Thursday, April 25, 2024
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जमातियों के बचाव के लिए इस्कॉन का राग अलाप रहे हैं मजहबी प्रोपेगंडाबाज: जानिए इस प्रोपेगंडा के पीछे का सच

यूके में सामने आए मामलों में 0.04%, जबकि कुल मौतों में 0.9% मौतें इस्कॉन मंदिर से जुड़ी हुई हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कोरोना के कारण यूके में आए कुल मामलों और मौतों की संख्या में इस्कॉन की संख्या बहुत ही कम है। अब अगर बात करें भारत की तो स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।

यूके में कोरोना महामारी ने तेजी से अपने पैर पसारे और फिर देखते ही देखते एक के बाद एक सैकड़ों, हजारों और फिर लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। सरकार ने जब तक कठोर कदम उठाए, तब तक यह महामारी पूरे देश में फैल चुकी थी। इस बीच यूनाइटेड किंगडम के इस्कॉन मंदिर में पिछले महीने हुए एक विशेष बैठक को कुछ लोगों ने कोरोना संक्रमण का केन्द्र घोषित कर दिया है। साथ ही भारत के कुछ चिढ़े हुए अभिनेता अब इस्कॉन और यूके में कोरोनो वायरस के मामलों की तुलना भारत में तबलीगी जमात की हरकतों से करने में लगे हुए हैं।

शाहिद सिद्दीकी ने दावा किया, “अंध भक्ति, अंध विश्वास सभी समस्याओं का स्रोत है, टीजे (तबलीगी जमात) या इस्कॉन नहीं है।

साभार-ट्विटर

विद्या कृष्णन, जोकि एक स्वास्थ्य और विज्ञान पत्रकार है, जिन्होंने पहले राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वुहान कोरोना वायरस की प्रतिक्रिया के बारे में दुर्भावनापूर्ण झूठ फैलाया था, ने कहा, “लंदन में, हिंदू डायसटॉस एक क्लस्टर प्रकोप के केंद्र में है।”

साभार- ट्विटर

अन्य इस्लामिक प्रोपगैंडाबाज मैदान में उतरे हैं और दिखावा कर रहे हैं जैसे कि ब्रिटेन में इस्कॉन और भारत में तबलीगी जमात का मामला समान है, भले ही दोनों मामलों में दूर-दूर तक कोई समानता नहीं है।

साभार- ट्विटर

अब आपको इस मामले की सच्चाई बताते है। 12 और 15 मार्च को इटली के एक इस्कॉन मंदिर में दो बैठकें आयोजित की गई थीं, जिनमें करीब एक हजार से अधिक भक्तों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद हुई जाँच में इनमें से 21 श्रद्धालुओं को कोरोना पॉजीटिव पाया गया, जबकि इनमें से पाँच की मौत हो गई। दरअसल, इटली में हुई कुल मौत की तुलना में यह एक बहुत छोटा सा आँकड़ा है, जबकि अभी तक की रिपोर्ट के मुताबिक इटली में 5373 लोगों की मौत हो चुकी है और इससे संक्रमित लोगों की संख्या 51,608 हो चुकी है।

इस प्रकार यूके में सामने आए मामलों में 0.04%, जबकि कुल मौतों में 0.9% मौतें इस्कॉन मंदिर से जुड़ी हुई हैं। इस आँकडे से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कोरोना वायरस के कारण यूके में आए कुल मामलों और मौतों की संख्या में इस्कॉन की संख्या बहुत ही कम है। अब अगर बात करें भारत की तो स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। 6 अप्रैल तक भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 4067 है, जबकि इन मामलों में से 1445 इस्लामिक मिशनरी संगठन से जुड़े हैं। यानी 35.5% मामले इससे इस्लाम से जुड़े हुए हैं। इसलिए ब्रिटेन में इस्कॉन की तुलना भारत में जमातियों की घटना से जोड़ना एक हास्यास्पद है, क्योंकि ये दोनों मामले एक जैसे नहीं हैं।

वहीं यह याद रहे कि जब इस्कॉन मंदिर में 12 और 15 मार्च को कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। तो इन कार्यक्रमों ने किसी भी तरह से सरकारी दिशानिर्देश या आदेश का उल्लंघन नहीं किया था, क्योंकि यूके के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने 23 मार्च को कोरोना के लगातार बढ़ते खतरे को देखते हुए लोगों को घरों में रहने का आदेश जारी किया था, जबकि भारत में जब तबलीगी जमात के एक हजार से अधिक लोगों के साथ निजामुद्दीन मरकज में कार्यक्रम किया था, उससे पहले ही भारत सरकार द्वारा जारी विभिन्न दिशा निर्देशों के साथ दिल्ली की सरकार ने 50 से अधिक लोगों के एक स्थान पर जमा होने पर प्रतिबंध लगा दिया था। जमातियों के इस कार्यक्रम ने दोनों आदेशों का साफ तौर पर उल्लंघन किया था। इसलिए ये दोनों दो उदाहरण भी कहीं से भी समान नहीं हैं।

वहीं भारत में तबलीगी जमात और यूनाइटेड किंगडम में इस्कॉन के आचरण की अगर बात करें तो तबलीगी जमात के विपरीत, इस्कॉन भक्त जानबूझकर संदिग्ध मामलों का पता लगाने से बचने के लिए कहीं भी छिप नहीं रहे, बल्कि सामने आकर सरकार का सहयोग और अपनी जाँच भी करा रहे हैं। उन्होंने तबलीगी जमात की तरह अपने कार्यक्रम में यह भी दावा नहीं किया कि उनके भगवान किसी तरह उन्हें महामारी से बचा लेंगे या फिर यह वायरस उनके धर्म के खिलाफ एक साजिश है। वास्तव में सभी इस्कॉन मंदिरों को 16 मार्च को ही बंद कर दिया गया था, क्योंकि एक सप्ताह पहले ही बोरिस जॉनसन ने लॉकडाउन के आदेश जारी किए थे।

वहीं दूसरी ओर तबलीगी जमात के लोगों ने हर किसी के साथ गलत व्यवहार किया है। इनके सदस्यों ने अस्पताल के कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार किया है, वे अस्पताल में नग्न घूमते रहे और महिला स्वास्थ्य कर्मचारियों पर यौन अनुचित व्यवहार किया। उन्होंने भोजन के लिए नखरे किए और माँग की कि उन्हें इसके बजाय जो वो माँग कर रहे हैं वो परोसा जाए। उन्होंने अधिकारियों से दुर्व्यवहार किया और वायरस फैलाने के लिए डॉक्टरों पर तक थूक दिया।

इसके अलावा, उन्होंने क्वारटाइन के नियमों का पालन भी नहीं किया। उन्होंने क्वारंटाइन रहते समय मनोरंजन के संसाधन उपलब्ध कराने की भी माँग की औऱ जिन लोगों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया उन लोगों ने दवा लेने तक से इंकार कर दिया, जबकि इस्कॉन के भक्तों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो कुछ का कोरोना पॉजिटिव पाए जाने में लोगों ने समानता ढूँढी और इसी का सहारा लेकर कुछ लोग तबलीगी जमात के अत्याचारपूर्ण आचरण की गंभीरता को कम करने के लिए जानबूझकर प्रोपेगेंडा चलाने में लगे हुए हैं।

भारत में तबलीगी जमात और यूनाइटेड किंगडम में इस्कॉन के आचरण की बराबरी करने वाले लोग पूरी तरह से जानते हैं कि दोनों मामले समानताओं से कोसों दूर हैं, लेकिन ये लोग सच्चाई की परवाह किए बिना दावा कर रहे हैं क्योंकि यह उनके राजनीतिक एजेंडे को पूरा करता है। आपको बता दें कि यह न केवल भारत में है कि तबलीगी जमात सुपर स्प्रेडर के रूप में उभरा है। इस्लामिक मिशनरी संगठन ने पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में और यहाँ तक ​​कि फिलिस्तीन जैसे स्थानों में भी इस वायरस को फैला दिया है। इसलिए यह दावा करना कि दोनों मामलों के बीच समानता है तो यह बिल्कुल गलत है।

इसके अलावा कुछ बुद्धजीवी लोग आरोप लगा रहे हैं कि भारत सरकार ने ‘सांप्रदायिकता’ को महामारी बना दिया है और इसकी आड़ में समुदाय विशेष को निशाना बना रही है, क्योंकि तबलीगी जमात ने अपनी गंदी हरकतों के कारण सभी क्षेत्रों से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। ये वहीं लोग हैं जो हर बार एक ही बात करते हैं कि समुदाय विशेष का हर आदमी आतंकवादी नहीं होता, जबकि इन लोगों को पता रहता है कि हर एक आतंकवादी मजहब विशेष का होता है। जब भी कोई आतंकवादी हमला होता है, तबलीगी जमात के लोगों के पाए जाने के बाद भी इसकी आलोचना को पूरे समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के रूप में प्रचारित किया जाता है। ये कुछ और नहीं बल्कि इन प्रोपेगेंडाबाजों द्वारा तबलीगी जमात की निष्पक्ष आलोचना से भी दूर करने का यह एक सुनियोजित प्रयास है।

कुछ ऐसा ही यह एक ताजा उदाहरण है कि इन लोगों ने उन पापों के लिए इस्कॉन पर अनुचित दोष लगाने का प्रयास किया है जो उन्होंने नहीं किए थे। यह तर्क दिया जा सकता है कि उन्हें 12 और 15 मार्च को कार्यक्रमों का आयोजन नहीं करना चाहिए था, यहाँ तक ​​कि इस्कॉन ने भी कुछ किया, लेकिन उनके कार्यों को ब्रिटिश सरकार के आचरण की पृष्ठभूमि पर ही आँका जाना चाहिए, जिसने वायरस को गंभीरता से नहीं लिया और जब लिया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस प्रकार यूके में कोरोना वायरस मामलों में इस्कॉन का दूर-दूर तक कोई योगदान नहीं है। ये लोग जानबूझकर इस्कॉन को दोषी ठहरा रहे हैं और अपने कार्यों की तुलना तबलीगी जमात से कर रहे हैं। ताकि बाद में आने वाली सभी निष्पक्ष आलोचनाओं से किनारा किया जा सके।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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