‘द गार्जियन’ ने 30 जून 2026 को उमर खालिद पर एक भावनात्मक लेख प्रकाशित किया, जिसमें 2020 के हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगों के साजिशकर्ता को भारत का सबसे प्रमुख ‘राजनीतिक कैदी’ बताते हुए असहमति की वजह से सरकारी कार्रवाई का शिकार बताया गया। जेल और बाहर निकलने की धूमिल होती उम्मीद के बीच इस लेख में कही भी दिल्ली दंगों को लेकर उस पर लगे आरोपों की पड़ताल नहीं की गई ।
इस लेख की पड़ताल न केवल इसमें कही गई बातों के लिए, बल्कि इसमें जानबूझकर छोड़ी गई बातों के लिए भी किया जाना चाहिए। यह प्रकाशन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा उमर खालिद को दिए गए समर्थन के बीच आया है। ये वही पार्टी है, जिसका विरोध प्रदर्शन नीट पेपर लीक और युवाओं के मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था। हालाँकि प्रदर्शनकारियों और सीजेपी समर्थकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से उमर खालिद की रिहाई की माँग की है।
उमर खालिद के बारे में ‘द गार्जियन’ ने क्या कहा
‘द गार्जियन’ में प्रकाशित लेख का शीर्षक ‘मानवता एक विशेषाधिकार : उमर खालिद का बिना मुकदमे के भारतीय जेल में छह साल का सफर’ है। भारत विरोधी प्रचार के लिए मशहूर दिल्ली संवाददाता हन्ना एलिस-पीटरसन ने यह लेख लिया है। लेख में उन्होंने खालिद को एक वामपंथी मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखर आलोचक के रूप में उल्लेख किया है। उन्होंने दावा किया कि वह सरकार के विरोधियों के खिलाफ न्यायिक प्रणाली के कथित दुरुपयोग का प्रतीक बन गए हैं।

लेखक ने उमर खालिद की मानसिक और शारीरिक पीड़ा का जिक्र किया, उनके अनुभव की तुलना फ्योदोर दोस्तोवस्की के कारागार संस्मरण से की और भगत सिंह के उस कथन के साथ अपनी बात समाप्त की जो उनकी कोठरी की दीवार पर लिखा था। खालिद से हिंदू राष्ट्रवाद, मुसलमानों की स्थिति जैसे मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की।
हालाँकि, प्रकाशन ने खुद स्वीकार किया कि उसने खालिद के कानूनी मामले पर चर्चा न करने पर सहमति जताई थी। प्रकाशन ने खालिद का सीधा साक्षात्कार भी नहीं लिया, बल्कि प्रश्न और उत्तर उनके रिश्तेदारों और दोस्तों के माध्यम से ही भेजे गए।
‘द गार्जियन’ के लेख में दिल्ली में हिन्दू विरोध दंगों की एक बड़ी साजिश के आरोप को कुछ ही वाक्यों में समेट दिया गया, जबकि हिंसा के समय उत्तर-पूर्वी दिल्ली में उसकी गैरमौजूदगी को प्रमुखता से बताया गया, मानो साजिश करने के लिए घटनास्थल पर होना आवश्यक हो।
जाहिर है द गार्जियन की इस रिपोर्ट ने देश के राजनीतिक और वैचारिक माहौल में गर्मी पैदा कर दी। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने इसे ‘भावुक करने वाला लेख’ बताया और पूछा कि अदालत में ये आरोप साबित क्यों नहीं हुए।
This moving article on @UmarKhalidJNU in prison prompts a simple question: if he really has incited terrorism, why not prove it in a court of law? Why deny him the basic right of any Indian citizen accused of a crime, the right to a fair trial? Languishing six years behind bars,…
— Shashi Tharoor (@ShashiTharoor) June 30, 2026
इतिहासकार होने का ढोंग करने वाली प्रचारक रुचिका शर्मा ने कहा कि भारत की ‘सामूहिक चेतना’ मर चुकी है, जबकि द गार्जियन के लिए लिखने वाले कौशिक राज ने दावा किया कि दुनिया खालिद के खिलाफ ‘अन्याय’ पर ध्यान दे रही है।
India's collective conscience is so déad that a bright mind has been in jail without trial, without bail for 6 years now, yet there has been very little outrage over this thoroughly illegal incarceration. What a morally vacuous society! https://t.co/t4QgKXSnkz
— Dr. Ruchika Sharma (@tishasaroyan) June 30, 2026
सीजेपी के संस्थापक और प्रवक्ताओं ने खुले तौर पर खालिद का समर्थन किया
खालिद को मिलने वाला समर्थन केवल कुछ गिने-चुने सीजेपी अनुयायियों तक ही सीमित नहीं था। यह समर्थन संगठन के संस्थापक और दूसरे बड़े चेहरों का भी था।
इस साल की शुरुआत में, सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सवाल उठाया था कि खालिद को बिना मुकदमे के जेल में क्यों रखा गया है और दावा किया था कि उसके साथ अलग तरह से व्यवहार किया जा रहा है।

समदिश भाटिया के साथ हाल ही में हुए एक साक्षात्कार में , ‘अनफिल्टर्ड बाय समदिश’ कार्यक्रम में, दिपके ने दावा किया कि उन्होंने अपने आंदोलन को शांतिपूर्ण, संविधान-केंद्रित और ‘बदनाम से बचा कर’ रखा है। हालाँकि उन्होंने कहा कि उनका उपनाम खालिद नहीं है, अगर वह खालिद, सैफी या मुस्लिम होते, तो जेल में होते।
ऐसा कह कर दिपके ने यह संकेत देने की कोशिश की कि उमर खालिद जैसे तथाकथित मुस्लिम ‘कार्यकर्ताओं’ को उनकी धार्मिक पहचान के कारण जेल में डाला गया और उनके खिलाफ लगे गंभीर आपराधिक और षड्यंत्र के आरोपों को जानबूझकर अनदेखा किया गया। कार्यक्रम में जबरदस्ती खालिद की चर्चा करना अजीब था, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया कि वे वास्तव में क्या करने की कोशिश कर रहे थे।
If my name were Khalid or Saif, I would be in Jail.
— Mr. Democratic (@MrDemocratic_) July 1, 2026
– CJP Founder pic.twitter.com/aRX3gVivoU
प्रवक्ता सौरभ दास ने इससे भी आगे बढ़कर खालिद के खिलाफ लगे आरोपों को ‘झूठा’ और ‘मनगढंत’ बताया और उसकी कैद को भारत की न्यायपालिका पर एक कलंक करार दिया।

मुख्य न्यायिक परिषद की प्रवक्ता विजेता दहिया ने खालिद के खिलाफ मामले को महात्मा गाँधी के उद्धरण वाले भाषण और व्हाट्सएप ग्रुप में उनकी मौजूदगी तक सीमित करने की कोशिश की। जब उनसे दिल्ली दंगों में मारे गए 50 से अधिक लोगों और बड़े षड्यंत्र के मामले के बारे में सवाल किया गया, तो दहिया ने यह कहकर मामला टाल दिया कि कोई मुकदमा नहीं चला है और सवाल पूछने वाले पत्रकार पर ‘गोदी मीडिया’ होने का आरोप लगाया।
CJP Spokesperson Vijeta Dahiya Supporting Umar Khalid.
— Dear Men (@Dear_Men_Life) June 6, 2026
Reporter:"Viral Video of Saurav Das backing Umar Khalid".
Vijeta Dahiya:"Umar Khalid just gave a speech where he quoted Gandhiji thats it"
Reporter:"Because of him 40 people died"
Vijeta:"Godi Media"
Shamelss Cockroach pic.twitter.com/G5HhfRJdVv
इस दौरान ये दलील दी गई कि मुकदमा चलने दो, दोषी पाए जाने पर उसे सजा दो और निर्दोष पाए जाने पर उसे रिहा कर दो। लेकिन बार बार दोषसिद्धि न होने पर आरोपों को झूठा करार दिया गया। साथ ही अदालती कार्यवाही को जल्द से जल्द खत्म करने की माँग की गई।
उमर खालिद की कानूनी कार्यवाही का इतिहास ‘छह साल बिना मुकदमे के’ नारे से कहीं अधिक जटिल रहा है। उनकी जमानत याचिकाएँ लगातार खारिज होती रही हैं। 24 मार्च 2022 में ट्रायल कोर्ट, 18 अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट, 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दायर अर्जी खारिज की गई। इसके अलावा 16 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पुनर्विचार याचिका खारिज की। 19 मई 2026 को दिल्ली की एक अदालत ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका भी नामंजूर कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अर्जी खारिज करते हुए दोहराया था कि इस मामले में कई आरोपित शामिल हैं, भारी मात्रा में दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सबूत मौजूद हैं और आरोप एक सुनियोजित और निरंतर साजिश से संबंधित हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि उमर खालिद और अन्य आरोपी केवल अभियोजन में देरी के कारण जेल में हैं या उन्होंने इस देरी में कोई भूमिका नहीं निभाई है।
हालाँकि व्यापक संदर्भ में बात की जाए तो लंबे वक्त तक हिरासत पर बहस जायज है, लेकिन उमर खालिद के मामले में मुकदमे में देरी न्याय व्यवस्था की वजह से नहीं, बल्कि खुद आरोपितों की वजह से हुई। उमर खालिद और इस बड़े षड्यंत्र मामले के दूसरे आरोपितों ने मुकदमे में देरी करने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाया और फिर इस देरी को जमानत माँगने का बहाना बनाया। बार-बार जमानत की अर्जी देने से लेकर मुकदमे की शुरुआत को रोकने की अर्जी देने तक, इस बात के पर्याप्त सबूत थे कि मुकदमे में छह साल की देरी के लिए भारत की न्याय व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है।
सीजेपी के प्रदर्शनकारियों ने उमर खालिद को अपना नेता बताया
6 जून को जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी के विरोध प्रदर्शन में भी खालिद का समर्थन स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। एक प्रदर्शनकारी को यह कहते हुए दिखाया गया कि उमर खालिद हमारे नेता हैं। एक अन्य ने कहा कि वह खालिद का समर्थन करता है और इसमें उसे कोई बुराई नहीं दिखती। सीजेपी के एक समर्थक ने खालिद और शरजील इमाम को देश के सर्वोच्च राजनीतिक पदों के संभावित भावी पदाधिकारी भी बताया।
"Umar Khalid is Our Leader" — Cockroach Supporter at 'Jantar Mantar'
— Dhirendra Singh (@dhiru13) June 6, 2026
Nothing Strange they are aligned with Cockroach Party Leadership.. #IndiaRejectsCJP #cjp_पार्टी pic.twitter.com/lTbXaOmizo
जब एक महिला ने खालिद के बारे में एक बुजुर्ग समर्थक से सवाल किया, तो उसने आरोपों का जवाब देने के बजाय अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी की। हालाँकि प्रदर्शनकारी फैजान अंसारी ने खालिद का समर्थन करने वाले सीजेपी सदस्यों की आलोचना की, जिससे पता चलता है कि यह मुद्दा प्रदर्शनों में मौजूद लोगों के बीच भी विवाद का विषय बन गया था।
Faizan Ansari, being a Muslim, is saying that the members of the Cockroach Party who support Umar Khalid, a terrorist who raised the slogan 'Bharat tere tukde honge', beta tukde tumhari party ke honge… pic.twitter.com/cqSwXIug85
— Dilpreet Grewal ☬ (@DpreetG) June 11, 2026
फिर भी समर्थन की बार-बार की गई घोषणाएँ संगठन के उद्देश्य को दर्शाती हैं। इसके नेता- प्रवक्ता और सीजेपी के डिस्कोर्ड समुदाय के सदस्य जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे, उससे खालिद के प्रति उनका स्टेंड काफी साफ झलक रहा था।
Cockroach 🪳 saying I support Umar Khalid, there is nothing wrong in it.
— Oxomiya Jiyori 🇮🇳 (@SouleFacts) June 7, 2026
I don’t know Chicken neck, I have no idea.
These cockroach 🪳 are the real danger, immediately HIT should be used against them. pic.twitter.com/F4QkKs4DLM
उमर खालिद को रिहा करने की माँग के बाद सीजेपी के डिस्कोर्ड चैनल पर मैसेज की भरमार हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, लॉन्च होने के कुछ ही दिनों में 20,000 से अधिक सदस्य जुटा चुके CJP के डिस्कोर्ड चैनल ने आंदोलन के कुछ हिस्सों की वैचारिक दिशा की स्पष्ट तस्वीर पेश की। OpIndia की जाँच में खालिद के समर्थन में एक बेहद चिंताजनक प्रवृत्ति का खुलासा हुआ।
जब एक यूजर ने खालिद का समर्थन करने के लिए दिपके की आलोचना की, तो दूसरे सदस्य ने कहा कि खालिद के लिए दिपके का समर्थन ही वह कारण है जिसके चलते अब वह दिपके और सीजेपी दोनों का पूरी तरह से समर्थन करेगा। यूजर ने खालिद की कैद को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया।
ऐसे ही एक चर्चा में संगठन के एक सदस्य ने कहा, “उमर खालिद वही हैं जिनकी इस देश में हमें जरूरत है। इसीलिए तो मुख्य न्यायिक समिति (सीजेपी) का गठन हुआ है।” चैनल पर ‘उमर खालिद को रिहा करो’ के कई संदेश दिखाई दिए। खालिद को ‘क्रांतिकारी’ बताया गया, जबकि उन्हें और दिपके को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहा गया। एक यूजर ने दिपके को भारत की प्रधानमंत्री और खालिद को रक्षा मंत्री बनाने की बात भी की।
कुछ लोगों ने खालिद के खिलाफ आरोपों को निराधार बताया, न्यायपालिका के भ्रष्ट होने का दावा किया और तर्क दिया कि उसे उसके धर्म के कारण आतंकवादी करार दिया गया है। एक यूजर ने तर्क दिया कि खालिद आतंकवादी नहीं हो सकता क्योंकि कई वर्षों बाद भी आरोप साबित नहीं हुआ है।
जब व्यापक षड्यंत्र के मामले पर सवाल उठे, तो चर्चा अक्सर सबूतों के आधार पर नहीं, बल्कि भावनाओं से होने लगती है। खालिद को एक छात्र, विद्वान, राजनीतिक कार्यकर्ता, पीड़ित, क्रांतिकारी और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में उल्लेख किया गया। पुलिस, मीडिया और न्यायपालिका को उसके खिलाफ बताया गया। यह मामले की जाँच नहीं थी, बल्कि यह जाँच को ही अनैतिक दिखाने का एक तरीका था।
उमर खालिद कौन है और दिल्ली दंगों की साजिश में उसकी क्या भूमिका है?
कोर्ट में उमर खालिद के खिलाफ जो केस हैं, उसमें उसे ऐसे दंगाई के रूप में पेश नहीं किया गया है जिसने व्यक्तिगत रूप से पत्थर फेंके हों या संपत्ति में आग लगाई हो, बल्कि उस पर फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने, वैचारिक तौर पर संचालन करने और सबका समन्वय करने का आरोप है।
इसलिए बार-बार यह तर्क देना कि खालिद हिंसा के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में शारीरिक रूप से मौजूद नहीं था, अपने आप में उसके खिलाफ लगे आरोपों का जवाब नहीं देता। किसी साजिश के मामले में, अभियोजन पक्ष को कथित योजना में भागीदारी साबित करनी होती है, न कि उस योजना को अंजाम दिए जाने वाले हर स्थान पर शारीरिक तौर पर मौजूदगी।
अभियोजन पक्ष ने खालिद के 20 फरवरी 2020 को अमरावती में दिए गए भाषण का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने 24 फरवरी का जिक्र किया था, जिस दिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का भारत दौरा निर्धारित था। भाषण के चार दिन बाद दंगे शुरू हुए।
उसका नाम एफआईआर 59, एफआईआर 114 और व्यापक साजिश से जुड़ी आरोपपत्रों में दर्ज था। अभियोजन पक्ष ने 8 जनवरी को शाहीन बाग में हुई बैठक, उमर खालिद और ताहिर हुसैन के बीच कथित कड़ी के रूप में खालिद सैफी की भूमिका, नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर ‘बड़ी कार्रवाई’ करने की चर्चा, कथित वित्तीय सहायता और रसद संबंधी सहायता, व्हाट्सएप समूह, पर्चे, भाषण, बैठकें, डिजिटल साक्ष्य और गवाहों के बयानों का हवाला दिया।
अभियोजन पक्ष ने दंगों के बाद कार्यकर्ताओं, मशहूर हस्तियों, पत्रकारों और मीडिया जगत की हस्तियों के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि हिंसा के बाद एक मनगढंत कहानी गढ़ने का प्रयास किया गया था।
खालिद को एक नेता के रूप में प्रस्तुत करने और उसके अतीत को छिपाने के लिए एक सुनियोजित अभियान चलाया गया।
‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट और सीजेपी के अभियान ने एक ही तरह की रणनीति अपनाई। सबसे पहले आरोपों को उनके संदर्भ से अलग कर दिया गया। साजिश, गुप्त बैठक, आर्थिक मदद, समन्वय और लामबंदी के कार्यों को ‘एक भाषण’ और ‘एक व्हाट्सएप ग्रुप’ बोलकर हल्का करने की कोशिश की गई।
लेख में सारा ध्यान खालिद की पहचान और उसके कष्टों पर केंद्रित हो गया। जेल में बिताए उसके वर्षों को उत्पीड़न का प्रमाण माना गया, जबकि मामले से जुड़े सवालों को अमानवीय हमलों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
तीसरा हर उस संस्था को अमान्य घोषित कर दिया गया जिसने पसंदीदा कहानी का समर्थन नहीं किया। पुलिस पर मनगढ़ंत बातें गढ़ने का आरोप लगाया गया, न्यायपालिका को भ्रष्ट बताया गया और असुविधाजनक सवाल उठाने वाले पत्रकारों को ‘गोदी मीडिया’ कहकर खारिज कर दिया गया।
अंततः खालिद जमानत की गुहार लगाने वाला एक आरोपी से एक क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रीय नेता और यहाँ तक कि देश का एक भावी मंत्री के तौर पर दिखाने की कोशिश की गई।
इसका उद्देश्य केवल यह तर्क देना नहीं था कि एक कैदी समय पर सुनवाई का हकदार है। बल्कि इसका उद्देश्य कानूनी राहत की माँग करने वाले आरोपी और एक राजनीतिक हस्ती के बारे में बताना था जो ‘निर्दोष’ है। उसने यह नहीं देखा कि दोषमुक्त साबित अभी नहीं हुआ है बल्कि गंभीर मामले में आरोपित है।
सीजेपी और खालिद के लिए चलाए जा रहे अभियान के बीच संबंध
सीजेपी ने 6 जून को जंतर-मंतर पर अपना पहला विरोध प्रदर्शन किया। खालिद की तीसरी जमानत याचिका भी जून की शुरुआत में ही दायर की गई थी, जिसके समर्थन में दिए गए हलफनामे पर 5 जून की मुहर लगी थी। याचिका में लंबी कैद और सुप्रीम कोर्ट के हालिया घटनाक्रमों के आधार पर नियमित या अंतरिम जमानत की माँग की गई थी।
विरोध प्रदर्शन में सीजेपी समर्थकों ने सार्वजनिक रूप से खालिद को अपना नेता बताया। डिस्कॉर्ड पर सदस्यों ने उनकी रिहाई की माँग की और उन्हें देश की जरूरत के हिसाब से ‘सही व्यक्ति’ बताया। संस्थापक और प्रवक्ताओं ने भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का समर्थन किया था। कुछ हफ्तों बाद ‘द गार्जियन’ ने इस तर्क का अंतर्राष्ट्रीय मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और कॉन्ग्रेस- वामपंथी टिप्पणीकारों ने इसे और भी बल दिया।
सीजेपी खुद को उन युवाओं के लिए एक मंच के रूप में प्रस्तुत करती है जो नीट परीक्षा, परीक्षाओं, बेरोजगारी और राजनीतिक व्यवस्था से निराश हैं। ये मुद्दे इसे एक व्यापक और भावनात्मक रूप से प्रेरित भर्ती आधार प्रदान करते हैं। फिर भी इसके नेताओं के बयानों, विरोध प्रदर्शनों और ऑनलाइन मंचों में उमर खालिद को बार-बार पीड़ित, नायक और भावी नेता के रूप में पेश किया जाता है।
इससे एक गंभीर सवाल उठता है कि क्या NEET इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य है या फिर यह व्यापक वैचारिक लामबंदी के लिए महज एक ‘मुखौटा’ है।
भारतीय न्याय व्यवस्था के तहत हर आरोपित को जमानत माँगने, शीघ्र सुनवाई की माँग करने और अपने खिलाफ लगे हर आरोप का खंडन करने का अधिकार है। अभियोजन पक्ष द्वारा अपना मामला साबित किया गया है या नहीं, यह निर्धारित करना न्यायपालिका का कर्तव्य है। हालाँकि कानूनी बचाव का अधिकार और आरोपों को सार्वजनिक चर्चा से मिटाने का अधिकार एक समान नहीं हैं। न ही लंबे समय तक कारावास में रहने पर कोई निर्दोष साबित हो जाता है।
‘द गार्जियन’ में उमर खालिद का जेल संस्मरण, सीजेपी नेताओं के सार्वजनिक बयान, विरोध स्थल पर की गई घोषणाएँ, डिस्कॉर्ड अभियान और राजनीतिक प्रचार, ये सभी एक ही दिशा में आगे बढ़ते हैं।
पिछले छह वर्षों में उमर खालिद को एक नायक, एक उभरते नेता और भारत सरकार द्वारा सताए गए व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दिल्ली दंगों में उसकी भूमिका और अफजल गुरु जैसे आतंकवादियों के बारे में उनके विचारों को द गार्जियन जैसे हर लेख के साथ धीरे-धीरे दबा दिया जा रहा है। मुकदमे में जानबूझकर की गई देरी ने इस तथाकथित ‘छात्र नेता’ को राजनीतिक क्षेत्र में एक प्रमुख व्यक्ति बनने का आसान रास्ता प्रदान कर दिया है।


