Saturday, November 28, 2020
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वाराणसी से PM मोदी के ख़िलाफ़ प्रियंका गाँधी को मैदान में ना उतारने पर ‘न्यूट्रल’ मीडिया ने बदला पाला

कॉन्ग्रेस द्वारा अजय राय की उम्मीदवारी घोषित होने से पता चलता है कि कॉन्ग्रेसी खेमे में उम्मीदवारों की कितनी किल्लत है। क्षेत्र की महिलाओं के विकास करने का मुद्दा उठाने वाली प्रियंका का मोदी के ख़िलाफ़ न खड़ा होना इस बात का संकेत है कि कॉन्ग्रेस अपनी स्वांगरुपी राजनीति का प्रमाण देने में ख़ुद ही सक्षम है।

28 मार्च को कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रियंका गाँधी से रायबरेली से चुनाव लड़ने के संबंध में सवाल पूछा था, जो कि उनकी माँ का गढ़ है। उस समय, प्रियंका गाँधी वाड्रा ने जवाब दिया था – ‘वाराणसी क्यों नहीं’? लगभग एक महीने के अंतराल के बाद, कॉन्ग्रेस ने वाराणसी से अजय राय को प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ मैदान में उतारने का फ़ैसला किया है और इस फ़ैसले पर ‘न्यूट्रल’ मीडिया अपनी नाराज़गी को नहीं रोक पा रहा है।

कॉन्ग्रेस द्वारा अजय राय की उम्मीदवारी घोषित होने से पता चलता है कि कॉन्ग्रेसी खेमे में उम्मीदवारों की कितनी किल्लत है। प्रियंका गाँधी, जिन्होंने कभी महिलाओं का उद्धार करने का बीड़ा उठाया था, असल में वो चुनावी मैदान से दूरी बनाती दिख रही हैं। क्षेत्र की महिलाओं के विकास करने का मुद्दा उठाने वाली प्रियंका का मोदी के ख़िलाफ़ न खड़ा होना इस बात का संकेत है कि कॉन्ग्रेस अपनी स्वांगरुपी राजनीति का प्रमाण देने में ख़ुद ही सक्षम है।   

बरखा दत्त जो अक्सर बुरहान वानी जैसे आतंकवादियों के साथ सहानुभूति रखती हैं और कश्मीरी पंडित नरसंहार के बहाने नाजी जैसी कहानी कहती हैं। उन्होंने ट्वीट किया कि अगर कॉन्ग्रेस उन्हें मैदान में उतारने के पक्ष में नहीं थी तो प्रियंका को वाराणसी से लड़ने की इच्छा नहीं जतानी चाहिए थी। हम प्रियंका के दर्द को समझते हैं, आख़िरकार, एक बार आशा बन जाने के बाद जब वो टूट जाती है तो वाकई दिल को चोट पहुँचती है।

अभिसार शर्मा, जो कॉन्ग्रेस के वफ़ादार पत्रकारों में से एक थे, उन्होंने भी अपना ग़ुस्सा कॉन्ग्रेस पार्टी पर उतारा। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा, “डरपोक.. क्या भस्मासुरी पार्टी है! कोई विज़न नहीं है। कोई साहस नहीं।
राहुल के पास न तो कोई अधिकार ही है और न ही क्षेत्रीय तानाशाह उनकी बात सुनते हैं।

हरिंदर बावेजा ने प्रियंका गाँधी पर तीखा प्रहार करते हुए लिखा कि यह उन लोगों की मूर्खता थी जो मानते थे कि @priyankagandhi वाराणसी में @narendramodi के ख़िलाफ़ लड़ेंगी।

बरखा दत्त ने जवाब दिया कि कॉन्ग्रेस ने जो वादा किया था, वो यही था।

पल्लवी घोष ने @priyankagandhi और @RahulGandhi के केट में सस्पेंस पर सवाल उठाए।

इस सब के बाद, निखिल वागले ने ट्वीट किया कि @RahulGandhi को महान सेनानियों के जीवन की कहानियों का अध्ययन करना चाहिए। खेल, कला, संगीत, राजनीति, उद्योग…. तब उन्हें एहसास होगा कि कैसे सभी ने एक सही समय पर जोख़िम उठाया और बहुत से सलाहकारों की बात नहीं मानी। इसके लिए वो मोदी से भी सीख सकते हैं!

कॉन्ग्रेस के इस फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए बचाव करने के मूड में रिफ़त जावेद ने प्रियंका गाँधी को बहादुरी के तमगे से नवाज़ने का काम किया।

शिवम विज ने गाँधी से बेहतर केजरीवाल को बताया।

संकर्षण ठाकुर ने मूल रूप से कॉन्ग्रेस भी मोदी के ख़िलाफ़ एक प्रतीकात्मक लड़ाई नहीं करना चाहती है; वाराणसी में अजय राय की तुलना में उनसे अधिक थका हुआ और परखा हुआ कोई दूसरा नहीं है।

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर राजदीप सरदेसाई भी अपनी राय रखने से नहीं चूके। उन्होंने ट्वीट किया कि आख़िरकार @priyankagandhi के वाराणसी से चुनाव न लड़ने की तस्वीर साफ़ हो ही गई।

अब यह तस्वीर साफ़ हो चली है कि कॉन्ग्रेस के हिमायती रही वफ़ादार मीडिया ने किस तरह से प्रियंका गाँधी वाड्रा को एक हमदर्द और रक्षक के रूप में प्रचारित-प्रसारित करने का काम किया था। उन्हें उम्मीद थी कि प्रियंका गाँधी वाड्रा उनकी रक्षक होंगी। और इसीलिए उन्होंने भाई-बहन (राहुल-प्रियंका) की जोड़ी को मसीहा के रूप में प्रचारित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन उन्हें यह एहसास हो चला है कि वो अब तक किसी हारने वाले घोड़े पर ही दाँव लगाते रहे।

नुपुर शर्मा के मूल अंग्रेजी लेख का अनुवाद प्रीति कमल ने किया है।

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Nupur J Sharma
Editor, OpIndia.com since October 2017

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