Saturday, April 4, 2026
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पाकिस्तान के पंजाब और चीन से आए ‘बाहरी लोगों’ पर बढ़े हमले, 7 मजदूरों की फिर हत्या: इस्लामी मुल्क ने बलूचिस्तान को हिंसा की आग में कैसे झोका, जानिए

बलूचिस्तान के अलगाववादी समूह अक्सर हिंसा को उचित ठहराते हुए कहते हैं कि यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) जैसी परियोजनाओं के लिए यहाँ बड़ी संख्या में गैर-स्थानीय श्रमिक आते हैं। इसके कारण बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण होता है। उनका कहना है कि बलूचिस्तान की संस्कृति के क्षरण के खिलाफ प्रतिरोध दिखाने का एक तरीका है।

हाल के दिनों में पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंसा में वृद्धि देखी गई है। वहाँ बलूच अलगाववादी समूह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और चीन के लोगों को विशेष तौर पर निशाना बना रहे हैं। ताजा मामले में 9 मई 2024 को बलूचिस्तान के ग्वादर के सुरबंदर में पंजाब के सात मजदूरों को उनके कमरे में सोते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई। पिछले महीने पंजाब के 11 श्रमिकों की हत्या कर दी गई थी।

अभी तक किसी भी समूह ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। हालाँकि, ऐसा माना जाता है कि इसके पीछे बलूच राष्ट्रवादी समूह हो सकते हैं, क्योंकि वे इस क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से बलूचिस्तान अलगाववादी गतिविधियों का केंद्र रहा है। पिछले वर्ष की तुलना में साल 2024 में बलूचिस्तान क्षेत्र में हिंसक घटनाओं में 96% की वृद्धि दर्ज की गई है।

बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री मीर सरफराज बुगती ने हमले की निंदा की है और इसे आतंकवादी कृत्य करार दिया है। एक बयान में उन्होंने हमले के पीछे के दोषियों को नहीं बख्शने की कसम खाई है। उन्होंने कहा, “आतंकवादियों और उनका समर्थन करने वालों से निपटने के लिए हम सभी आवश्यक बल का प्रयोग करेंगे। पाकिस्तानी खून-खराबे की एक-एक बूँद का हिसाब लिया जाएगा।”

जातीय तनाव की पृष्ठभूमि

यह पहली बार नहीं है जब इस क्षेत्र में ‘बाहरी लोगों’ पर हमला हुआ है। ऐसे कई उदाहरण हैं जब पंजाब और चीन के लोगों को निशाना बनाया गया। हमलों के पीछे यह धारणा है कि ‘बाहरी’ लोग स्थानीय संस्कृति और अधिकारों को कमजोर करते हैं। इस क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालें तो साल 2006 में नवाब अकबर बुगती की हत्या ने स्थानीय विद्रोहियों के बीच ‘बाहरी विरोधी’ भावनाओं को और बढ़ाया।

साल 2019 में ऑपइंडिया ने ‘बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट’ (BLF) के संस्थापक एवं प्रमुख डॉक्टर अल्लाह नज़र बालोक का साक्षात्कार लिया था। उन्होंने कहा था कि बलूच लोगों का पाकिस्तान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है क्योंकि उनकी संस्कृति, भाषा, मानस, इतिहास और भूगोल अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर बलपूर्वक कब्जा किया है।

उन्होंने कहा, “उन्हें (पाकिस्तान) बलूचिस्तान और बलूच राष्ट्र के कल्याण में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें केवल हमारे 750 मील लंबे तट और खनिजों में रुचि है। इसलिए हम बलूचों के पास दुनिया का ध्यान उत्पीड़ित बलूचों की ओर हटाने के लिए प्रतिरोध के अलावा कोई रास्ता नहीं है।” इस क्षेत्र में चीनी नागरिकों पर हमलों का एक मुख्य कारण खनिजों के उत्खनन में चीनी कंपनियों का शामिल होना भी है।

हिंसा की वर्तमान लहर

सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध आँकड़ों से पता चलता है कि साल 2022 में बलूचिस्तान में 406 मौतें हुई थीं। साल 2023 में यह बढ़कर 466 हो गई, जो साल 2016 के बाद से सबसे अधिक संख्या थी। इस क्षेत्र में अत्यधिक सक्रिय विद्रोही समूहों में बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) शामिल हैं।

ये अलगाववादी समूह अक्सर हिंसा को उचित ठहराते हुए कहते हैं कि यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) जैसी परियोजनाओं के लिए यहाँ बड़ी संख्या में गैर-स्थानीय श्रमिक आते हैं। इसके कारण बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण होता है। उनका कहना है कि बलूचिस्तान की संस्कृति के क्षरण के खिलाफ प्रतिरोध दिखाने का एक तरीका है।

डॉक्टर अल्लाह नज़र बलूच ने ऑपइंडिया के साथ साक्षात्कार में कहा था, “बलूचिस्तान में कुछ भी निवेश नहीं किया जा रहा है। पंजाबी प्रतिष्ठान इसे दोनों हाथों से लूट रहे हैं और बलूच संसाधन पाकिस्तान के लिए माल-ए-गनीमत यानी युद्ध में लूटा गया माल भर है।”

बता दें कि CPEC अरबों डॉलर की एक सड़क परियोजना है, जो पाकिस्तान और चीन की सरकारों के बीच एक समझौते का परिणाम है। परियोजना के पीछे का विचार चीन को अपने उत्पादों को पाकिस्तान के बंदरगाहों के रास्ते दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए एक गलियारा बनाना है। सीपीईसी को अब वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

इतना ही नहीं, वित्तीय समस्या के साथ-साथ अब इसे स्थानीय लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, पाकिस्तान सरकार स्थानीय लोगों को यह समझाने में विफल रही है कि यह परियोजना उनके लिए लाभकारी है। इसके अलावा, भारत ने भी इस परियोजना पर आपत्ति जताई है, क्योंकि यह परियोजना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) से गुजरती है।

बलूचिस्तान में हमले और पाकिस्तान के समस्या

विद्रोही समूहों ने स्पष्ट रूप से उन लोगों को निशाना बनाया है, जिन पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के साथ सहयोग करने या सीपीईसी परियोजनाओं में शामिल होने का संदेह था। पंजाब के श्रमिकों की लक्षित हत्याएँ और चीनी नागरिकों पर हमलों ने खतरे की गंभीरता को रेखांकित किया है। उदाहरण के लिए, 13 अगस्त 2023 को ग्वादर में चीनी नागरिकों को ले जा रहे काफिले पर हमला हुआ था।

इस हमले में चीनी नागरिकों के साथ-साथ पाकिस्तानी कई सुरक्षाकर्मियों कई मौत हुई थी। इस हमले की जिम्मेदारी बीएलए ने ली थी। इस तरह बार-बार होने वाले हमलों ने पहले से ही संकटग्रस्त बलूचिस्तान को और अस्थिर कर दिया है और आर्थिक रूप से डूबी हुई पाकिस्तान की सरकार की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

सीपीईसी को पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य की आधारशिला माना जाता था, लेकिन बलूच विद्रोहियों के विरोध और हिंसक हमलों के कारण यह बड़े पैमाने पर प्रभावित हुआ है। इन हमलों को लेकर चीन भी पाकिस्तान के समक्ष कई नाराजगी जता चुका है। वहीं, बलूच लोगों का तर्क है कि सीपीईसी के जरिए स्थानीय लोगों की कीमत पर बाहरी लोगों को फायदा पहुँचाया जा रहा है।

पाकिस्तान की भूमिका

यह ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान में वर्षों से स्थिरता नहीं है, चाहे वह आर्थिक हो या राजनीतिक। ऐसी स्थिति के बीच पाकिस्तान ने बलूच प्रतिरोध का जवाब सैन्य अभियानों और बातचीत के प्रयासों के मिश्रण से दिया है। हालाँकि, केंद्र में अस्थिरता के कारण पाकिस्तानी सरकार के साथ-साथ सेना भी हिंसा को नियंत्रित करने में विफल रही है।

ऑपइंडिया को दिए इंटरव्यू में डॉक्टर नज़र ने राजनीतिक अस्थिरता की समस्या भी उठाई थी। उन्होंने कहा था, “पाकिस्तान में कोई लोकतंत्र नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जो बलूचों को विद्रोह के लिए मजबूर करती है वह है, ज़ुल्म और गुलामी। जब मैं देखता हूँ कि मेरा राष्ट्र जीवन के सभी पहलुओं से वंचित है और हर क्षेत्र में उपेक्षित है, यहाँ तक कि पानी की एक बूँद की भी कमी है, तो मुझे और क्या करना चाहिए?”

उन्होंने आगे कहा था, “कुछ संघीय दल जो इस्लामाबाद की कठपुतली हैं, उन्हें बलूच के प्रतिनिधि के रूप में दिखाते हैं लेकिन यह वास्तविकता नहीं है। दूसरी ओर, सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में आईएसआई और पाकिस्तानी सेना की छाया सरकार है। आम बलूच लोग बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और अन्य स्वतंत्रता चाहने वाले संगठनों का समर्थन कर रहे हैं।”

बलूचिस्तान में शांति स्थापित नहीं होने के पीछे विद्रोहियों पर सैन्य कार्रवाई को भी एक बड़ा कारण के रूप में देखा जाता है। सैन्य छापों और नाकेबंदी के परिणामस्वरूप और अधिक शिकायतें और मानवाधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्टें सामने आई हैं। भारत ने भी कई मौकों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंता व्यक्त की है। सितंबर 2016 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाया था।

भारत ने कहा था, “बलूचिस्तान के लोग दशकों से दुर्व्यवहार और यातना के खिलाफ बहादुरी भरा संघर्ष कर रहे हैं। हिंदू, ईसाई, शिया, अहमदिया, इस्माइली और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को पाकिस्तान में भेदभाव, उत्पीड़न और लक्षित हमलों का सामना करना पड़ रहा है। अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों को नष्ट कर दिया गया है। ईशनिंदा कानून का इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ असंगत रूप से किया जाता है।”

बलूचिस्तान की स्थिति के लिए भारत सहित विश्व के नेताओं के समर्थन के साथ-साथ गहरी समझ और बहुमुखी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। बलूचिस्तान के लोगों की वैध चिंताओं को दूर करना और यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उन्हें संसाधनों का उचित स्वामित्व मिले। इसके अलावा, मूल आबादी के सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों का सम्मान करना आवश्यक है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। आप इस लिंक को क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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