Friday, August 12, 2022
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उइगर मुस्लिमों पर चीन के अत्याचार को अब लिथुआनिया ने बताया ‘नरसंहार’: संयुक्त राष्ट्र से जाँच की माँग, छोड़ा ’17+1′ ग्रुप

उइगर मुसलमानों के मुद्दे पर संसद में प्रस्ताव पारित करने के साथ ही लिथुआनिया ने चीन के 17+1 सहयोग मंच को विभाजनकारी बताते हुए उसे छोड़ दिया। इसके साथ ही उसने दूसरे देशों से भी 27 देशों के इस समूह को छोड़ने की अपील की।

अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के बाद अब लिथुआनिया की संसद ने गुरुवार (20 मई 2021) को चीन में उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार को ‘नरसंहार’ बताया है। इसके साथ ही यहाँ की संसद ने संयुक्त राष्ट्र से चीन द्वारा उइगर मुसलमानों को जबरन डिटेंशन सेंटर में बंदी बनाए जाने की जाँच कराने और यूरोपीय यूनियन से चीन के साथ उसके संबंधों की समीक्षा करने की माँग की है।

यह सर्वविदित है कि चीन हमेशा से ही अपने देश में अल्पसंख्यक उइगर मुसलमानों के उत्पीड़न की बात से इनकार करता रहा है और दूसरे देशों को भी इस मामले पर आँखें दिखाता रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लिथुआनिया (यूरोप महाद्वीप के उत्तरी भाग में बाल्टिक सागर के किनारे स्थित एक देश है) की संसद में उइगर मुसलमानों को लेकर पास किए गए प्रस्ताव का 5 में से 3 सांसदों ने समर्थन किया। संसद ने चीन से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को समाप्त करने का आह्वान किया है। इसके साथ ही संसद पर्यवेक्षकों को तिब्बत में जाने और अपने आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा के साथ बातचीत शुरू करने की माँग की।

खास बात यह है कि जिस वक्त संसद में इस प्रस्ताव पर वोटिंग हो रही थी, उसी दौरान लिथुआनियाई प्रधानमंत्री इंग्रिडा सिमोनीटे (Ingrida Šimonytė) और विदेश मंत्री गेब्रियलियस लैंड्सबर्गिस (Gabrielius Landsbergis) भी संसद में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने वोट नहीं किया।

चीन द्वारा ब्लैकलिस्ट किए गए एक सांसद डोविले सकलीन ने कहा, “हम लोकतंत्र का समर्थन करते हैं, क्योंकि हम 50 वर्षों तक कम्युनिस्ट शासन में रहे हैं, जो हमारे लिए काफी पीड़ादायक है।”

लिथुआनिया के इस कदम का चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने शुक्रवार (21 मई 2021) को कड़ा विरोध किया। उन्होंने लिथुआनिया को अपनी गलतियों को सुधारने की नसीहत दी है।

लिथुआनिया ने छोड़ा चीन का 17+1 सहयोग मंच

उइगर मुसलमानों के मुद्दे पर संसद में प्रस्ताव पारित करने के साथ ही लिथुआनिया ने चीन के 17+1 सहयोग मंच को विभाजनकारी बताते हुए उसे छोड़ दिया। इसके साथ ही उसने दूसरे देशों से भी 27 देशों के इस समूह को छोड़ने की अपील की। वहाँ के विदेश मंत्री गेब्रियलियस लैंड्सबर्गिस (Gabrielius Landsbergis) ने एएफपी को बताया, “लिथुआनिया अब खुद को 17 + 1 प्रारूप का सदस्य नहीं मानता है और वो इसमें भाग नहीं लेता है।”

उन्होंने कहा, “हमारी नजर में यूरोपीय यूनियन के लिए अब समय आ गया है कि विभाजनकारी 16+1 प्रारूप से अधिक एकजुट होने के लिए और इससे सक्षम 27+1 की ओर बढ़ने का समय आ गया है। अगर यूरोपीय यूनियन के सभी देश मिलकर काम करें तो यह सबसे मजबूत है।”

लिथुआनिया का ये कदम बीते महीनों में देश द्वारा उठाए गए कई अहम फैसलों का हिस्सा है, जो चीन के साथ उसके संबंधों में खटास पैदा होने की ओर इशारा करता है। इससे पहले, इस देश ने चीनी निवेश को प्रतिबंधित करते हुए ताइवान के साथ व्यापार खोलने का ऐलान किया था।

सोवियत संघ के अंतर्गत था लिथुआनिया

रिपोर्ट के मुताबिक, 1940-1991 तक सोवियत संघ के शासन के दौरान लिथुआनिया का काफी दमन किया गया था। हालाँकि, लिथुआनिया अब यूरोपीय संघ और नाटो का सदस्य है। साथ ही वह रूस और चीन जैसे कम्युनिस्ट देशों का सख्त विरोधी है।

उइगर हिरासत शिविर

चीन का झिंजियांग क्षेत्र सबसे अधिक सांस्कृतिक और जातीय नरसंहार का सामना कर रहा है। यहाँ के स्थानीय उइगर समुदाय का चीनी अधिकारियों के साथ विवाद का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन चीनी सरकार उइगरों को चीन का हिस्सा मानने की बजाय उन्हें क्षेत्रीय अल्पसंख्यक के रूप में मानती है।

उइगर मुसलमानों पर अत्याचार करने के मामले में चीन दुनिया भर में कड़ी आलोचनाओं का सामना कर रहा है। उइगर-कज़ाख नागरिक, गुलबहार जेलिलोवा ने चीनी डिटेंसन कैंप की हकीकत बयाँ करते हुए कहा कि हिरासत में उसे बेरहमी से पीटा गया और उसके साथ बलात्कार किया गया। अलजज़ीरा के साथ काम करने वाले एक पत्रकार स्टू चाओ ने बताया कि उइगर लेखक, एक्टिविस्ट और उइगर भाषा के लिए काम करने वाले अब्दुवेली अयूप-प्रमुख को चीन ने डिटेंसन सेंटर में बंद कर बेरहमी से प्रताड़ित किया गया।

चीन द्वारा उइगर मुस्लिमों को टारगेट करने के कई सबूत हैं, जो बताते हैं कि चीन उइगर मुसलमानों को सुनियोजित तरीके से प्रताड़ित कर रहा है। चीनी डिटेंसन कैंप से आजाद हुई जुमरत दावत और कलबिनूर सिदिक ने खुलासा किया है कि तीन से अधिक बच्चों का गर्भ धारण करने वाली उइगर महिलाओं की जबरन नसबंदी करा दी जाती है। इन शिविरों से बचकर निकली महिलाओं ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि उन्हें पीटा गया, बलात्कार किया गया और इंजेक्शन दिए गए।

चीन के शिविरों में बंद उइगर मुस्लिमों को उनके इस्लामिक मूल्यों की आलोचना करने के लिए मजबूर किया जाता है। इसके साथ ही डिटेंसन कैंप में बंद लोगों को कम्यूनिस्ट पार्टी का प्रचार करने के लिए मजबूर किया जाता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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