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी से मिलकर अच्छा लगा। शाकोव्स्की ने कहा कि समावेशी विकास, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा और मोदी सरकार को जवाबदेह ठहराने की राहुल गाँधी की सोच भारत के भविष्य के लिए बेहद अहम है।
It was great to meet with India's Opposition Leader, @RahulGandhi!
— Jan Schakowsky (@janschakowsky) September 12, 2024
His push for inclusive growth, protection of minority rights, and holding the Modi government accountable is crucial for India's future. pic.twitter.com/lIELxA5WSw
इसके कुछ महीने बाद, जनवरी 2025 में जैन शाकोव्स्की ने एक बार फिर कॉम्बैटिंग इंटरनेशनल इस्लामोफोबिया एक्ट को दोबारा पेश किया। इस बिल में भारत का नाम साफ तौर पर लिया गया और दावा किया गया कि भारत में मुस्लिमों को उनकी मजहबी पहचान के कारण भेदभाव और सरकारी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। इस बिल को इल्हान ओमार ने पेश किया था और जैन शाकोव्स्की व राशिदा तलीब सहित कई अन्य सांसद इसके को स्पॉन्सर थे।
अब इसी कड़ी में जैन शाकोव्स्की ने उमर खालिद को जमानत देने की माँग करते हुए भारत सरकार को पत्र लिखा है, मानो मोदी सरकार उसकी जमानत या निष्पक्ष सुनवाई में बाधा डाल रही हो जबकि मामला भारत की न्यायपालिका के अधीन है।
प्रमिला जयपाल: अमेरिका की एक हिंदू और भारत-विरोधी आवाज
सूची में अगला नाम प्रमिला जयपाल का है, जो अपने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख के लिए जानी जाती हैं। दिसंबर 2019 में उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें भारत से जम्मू-कश्मीर में लगाए गए संचार प्रतिबंध हटाने की माँग की गई थी।
इसके साथ ही उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने के भारत सरकार के फैसले का खुलकर विरोध किया। उनके इस रुख से भारतीय-अमेरिकी समुदाय खुद को ठगा हुआ, आहत और निराश महसूस करने लगा, क्योंकि यह भारत के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप माना गया।
प्रमिला जयपाल के इसी प्रस्ताव के बाद एक अहम कूटनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल से होने वाली बैठक रद्द कर दी क्योंकि उस प्रतिनिधिमंडल से प्रमिला जयपाल को बाहर करने से इनकार कर दिया गया था।
इस पर विदेश मंत्री जयशंकर ने साफ कहा था कि उन्हें प्रमिला जयपाल की रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर की स्थिति को लेकर कोई निष्पक्ष समझ या भारत सरकार के कदमों का सही आकलन नहीं दिखता और इसलिए उन्हें उनसे मिलने में कोई रुचि नहीं है।
जेमी रस्किन: मुस्लिम पीड़ित होने के नैरेटिव को लगातार आगे बढ़ाने वाले नेता
‘फ्री उमर खालिद’ पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में एक और नाम जेमी रस्किन का है। साल 2023 में जेमी रस्किन ने जैन शाकोव्स्की के साथ मिलकर एक पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर चिंता जताने की माँग की गई थी।
इससे पहले 2020 में रस्किन ने यह फर्जी दावा किया था कि भारतीय सरकार ने सत्तावादी तरीके से एमनेस्टी इंटरनेशनल की गतिविधियों को भारत में रोक दिया। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा था कि भारत द्वारा एमनेस्टी को मानवाधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण करने से रोकना लोकतंत्र के खिलाफ एक शर्मनाक कदम है और उन्होंने उस समय के अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो से अपील की थी कि वे भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इस मुद्दे को उठाएँ।
India’s decision to halt @amnesty's work documenting human rights violations is a scandalous and self-incriminating offense against democracy. @SecPompeo, will you denounce this authoritarian move with @narendramodi during your visit? https://t.co/JohyeVI1XR
— Rep. Jamie Raskin (@RepRaskin) October 27, 2020
हालाँकि, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को लेकर यह दावा गलत है कि मोदी सरकार ने उसके खिलाफ कोई राजनीतिक बदले या विच हंट चलाया। साल 2020 में उसके बैंक खाते फ्रीज किए गए थे, लेकिन यह पहली बार नहीं था। इससे पहले 2018 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने FCRA कानून के उल्लंघन के मामले में एमनेस्टी के ठिकानों पर छापे मारे थे और उसके बैंक खाते फ्रीज किए थे। यह भी स्पष्ट है कि एमनेस्टी की वित्तीय गतिविधियाँ साल 2010 से जाँच के दायरे में थीं, न कि केवल दिल्ली दंगों पर रिपोर्ट के बाद।
जाँच एजेंसियों का आरोप था कि एमनेस्टी ने FCRA कानून से बचने के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (AIIPL) नाम से एक व्यावसायिक इकाई बनाई। आरोप के अनुसार, एमनेस्टी ने अपने एक भारतीय संस्थान के जरिए 10 करोड़ रुपए की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) को गिरवी रखकर 14.25 करोड़ रुपए की ओवरड्राफ्ट सुविधा बनाई, जिससे ट्रस्ट को विदेशी निवेश (FDI) के रूप में धन प्राप्त हुआ। यह व्यवस्था कानून के दायरे से बाहर बताई गई।
ED ने यह भी आरोप लगाया कि एमनेस्टी ने FEMA (विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम) के उधार और लेन-देन से जुड़े नियमों का उल्लंघन किया और करीब 51.72 करोड़ रुपए की अनियमितताएँ कीं। आरोप है कि एमनेस्टी ने अपनी मूल संस्था Amnesty International UK से धनराशि को सेवाओं के निर्यात के नाम पर भारत में मंगवाया और उसका इस्तेमाल देश में तथाकथित नागरिक समाज गतिविधियों के लिए किया।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल का भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने का पुराना इतिहास रहा है। संगठन लगातार भारत को झूठे तरीके से मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता और मुसलमानों का दमनकर्ता दिखाने की कोशिश करता रहा है। एमनेस्टी और उसके पूर्व प्रमुख आकार पटेल ने भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में गिरफ्तार अर्बन नक्सलियों के समर्थन में भी अभियान चलाया था।
दिलचस्प बात यह है कि जेमी रस्किन स्वयं भी विवादों में रहे हैं। उन पर अपनी पत्नी से जुड़ी बड़ी शेयर होल्डिंग और भुगतान की जानकारी सार्वजनिक न करने के आरोप लगे थे। इसके बावजूद, जनवरी 2022 में रस्किन ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में मानवाधिकारों की स्थिति खराब हो रही है और इसका असर न सिर्फ मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों पर पड़ रहा है बल्कि उन हिंदुओं पर भी जो तथाकथित हिंदू वर्चस्ववादी आंदोलन का विरोध करते हैं। यह बयान उन्होंने एमनेस्टी इंटरनेशनल USA, जेनोसाइड वॉच, IAMC और अन्य संगठनों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में दिया था।
लॉयड डॉगेट: ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की आलोचना करते हुए ‘भारतीय मुसलमानों पर खतरे’ के नैरेटिव को हवा देने वाले नेता
लॉयड डॉगेट अमेरिका के टेक्सास का प्रतिनिधित्व करते हैं और लंबे समय से कॉन्ग्रेसनल कॉकस ऑन इंडिया के सदस्य रहे हैं। इसके बावजूद उनका रिकॉर्ड भारत के प्रति आलोचनात्मक रहा है।
साल 2008 में उन्होंने भारत के साथ परमाणु शक्ति के रूप में सहयोग के खिलाफ वोट दिया था। फिर साल 2020 में भारत के गणतंत्र दिवस पर दिए गए अपने बयान में डॉगेट ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार राष्ट्रीय ध्वज, देशभक्ति के प्रतीकों और धर्म का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने के लिए करती है और पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ खड़ा कर रही है। उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (CAA), NRC और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा हटाने के फैसले को लेकर भी कड़ी आलोचना की। इसी दौरान उन्होंने JNU छात्र संघ की तत्कालीन अध्यक्ष आइशी घोष की खुले तौर पर सराहना की और उन्हें महिमामंडित किया।
डॉगेट ने कहा था कि नया नागरिकता कानून, NRC के विस्तार की आशंका, जम्मू-कश्मीर का एकतरफा तरीके से राज्य का दर्जा खत्म करना और कश्मीरी डी-रेडिकलाइजेशन कैंप जैसी बातें भारत के खिलाफ आवाज उठाने के लिए पर्याप्त कारण हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूरे भारत में विरोध की आवाजें उठ रही हैं और विशेष रूप से नई दिल्ली की छात्रा आइशी घोष को सम्मान दिया जाना चाहिए, जिन्होंने कथित तौर पर हिंसक हिंदू राष्ट्रवादी हमले के सामने चुप रहने से इनकार किया।

आइशी घोष, जिन्हें लॉयड डॉगेट ने बहादुर छात्रा बताया था, 2020 के JNU दंगों के मामले में आरोपित हैं। आइशी घोष को पहचान 2020 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुई हिंसा के दौरान मिली, जब वामपंथी छात्र समूहों ने बाहरी लोगों के साथ मिलकर विश्वविद्यालय परिसर में व्यापक हिंसा की थी।
इस दौरान अन्य छात्रों को फीस वृद्धि के विरोध में कक्षाओं का बहिष्कार करने के लिए मजबूर किया गया था। आरोप है कि जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) की अध्यक्ष के रूप में आइशी घोष ने उस भीड़ का नेतृत्व किया, जिसने छात्रों पर शारीरिक हमला किया और उन्हें शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण करने से रोका, ताकि बहिष्कार को लागू कराया जा सके।
इसके अलावा, आइशी घोष के नेतृत्व में वामपंथी समूहों पर विश्वविद्यालय के सर्वर रूम में तोड़फोड़ करने और कैंपस में वाई-फाई बंद करने का भी आरोप है, जिससे छात्र ऑनलाइन पंजीकरण नहीं कर पाए। इस हिंसा में कई छात्र और ABVP के नेता घायल हुए थे।
क्रिस वैन होलेन
विनय क्वात्रा को लिखे गए उस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में अगला नाम क्रिस वैन हॉलन का है, जिन्होंने उमर खालिद के जमानत और निष्पक्ष सुनवाई की माँग की है। क्रिस वैन हॉलन का जन्म पाकिस्तान में हुआ था।
2020 में उन्होंने तीन अन्य अमेरिकी सांसदों के साथ मिलकर अमेरिकी विदेश मंत्री को एक पत्र लिखा था, जिसमें कश्मीर में मानवाधिकार स्थिति और भारत में मजहबी अल्पसंख्यकों के अधिकारों का आकलन करने की माँग की गई थी। उस पत्र में उन्होंने खुद को भारत का पुराना मित्र बताते हुए कहा था कि मोदी सरकार के कुछ कदम चिंताजनक हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने के छह महीने बाद भी वहाँ इंटरनेट सेवाएँ बड़े पैमाने पर बंद थीं, जिसे उन्होंने किसी लोकतंत्र द्वारा लगाया गया अब तक का सबसे लंबा इंटरनेट शटडाउन बताया। हॉलन और अन्य सांसदों ने दावा किया कि इससे स्वास्थ्य सेवाएँ, कारोबार और शिक्षा प्रभावित हुई और करीब 70 लाख लोग प्रभावित हुए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सैकड़ों कश्मीरी, जिनमें प्रमुख राजनीतिक नेता भी शामिल हैं, निवारक हिरासत में रखे गए और इसी आधार पर भारत सरकार की आलोचना की।
We can & should build on our strong relationship w/ India.
— Senator Chris Van Hollen (@ChrisVanHollen) June 21, 2023
But friends should also share honest concerns. That's why @RepJayapal & I & over 70 colleagues are asking Pres. Biden to raise concerns about the erosion of religious, press & political freedoms when he meets w/ PM Modi. pic.twitter.com/nln59KCJrl
क्रिस वैन हॉलन और उनके साथियों ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भी भारत को निशाना बनाया। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि भारतीय सरकार ने ऐसे कदम उठाए हैं जो कुछ मजहबी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और देश के पंतनिरपेक्ष चरित्र को खतरे में डालते हैं। इसमें उन्होंने CAA का खास तौर पर उल्लेख किया और कहा कि यह कानून विवादास्पद है और भारत के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है।
इसके बाद जून 2023 में क्रिस वैन हॉलन ने कई अन्य अमेरिकी सांसदों के साथ मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से अपील की कि वे भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाएँ। इन सांसदों में उमर खालिद के समर्थन वाले पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकतर सांसद शामिल थे।
इससे पहले मार्च 2023 में क्रिस वैन हॉलन ने दावा किया था कि मोदी सरकार जानबूझकर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को चुप करा रही है, जब कोर्ट ने मोदी सरनेम मानहानि मामले में राहुल गाँधी के खिलाफ फैसला सुनाया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि भारत के मित्र के रूप में यह खबर चिंताजनक है, क्योंकि एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष को चुप नहीं कराया जाता बल्कि उससे बहस की जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र के लिए जरूरी है और भारत वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 150वें स्थान पर पहुँच गया है। हालाँकि, हॉलन ने इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि राहुल गाँधी की संसद सदस्यता जाना अदालत के फैसले का नतीजा था, न कि मोदी सरकार का कोई सीधा कदम।
इल्हान उमर: हिंदुओं के खिलाफ भेदभाव और भारत विरोधी विचारों के लिए कुख्यात
इल्हान उमर अमेरिका की एक सोमालिया में जन्मी नेता हैं और डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर मिनेसोटा से हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सदस्य चुनी गई हैं। उन्हें एक कट्टर इस्लामवादी रुझान वाली नेता के रूप में जाना जाता है। वैश्विक मुस्लिम ब्रदरहुड या उम्माह से बाहर, इल्हान उमर को ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो ताकतवर इस्लामी लॉबी समूहों के एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं, जिनका उद्देश्य आधुनिक समाजों में कट्टर इस्लामी विचारधारा को बढ़ावा देना माना जाता है।
मिनेसोटा की प्रतिनिधि इल्हान उमर ने बीते सालों में कई बार कट्टर इस्लामी संगठनों और पाकिस्तान द्वारा फैलाए गए झूठे दावों को दोहराया है। वह लंबे समय से भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाती रही हैं और खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को निशाना बनाती रही हैं। इतना ही नहीं, इल्हान उमर ने अपनी इस प्रचार मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कई बार बाइडन प्रशासन से आधिकारिक समर्थन की भी माँग की है।

भारत और पश्चिम के कुछ वाम-उदारवादी (लेफ्ट-लिबरल) समूहों के समर्थन के साथ इल्हान उमर ने अमेरिकी संसद में कश्मीर मुद्दे को बार-बार उठाया और पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाते हुए अमेरिकी एजेंसियों से इसमें दखल देने की माँग की।
उन्होंने भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर कथित तौर पर झूठे आरोप लगाए और दावा किया कि देश में हिंदुओं द्वारा मुस्लिमों पर अत्याचार हो रहे हैं। 2024 में दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों पर हुई अमेरिकी हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी की सुनवाई में इल्हान उमर ने भारतीय पत्रकार आरती टिकू सिंह पर भी हमला बोला, जिन्होंने 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार पर अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सामने गवाही दी थी।
इल्हान उमर पर कट्टर इस्लामी संगठनों से नजदीकी संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं। यह भी दावा किया जाता है कि वे मुस्लिम ब्रदरहुड और कतर के शासकों के प्रभाव में रही हैं। उनका नाम इस्लामिक रिलीफ और हेल्पिंग हैंड फॉर रिलीफ एंड डेवलपमेंट (HHRD) जैसे संगठनों से जोड़ा जाता है। HHRD को ICNA की सहयोगी संस्था बताया जाता है, जिसका संबंध जमात-ए-इस्लामी से होने का दावा है। एक संगठन जिसे भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन माना जाता है। इसके अलावा HHRD के पाकिस्तानी आतंकी समूहों से कथित संबंधों की बात भी सामने आती रही है जिनमें लश्कर-ए-तैयबा भी शामिल है।
इल्हान उमर को यहूदी-विरोधी माना जाता है और उन्होंने हमास जैसे आतंकी संगठन का खुला समर्थन किया है, 2021 के इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष में भी वह जिहादी समूहों के पक्ष में दिखीं। 2019 में उन्होंने 9/11 आतंकियों को ‘कुछ लोग कुछ कर गए’ कहकर विवाद खड़ा किया था। इसके अलावा, वह फिलिस्तीन-फिलिस्तीन विवाद में वन-नेशन समाधान की समर्थक हैं, जिसका अर्थ फिलिस्तीन के अस्तित्व को नकारना माना जाता है।
रशीदा तलीब: हिंदू विरोधी, इस्लामवादी और इस्लामी आतंक की हिमायती
अमेरिका के मिशिगन की 12वीं कॉन्ग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से चुनी गई सांसद रशीदा तलीब को अमेरिका में इस्लामी आतंकवाद का बचाव करने वाली और यहूदी-विरोधी नेता के रूप में जाना जाता है।
2021 में रशीदा तलीब ने कश्मीर मुद्दे पर भारत-विरोधी प्रचार करने के लिए ऐसे पैनल में हिस्सा लिया, जिसमें कट्टर इस्लामी आतंक समर्थक और जिहादी विचारधारा से जुड़े लोग शामिल थे। यह पैनल शिकागो स्थित ‘साउंड विजन’ नामक संगठन से जुड़ा था, जिसे इस्लामिक सर्कल ऑफ नॉर्थ अमेरिका (ICNA) की एक शाखा बताया जाता है।
उल्लेखनीय है कि ICNA उत्तरी अमेरिका का एक कुख्यात इस्लामी संगठन है, जिसके हमास, मुस्लिम ब्रदरहुड, जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामी आतंकी संगठनों से गहरे संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं।

ICNA ने अपनी पत्रिका द मैसेज में अमेरिका द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित किए गए सैयद सलाहुद्दीन का महिमामंडन किया था। संगठन ने सैयद सलाहुद्दीन को कश्मीर को कथित तौर पर भारतीय कब्जे से मुक्त कराने के लिए लड़ने वाला मुजाहिदीन का निर्विवाद नेता बताया। सैयद सलाहुद्दीन एक कुख्यात इस्लामी आतंकवादी है, जिस पर भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोप हैं।
इसी पृष्ठभूमि में, जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे और अमेरिकी कॉन्ग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करने से पहले, रशीदा त्लैब ने इल्हान ओमार के साथ मिलकर पीएम मोदी के भाषण का बहिष्कार करने की घोषणा की थी। रशीदा तलीब ने पीएम मोदी की यात्रा को शर्मनाक बताया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि मोदी को अमेरिका की राजधानी में मंच देना गलत है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीएम मोदी पर मानवाधिकार उल्लंघन, अलोकतांत्रिक कदम, मुसलमानों और मजहबी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और पत्रकारों की आवाज दबाने के आरोप हैं, इसलिए वह कॉन्ग्रेस में उनके संबोधन का बहिष्कार करेंगी।
It’s shameful that Modi has been given a platform at our nation’s capital—his long history of human rights abuses, anti-democratic actions, targeting Muslims & religious minorities, and censoring journalists is unacceptable.
— Congresswoman Rashida Tlaib (@RepRashida) June 20, 2023
I will be boycotting Modi’s joint address to Congress.
तलीब ने जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 और 35A को हटाने का विरोध किया था। वह CAA के भी खिलाफ रही हैं।
While I have deep respect for India and its important relationship with the US, I condemn the revocation of #Article370 & #Article35A, the imposed comms blockade, suppression of life-saving medical care, and reports of widespread human rights violations in #Jammu and #Kashmir.
— Congresswoman Rashida Tlaib (@RepRashida) September 13, 2019
रशीदा तलीब को यहूदी-विरोधी (एंटीसेमिटिक) विचारधारा फैलाने वाली नेता के रूप में भी जाना जाता है और वह बार-बार यह धारणा आगे बढ़ाती रही हैं कि इजरायल को एक देश के रूप में अस्तित्व का अधिकार नहीं है। पहले वह अमेरिकी संसद भवन (यूएस कैपिटल) में एक कार्यक्रम आयोजित करना चाहती थीं, जिसमें इजरायल की स्थापना को ‘नकबा’ यानी ‘तबाही’ कहा गया था।
इस कार्यक्रम को ऐसे कट्टर इजरायल-विरोधी संगठनों का समर्थन प्राप्त था, जो इजरायल के खिलाफ पूरे सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की माँग करते हैं। हालाँकि, जब मीडिया में इन कट्टर संगठनों की भूमिका सामने आई, तो हाउस स्पीकर केविन मैकार्थी ने इस कार्यक्रम को रोक दिया और रशीदा तलीब द्वारा फैलाए जा रहे खुले यहूदी-विरोधी रवैये की कड़ी निंदा की। माना जाता है कि रशीदा तलीब का पूरा राजनीतिक करियर इजरायल के खिलाफ नफरत और यहूदी-विरोधी भावनाएँ भड़काने के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहा है।
निष्कर्ष
उमर खालिद की रिहाई की माग को लेकर पत्र लिखने वाले अमेरिकी सांसदों का खुद का रिकॉर्ड भारत-विरोधी प्रचार करने और भारतीय इस्लामो-लेफ्टिस्ट नैरेटिव को आगे बढ़ाने का रहा है, जिसमें हिंदुओं और मोदी सरकार को गलत तरीके से खलनायक बताया जाता है।
यह हैरानी की बात नहीं है कि अमेरिकी वामपंथी मीडिया के बाद अब कुछ नेता भी ऐसे पत्र लिखकर उमर खालिद को बेगुनाह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं जबकि मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है। डेमोक्रेट नेता जिस अंदाज़ में खुद ही फैसले सुना रहे हैं और उमर खालिद की मासूमियत की मुहर लगा रहे हैं, उससे ऐसा लगता है मानो वे मुस्लिम पीड़ित होने का एक ऐसा नैरेटिव गढ़ रहे हों कि भारतीय इस्लामवादी भी पीछे रह जाएँ जबकि हकीकत यह है कि उमर ख़ालिद खुद को नास्तिक बताता है।
गंभीर बात यह है कि भारत के आंतरिक मामलों पर अमेरिकी सांसदों की दखलअंदाजी स्वीकार्य नहीं है और इसे दूसरे देश के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप के तौर पर देखा जाता है। विचारधारा से अलग हटकर भी डेमोक्रेट नेताओं को भारत के अंदरूनी मुद्दों में दखल नहीं देना चाहिए। अगर यही काम भारतीय सांसद करें और अमेरिका के आंतरिक मामलों पर सवाल उठाएँ जैसे जो बाइडेन द्वारा अपने बेटे हंटर बाइडेन को दी गई माफी या ओसामा बिन लादेन को बिना मुकदमे के मारे जाने का मुद्दा तो यह अमेरिका को भी मंजूर नहीं होगा।
उमर खालिद एक भारतीय नागरिक है और वह भारतीय कानून के तहत मुकदमे का सामना कर रहा है। उसे जमानत मिलेगी या नहीं, वह बरी होगा या दोषी ठहराया जाएगा। इसका फैसला केवल भारतीय कानून और भारतीय अदालतें करेंगी, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव या अमेरिकी सांसदों की इच्छा से ऐसा होगा।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)


