Homeराजनीतिमाखनलाल यूनिवर्सिटी की जाँच समिति के गठन पर ख़ुद घिरी कॉन्ग्रेस

माखनलाल यूनिवर्सिटी की जाँच समिति के गठन पर ख़ुद घिरी कॉन्ग्रेस

मध्य प्रदेश की सरकार 2003 के बाद की नियुक्तियों की जाँच अपने दागी अधिकारियों से क्यों करवाने पर तुली है? क्या इसके पीछे कोई साज़िश या खेल है, जिसे कॉन्ग्रेस प्रयोजित तरीक़े से अंजाम तक ले जाने की कोशिश में है?

मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को सत्ता पर आसीन हुए अभी जुम्मा-जुम्मा कुछ ही दिन हुए हैं और पार्टी ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। अभी-अभी सत्ता पर विराजमान हुई कमलनाथ सरकार ने आईएएस अधिकारी पी नरहरी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में नियुक्त किया।

कुलपति बनाए गए पी नरहरी कॉन्ग्रेस द्वारा संचालित राजीव गाँधी फाउंडेशन का प्रचार अपने सोशल मीडिया से कर चुके हैं। राजीव गाँधी फाउंडेशन जैसे गैर-सरकारी तंत्र का प्रचार करने वाले को एकाएक कुलपति नियुक्त करना किस हद तक न्यायोचित है? क्या उनकी सबसे बड़ी क़ाबिलियत फाउंडेशन का प्रचार करना है या फिर इसके पीछे कॉन्ग्रेस की राज्य सरकार की कुछ और ही मंशा छिपी हुई है?

अभी हाल ही में माखनलाल विश्वविद्यालय को लेकर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा एक जाँच समिति का गठन किया गया है। इसके अध्यक्ष के रूप में एक आईएएस अधिकारी एम गोपाल रेड्डी को नियुक्त किया गया है। एम गोपाल रेड्डी की छवि भी बेदाग नहीं है। यह वही रेड्डी हैं, जिनके ख़िलाफ़ सेवा के दौरान भ्रष्टाचार समेत तमाम आरोप लगे थे। इनके ख़िलाफ़ जालसाज़ी जैसे गंभीर मामले भी दर्ज़ हुए थे। भ्रष्टाचार मामलों में आरोपित रेड्डी को अध्यक्ष बनाना कितना न्यायसंगत है, इसे समझना किसी के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। साथ ही यह कॉन्ग्रेस की मंशा को भी स्पष्ट करता है।

आपको बता दें कि माखनलाल विश्वविद्यालय की स्थापना मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पारित अधिनियम से हुई थी। भारत के उपराष्ट्रपति इसके विजिटर हैं। ऐसे में ताज्जुब की बात है कि इस जाँच समिति का गठन उपराष्ट्रपति को जानकारी दिए बिना ही हो गया। कॉन्ग्रेस का यह एक-तरफा निर्णय उसके तानाशाही स्वभाव को व्यक्त करता है।

इस पूरे मामले की तह तक जाने पर कॉन्ग्रेस की भ्रष्ट सोच सामने आती है। क्योंकि सवाल अब यह है कि कॉन्ग्रेस 2003 के बाद की ही नियुक्तियों की जाँच अपने दागी अधिकारियों से क्यों करवाने पर तुली है? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक साज़िश या खेल है, जिसे कॉन्ग्रेस किसी प्रायोजित तरीक़े से अंजाम देने की कोशिश कर रही है? और यह मान भी लिया जाए कि कॉन्ग्रेस जाँच करा ही रही है, तो फिर उसके लिए साल 2003 ही क्यों निर्धारित किया गया?

विश्वविद्यालय की नींव 1991 में रखी गई थी। उसके बाद तो कॉन्ग्रेस ने ही वहाँ वर्षों तक एकछत्र राज किया था। तब क्या कॉन्ग्रेस गहरी नींद में सोई हुई थी या इतनी आश्वस्त थी कि उसके शासनकाल में कोई गड़बड़ी ही नहीं हुई! उस समय दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। सवाल यह है कि जाँच करने पर अमादा कॉन्ग्रेस, विश्वविद्यालय की स्थापना के समय से ही जाँच क्यों नहीं कर रही है। क्या कॉन्ग्रेस इस बात से डरी हुई है कि अगर जाँच शुरुआत से हुई तो कहीं उनके काले-चिट्ठे सामने ना आ जाएँ?

Subtitle – मध्य प्रदेश की सरकार 2003 के बाद की नियुक्तियों की जाँच अपने दागी अधिकारियों से क्यों करवाने पर तुली है? इसके पीछे कोई साज़िश या खेल है जिसे कॉन्ग्रेस प्रयोजित तरीक़े से अंजाम तक ले जाने की कोशिश में है
Excerpt – एक भगोड़े और मनी लॉन्ड्रिंग के दोषी ज़ाकिर नइक से कॉन्ग्रेस की इतनी गहरी दोस्ती की आख़िर क्या वजह हो सकती है

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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