Homeरिपोर्टअंतरराष्ट्रीयरॉदरहैम में बच्चियों के रेप गैंग के सरगना निकले हुसैन ब्रदर्स, UK के नेशनल...

रॉदरहैम में बच्चियों के रेप गैंग के सरगना निकले हुसैन ब्रदर्स, UK के नेशनल ऑडिट में हुआ खुलासा: पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ ट्रायल के दौरान सामने आई रोंगटे खड़ी कर देने वाली दास्तान

रोथरहैम ट्रायल ने दिखाया कि गैंगों ने नाबालिग लड़कियों पर सालों तक हिंसा की, जबकि पुलिस, काउंसिल और नेताओं ने शिकायतें दबाकर सांस्कृतिक मुद्दों पर असहज सच से बचते रहे।

दशकों तक साउथ यॉर्कशायर के रॉदरहैम शहर पर एक भयानक साया मंडराता रहा। यह साया आर्थिक बदहाली का नहीं, बल्कि उन संगठित गैंगों का था, जिन पर शहर की कमजोर और नाबालिग लड़कियों के साथ यौन शोषण का आरोप लगा। 2016 में हुसैन ब्रदर्स और उनके साथियों पर मुकदमा हुआ और इसके बाद ये खबर सुर्खियाँ बनी। लोगों के सामने इस गैंग का काला चेहरा और भी भयानक रूप से सामने आया।

हाल ही में ओपन जस्टिस यूके द्वारा जारी किये गये ट्रांसक्रिप्ट और ग्रुप-आधारित बच्चों के यौन उत्पीड़न पर राष्ट्रीय ऑडिट की रिपोर्ट ने इस काले अध्याय को फिर सामने ला दिया है। ये दस्तावेज साबित करते हैं कि कैसे संगठित रूप से बच्चों का शोषण, यातना और तस्करी होती रही और कैसे सरकारी तंत्र की नाकामी, लापरवाही से सालों तक इन अपराधों पर लगाम नहीं लग सका।

कमजोर लोगों को किया जाता था टारगेट

फरवरी 2016 की सजा सुनाते समय कोर्ट ने गैंग की खतरनाक और सोची-समझी रणनीति को साफ-साफ बताया। मुख्य आरोपित अर्शिद हुसैन, बन्नारस हुसैन और बशारत हुसैन अपने शिकार यूँ ही नहीं चुनते थे, बल्कि उनकी तलाश करते थे।

कोर्ट में सामने आया कि गैंग खास तौर पर उन नाबालिग लड़कियों को चुनता था, जो लोकल अथॉरिटी की देखभाल में थीं या अपने परिवारों से दूर थीं। उनका तरीका हर बार लगभग एक जैसा ही होता था- पहले लड़कियों को तोहफे, पैसे या नशा देकर भरोसा जीत कर बॉयफ्रेंड बन जाते थे और फिर दलाली करने लगते थे।

भरोसे की आड़ में शुरू हुआ रिश्ता धीरे-धीरे डर और हिंसा में बदल जाता। ट्रांसक्रिप्ट्स में दर्ज है कि आरोपित शहर में खौफ पैदा करके पीड़ितों को चुप रहने पर मजबूर करते थे।

कोर्टरूम में खौफनाक कहानियों का खुलासा

सजा सुनाते समय सामने आए विवरण बेहद दर्दनाक थे।

Victim 2 केवल 11 साल की उम्र में केयर में रखी गई थी। अर्शिद हुसैन रोज उसे ढूँढता था, मना करने पर उसे मारता-धमकाता था और बाद में अपने भाई बन्नारस और दोस्तों तक पहुँचा देता था। उसके साथ लगातार शारीरिक हिंसा और शोषण किया गया और उसे एक सामान की तरह इस्तेमाल किया गया।

Victim 7 को बशारत हुसैन ने मानसिक रूप से तोड़ा। एक घटना में बशारत और अर्शिद ने उसके हाथ-पैर बाँध दिए और सिर पर चादर डाल दी। वह पूरी तरह लाचार थी और बगल के कमरे में दूसरी लड़की की चीखें सुनकर दहशत में आ गई। उसे जलाने की धमकी देकर डराया गया।

Victim 6 के साथ अर्शिद हुसैन ने नस्लीय गालियाँ देते हुए उसे अपमानित किया और जबरन शोषण किया, यह कहते हुए कि वह ‘white trash’ है।

अंधेपन की संस्कृति: संस्थागत लीपापोती

हुसैन ब्रदर्स पर चले मुकदमों ने केवल कुछ मामलों को सामने रखा, लेकिन व्यापक जाँच ने साफ किया कि ये घटनाएँ अलग-थलग नहीं थीं, बल्कि राज्य की गंभीर नाकामी से जन्मी एक राष्ट्रीय स्तर की समस्या थीं। बैरोनेस लुईस केसी द्वारा तैयार नेशनल ऑडिट ऑन ग्रुप-बेस्ड चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन में खुलासा हुआ कि एक अंधेपन, अनदेखी और पूर्वाग्रह की संस्कृति ने इन गैंगों को सालों तक बेलगाम चलने दिया।

रिपोर्ट ने बिना किसी आसान भाषा के बताया कि बच्चों पर कई पुरुषों द्वारा बार-बार यौन अत्याचार, हिंसा, गैंग-रेप और मजबूरन गर्भपात जैसी घटनाएँ होती रहीं। सबसे जरूरी बात ऑडिट ने इस बात की पुष्टि की कि कई मामलों में आरोपित गैंगों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी और अन्य एशिया’ मूल के पुरुष शामिल थे।

सिर्फ रॉदरहैम में ही पाया गया कि चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन के 64% मामले ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों से जुड़े थे, जबकि उनकी आबादी स्थानीय जनसंख्या में कम है।

रिपोर्ट के अनुसार यह सच्चाई लंबे समय तक इसलिए छिपी रही क्योंकि अधिकारियों ने व्यवस्थित रूप से डेटा इकट्ठा ही नहीं किया। करीब दो-तिहाई मामलों में आरोपितों की जातीय पहचान दर्ज ही नहीं की गई।

इस सामूहिक विफलता की वजह से, सालों से बार-बार चेतावनी मिलने के बावजूद, अधिकतर पीड़िताएँ युवा श्वेत लड़कियाँ थीं और संदिग्धों का प्रोफ़ाइल बार-बार एक जैसा था सिस्टम न पैटर्न स्वीकार कर पाया, न बच्चों को सुरक्षा दे पाया।

राजनीतिक चुप्पी और पुलिस की मिलीभगत

जाँचो के जरिए ये बात साफ हुई कि सच्चाई को दबाने की सबसे बड़ी वजह डर था कि कहीं अधिकारियों या नेताओं पर रेसिस्ट या इस्लामोफोबिक होने का आरोप न लग जाए। इसी डर ने कई लोगों को बोलने से रोक दिया।

राजनीतिक दबाव –
लेबर सांसद सारा चैम्पियन को 2017 में सिर्फ इसलिए पद छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन में ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों द्वारा श्वेत लड़कियों के शोषण की गंभीर समस्या है। एक बयान जिसे अब डेटा सही साबित करता है। इसी तरह कुछ नेताओं, जैसे कीथ वाज़ ने समुदाय को कलंकित करने के डर से नस्लीय पहलू को कम करके दिखाया।

इंटेलिजेंस की अनदेखी –
पुलिस के पास सालों से साफ इनपुट मौजूद थे। वेस्ट मिडलैंड्स पुलिस की 2015 की प्रोफ़ाइल में पाया गया कि 62% संदिग्ध पाकिस्तानी मूल के थे, जबकि केवल 12% श्वेत थे। इसके बावजूद, पुलिस ने समुदायिक तनाव बढ़ने के डर से सार्वजनिक रूप से चेतावनी जारी नहीं की।

पीड़ितों को ही दोषी ठहराना –
नस्लीय प्रोफाइलिंग के आरोपों से बचने के लिए कई बार पुलिस ने अपराधियों पर कार्रवाई करने के बजाय खुद पीड़ित लड़कियों को ही छोटी-मोटी बातों में गिरफ्तार कर लिया, जबकि वे उन गैंगों के दबाव और नियंत्रण में थीं। नतीजा यह हुआ कि असली दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई और अपराध जारी रहे।

पुलिस की मिलीभगत, पीड़ित परिवारों पर कार्रवाई और हल्की सजा

रॉदरहैम की घटनाएँ कोई अपवाद नहीं थीं, बल्कि पूरे देश में फैली उस गंभीर समस्या का हिस्सा थीं जिसे सालों तक कम करके दिखाया गया। 1980 के दशक से टेल्फर्ड, रोचडेल, ऑक्सफोर्ड और न्यूकैसल जैसे शहर कई गैंगों के सक्रिय केंद्र बने रहे।

टेल्फर्ड में अकेले लगभग 40 सालों में करीब 1,000 लड़कियों का शोषण हुआ और तीन हत्याएँ भी इसी कांड से जुड़ी पाई गईं। रोचडेल में 2002 से कम से कम 47 लड़कियों के साथ अत्याचार हुआ। सरकारी आँकड़ों के अनुसार पूरे इंग्लैंड में लगभग 19,000 किशोरों के ग्रूमिंग का शिकार होने का अनुमान है।

कई जगह पुलिस प्रतिक्रिया इतनी कमजोर थी कि वह लापरवाही के कारण सहमति जैसी दिखने लगी। रेसियल प्रोफाइलिंग के आरोपों से बचने और सांस्कृतिक रूप से असंवेदनशील समझे जाने के डर में कई पुलिस बल शिकायतों की गहराई से जाँच ही नहीं करते थे।

कई मामलों में असली अपराधियों पर कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित लड़कियों या उनके परिवारों को ही छोटी बातों में गिरफ्तार कर लिया गया। इस नाकामी ने कई गैंगों को खुले तौर पर काम करने का मौका दिया।

इस विफलता को मीडिया और कुछ राजनीतिक आवाजों ने भी बढ़ाया, जहाँ अक्सर एशियन या साउथ एशियन जैसे व्यापक शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिससे रिपोर्ट में सामने आए असामान्य पैटर्न और डेटा साफ हो गए।

इसी बीच, NSPCC की 2023 की रिपोर्ट में ऑनलाइन ग्रूमिंग मामलों में 82% बढ़ोतरी दर्ज की गई, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, जिसे लंबे समय से चली आ रही सरकारी चुप्पी और अस्वीकार ने छुपा रखा है।

पॉलिटिकल करेक्टनेस ने सिस्टम को कैसे अपंग बना दिया

रॉदरहैम ट्रांसक्रिप्ट्स में दर्ज घटनाएँ किसी खाली जगह में नहीं हुईं। ये इसलिए दशकों तक चलती रहीं क्योंकि पूरे सिस्टम ने पॉलिटिकल करेक्टनेस के डर में कार्रवाई से हाथ खींच लिया।

सालों तक ज्यादातर पीड़ित श्वेत, कामगार वर्ग की लड़कियाँ पुलिस, सोशल सर्विस और काउंसिल जैसी संस्थाओं द्वारा अनदेखी की गईं। अधिकारियों को आशंका थी कि अगर वे एशियाई मूल के पुरुषों पर लगे आरोपों की जाँच करेंगे, तो उन्हें रेसिस्ट कहा जा सकता है। इसी डर ने एक माहौल बना दिया जहाँ ग्रूमिंग गैंग खुलकर काम करते रहे। ट्रांसक्रिप्ट्स में यह भी दर्ज है कि हुसैन ब्रदर्स इलाके में जाने-पहचाने थे, महँगी गाड़ियाँ चलाते थे और खुद को लगभग अछूता मानते थे।

जे रिपोर्ट ने 2014 में खुलासा किया कि 1997 से 2013 के बीच रॉदरहम में कम से कम 1,400 बच्चों का शोषण हुआ। इसके बावजूद, कई बार आरोपितों की जातीय पृष्ठभूमि जो कई मामलों में पाकिस्तानी मूल के पुरुषों से जुड़ी हुई थी, यही कारण था जिसकी वजह से अधिकारी कार्रवाई से पीछे हटते रहे।

लेबर-शासित रॉदरहैम काउंसिल पर यह आरोप लगा कि उसने समुदायिक सौहार्द और राजनीतिक लाभ-हानि को बच्चों की सुरक्षा से पहले रखा और डर था कि सच सामने होने से जातीय तनाव बढ़ सकता है या उनका वोट बैंक पर असर हो सकता है।

टैक्सपेयर-फंडेड डिफेंस का अपमान

पीड़ितों के लिए सबसे दर्दनाक बात यह थी कि जिन लोगों ने उनके साथ अत्याचार किया, वे कोर्ट में अपनी कानूनी लड़ाई के खर्च भी सरकारी पैसों से चलवाते रहे। कई जाँच रिपोर्टों में सामने आया कि ये आरोपित, जिनके पास अच्छी-खासी कमाई और कारोबार थे, कोर्ट में खुद को गरीब दिखाकर स्टेट फंडेड लीगल एड लेते रहे।

केवल 2016 के मुकदमे में ही हुसैन ब्रदर्स को £370,000 (₹ 4.43 करोड़ रुपए) से अधिक की कानूनी सहायता मिली और कुल खर्च करीब £500,000 (₹ 6 करोड़ रुपए) तक पहुँचा यानी पूरा बोझ टैक्सपेयर्स पर पड़ा। वहीं, उनकी कई पीड़िताओं को कोई मुआवज़ा नहीं मिला और जिन्हें मिला भी, उन्हें अक्सर बहुत कम रकम कभी-कभी सिर्फ £2,000 (2.40 लाख रुपए) दी गई।

रॉदरहैम केस की सर्वाइवर सैमी वुडहाउस ने इस अन्याय को सामने लाते हुए कहा कि अपराधियों को कानूनी मदद में जितना पैसा दिया गया, पीड़ितों को उसका एक अंश भी मुआवज़े में नहीं मिला। यह दिखाता है कि न्याय प्रणाली, मुकदमा चलाते समय भी, संरचनात्मक रूप से पीड़ितों के मुकाबले आरोपितों के पक्ष में झुकी हुई दिखाई दी।

बहुत देर से जागा सिस्टम

ठोस सबूतों के आधार पर फरवरी 2016 में जज सारा राइट ने कड़ी सजाएँ सुनाई और कहा कि इन अपराधों ने पीड़ितों पर तबाह कर देने वाला असर छोड़ा है।

  • अर्शिद हुसैन: गैंग का मुख्य संचालक माना गया, 35 साल की सजा।
  • बशारत हुसैन: गंभीर भूमिका के लिए 25 साल की सजा।
  • बन्नारस हुसैन: दोषी मानने के बाद 19 साल की सजा।
  • कैरेन मैकग्रेगर: अपने घर में शोषण को संभव बनाने के लिए 13 साल की सजा।

एक डरावनी विरासत

रोथरहैम 2016 ट्रायल के ट्रांसक्रिप्ट साफ दिखाते हैं कि शोषण जैसा हल्का शब्द असल हिंसा को छिपा देता है। इन गैंगों ने सालों तक कम उम्र की लड़कियों पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार किए, जबकि रोथरहैम शहर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त रहा।

लेकिन दोष सिर्फ आरोपितों का नहीं है। जैसा कि नेशनल ऑडिट रिपोर्ट और 197 पन्नों की केसी रिपोर्ट बताती हैं। पुलिस ने शिकायतें नजरअंदाज कीं, काउंसिल के अधिकारी कम्युनिटी कोहेशन के नाम पर बच्चों की सुरक्षा से समझौता करते रहे और राजनीतिक नेताओं ने असहज सच को दबा दिया।

दशकों तक सिस्टम ने अपनी सबसे कमजोर बेटियों को इसलिए बलि चढ़ने दिया ताकि संस्कृति, अपराध और इंटीग्रेशन पर कोई कड़े सवाल न उठें।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Jinit Jain
Jinit Jain
Writer. Learner. Cricket Enthusiast.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

विवादों में ‘कॉकरोचों’ का 6 जून का प्रदर्शन, दिपके ने माना- ‘नहीं ली प्रोटेस्ट की परमिशन’: समझें- SC का फैसला, 7 दिन वाला नियम...

CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन के बहाने समझिए जंतर-मंतर पर धरना देने की पूरी प्रक्रिया, दिल्ली पुलिस के नियम और सुप्रीम कोर्ट का रुख।

‘पहले मंदिर में नमाज पढ़ेंगे, फिर कहेंगे मस्जिद थी’: बुलंदशहर से भोजशाला तक, हिंदू पवित्र स्थलों पर दावों का कट्टरपंथियों का पैटर्न और लिबरल...

हिंदुओं के पवित्र स्थानों पर नमाज अदा करना भूल नहीं, सोची-समझी साजिश है। यदि कट्टरपंथियों का मन इतना ही साफ होता तो मंदिरों पर कब्जा नहीं करते।
- विज्ञापन -