भारतीय वायुसेना की लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ है। करीब 40 सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमान अब एयर-लॉन्च ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों से लैस हो चुके हैं। Su-30MKI पहले से ही भारतीय वायुसेना की रीढ़ माना जाता है और ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। इन दोनों के साथ आने से भारत को जमीन और समुद्र दोनों मोर्चों पर लंबी दूरी से तेज और सटीक प्रहार करने की बड़ी ताकत मिली है।
भारत के पास करीब 270 Su-30MKI लड़ाकू विमान हैं। इनमें से 40 विमानों पर ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम का इंटीग्रेशन हो चुका है और बाकी विमानों पर भी यह काम आगे बढ़ाया जा रहा है। इस अपग्रेड का मतलब है कि भारतीय वायुसेना अब दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के अंदर गहराई तक घुसे बिना भी दूर से सटीक हमला कर सकती है।
40 Su-30MKI ब्रह्मोस से लैस
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सह-निदेशक अलेक्जेंडर मक्सिचेव ने रूस की सरकारी समाचार एजेंसी स्पुतनिक को फ्लीट 2026 इंटरनेशनल मैरीटाइम डिफेंस शो के दौरान बताया कि Su-30MKI विमानों को ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस करने का कार्यक्रम जारी है। उनके अनुसार अभी करीब 40 Su-30MKI लड़ाकू विमान ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस हो चुके हैं।
यह भारत की एयर स्ट्राइक क्षमता के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है। Su-30MKI भारी हथियार ले जाने वाला लंबी दूरी का मल्टीरोल फाइटर जेट है। वहीं, ब्रह्मोस तेज रफ्तार, सटीक निशाने और भारी मारक क्षमता वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। जब ये दोनों एक साथ काम करते हैं, तो भारतीय वायुसेना को दुश्मन के अहम सैन्य ठिकानों, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर, एयरबेस और नौसैनिक ठिकानों को दूर से निशाना बनाने की क्षमता मिलती है।
Su-30MKI क्यों है खास
Su-30MKI एक ट्विन-इंजन, दो सीटों वाला मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। इसे मूल रूप से रूस की सुखोई कंपनी ने विकसित किया था लेकिन भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL इसे लाइसेंस के तहत बनाता है।
इस विमान में भारतीय, रूसी, फ्रांसीसी और इजरायली एविएशन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। Su-30MKI को भारतीय वायुसेना की रीढ़ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह हवा से हवा में लड़ाई, जमीन पर हमला और समुद्री लक्ष्यों पर प्रहार जैसे कई तरह के मिशन कर सकता है।
इसकी बिना रिफ्यूलिंग रेंज करीब 3,000 किलोमीटर बताई जाती है। इसमें भारी हथियार ले जाने की क्षमता है और इसकी उड़ान क्षमता भी मजबूत है। Su-30MKI में थ्रस्ट-वेक्टरिंग इंजन और एडवांस कैनार्ड लगे हैं, जिससे यह हवा में बेहतर मैन्यूवर कर सकता है। यही वजह है कि ब्रह्मोस जैसी भारी और तेज मिसाइल के लिए इसे एक मजबूत प्लेटफॉर्म माना जाता है।
ब्रह्मोस मिसाइल की ताकत
ब्रह्मोस मिसाइल भारत के DRDO और रूस के NPO Mashinostroyeniya का संयुक्त प्रोजेक्ट है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की Moskva नदी के नाम पर रखा गया है। यह रैमजेट-पावर्ड, प्रिसिजन-गाइडेड सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है।
ब्रह्मोस की रफ्तार करीब Mach 3 है यानी यह लगभग 3700 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से लक्ष्य की ओर बढ़ सकती है। इतनी तेज रफ्तार के कारण दुश्मन के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।
यह मिसाइल जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च की जा सकती है। इसका एयर-लॉन्च वर्जन Su-30MKI के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है। जमीन से लॉन्च होने वाली ब्रह्मोस मिसाइल का वजन करीब 3 टन होता है जबकि एयर-लॉन्च ब्रह्मोस का वजन करीब 2.5 टन है। इस मिसाइल को Su-30MKI पर लगाने के लिए विमान में खास बदलाव किए गए हैं।
ब्रह्मोस कम ऊँचाई पर उड़ान भर सकती है। समुद्र में यह 3 से 10 मीटर की ऊँचाई तक सी-स्किमिंग मोड में उड़ सकती है। इससे दुश्मन के रडार के लिए इसे समय रहते पकड़ना मुश्किल हो जाता है। यह मिसाइल स्टिप डाइव मैन्यूवर के जरिए सटीक हमला भी कर सकती है। इसके विस्तारित रेंज वाले वेरिएंट की मारक दूरी करीब 450 से 500 किलोमीटर बताई जा रही है।
लंबी दूरी से सटीक हमला
Su-30MKI और ब्रह्मोस का सबसे बड़ा फायदा स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता है। इसका मतलब है कि भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की पहुँच से बाहर रहकर भी मिसाइल लॉन्च कर सकता है। इससे विमान और पायलट दोनों की सुरक्षा बढ़ती है और लक्ष्य पर हमला भी सटीक रहता है।
Su-30MKI की करीब 3,000 किलोमीटर की रेंज और ब्रह्मोस की करीब 450 से 500 किलोमीटर की मारक दूरी मिलकर भारत को बहुत लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता देती है। इसका असर जमीन और समुद्र दोनों मोर्चों पर दिखाई देगा। हिंद महासागर क्षेत्र में यह क्षमता खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बड़े युद्धपोतों, एयरबेस, कमांड सेंटर, हथियार डिपो और रडार सिस्टम को निशाना बनाया जा सकता है।
BrahMos-NG से और बढ़ेगी ताकत
मौजूदा ब्रह्मोस के बाद अब भारत और रूस BrahMos-NG यानी Next Generation ब्रह्मोस पर काम कर रहे हैं। ब्रह्मोस एयरोस्पेस और DRDO मिलकर इस नई मिसाइल को विकसित कर रहे हैं। मक्सिचेव के अनुसार अगली पीढ़ी की एयर-लॉन्च सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 2028 से 2029 के बीच तैयार हो सकती है।
BrahMos-NG मौजूदा ब्रह्मोस की तुलना में छोटी और हल्की होगी। मौजूदा एयर-लॉन्च ब्रह्मोस का वजन करीब 2.5 टन है जबकि BrahMos-NG का अनुमानित वजन करीब 1.2 टन बताया जा रहा है। यानी इसका वजन लगभग आधा हो जाएगा।
इस नई मिसाइल में AI-लेवल गाइडेंस और नेक्स्ट-जनरेशन एवियोनिक्स जैसी आधुनिक तकनीक शामिल किए जाने की बात कही गई है। इसका मकसद मिसाइल को ज्यादा सटीक, तेज और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक बनाना है।
एक Su-30MKI पर 5 BrahMos-NG
BrahMos-NG का हल्का वजन भारतीय वायुसेना के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। अभी Su-30MKI आमतौर पर एक ही एयर-लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइल लेकर उड़ता है क्योंकि मौजूदा मिसाइल भारी है और उसे विमान के सबसे मजबूत सेंटरलाइन हार्डप्वाइंट पर लगाना पड़ता है।
BrahMos-NG के हल्का होने के बाद स्थिति बदल सकती है। Su-30MKI में कई हार्डप्वाइंट होते हैं। हालाँकि सभी हार्डप्वाइंट भारी हथियारों के लिए नहीं बने होते लेकिन सेंटरलाइन और इनबोर्ड विंग पायलन जैसे मजबूत हिस्सों पर हल्की मिसाइलें लगाई जा सकती हैं। विशेष लॉन्चर और ड्यूल-इजेक्टर रैक के जरिए भविष्य में एक Su-30MKI पर कई BrahMos-NG मिसाइलें लगाई जा सकती हैं।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में एक Su-30MKI 5 BrahMos-NG मिसाइलों तक ले जाने में सक्षम हो सकता है। अगर यह क्षमता पूरी तरह ऑपरेशनल होती है, तो एक ही विमान एक मिशन में कई सैन्य लक्ष्यों पर हमला कर सकेगा।
पाकिस्तान और चीन के लिए नई चुनौती
BrahMos-NG की मल्टी-टारगेट क्षमता पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए चुनौती बन सकती है। पाकिस्तान के लिए इसका मतलब होगा कि एक ही मिशन में कई एयरबेस, रडार स्टेशन, कमांड पोस्ट, हथियार डिपो, मिसाइल ठिकाने या नौसैनिक ठिकाने निशाने पर आ सकते हैं।
अगर किसी बड़े सैन्य अभियान की स्थिति बनती है, तो भारतीय वायुसेना कम विमानों से ज्यादा प्रभावी हमला कर सकेगी। पहले जहाँ एक Su-30MKI एक ब्रह्मोस मिसाइल लेकर एक बड़े लक्ष्य पर हमला कर सकता था तो वहीं भविष्य में वही विमान कई BrahMos-NG मिसाइलों के साथ कई अलग-अलग सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकेगा।
चीन के संदर्भ में भी यह क्षमता अहम होगी। चीन का J-20 स्टील्थ फाइटर उसकी बड़ी सैन्य ताकतों में गिना जाता है। लेकिन BrahMos-NG जैसी स्टैंड-ऑफ मिसाइल के कारण Su-30MKI को दुश्मन के एयर डिफेंस क्षेत्र में गहराई तक जाने की जरूरत नहीं होगी। वह दूरी से ही सुपरसोनिक मिसाइल लॉन्च कर सकेगा। इससे दुश्मन के स्टील्थ फाइटर और एयर डिफेंस सिस्टम की चुनौती का असर कुछ हद तक सीमित किया जा सकता है।
नौसेना और निर्यात के लिए भी अहम
BrahMos-NG केवल वायुसेना के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय नौसेना के लिए भी अहम हो सकती है। इसका छोटा आकार और हल्का वजन इसे युद्धपोतों और भविष्य के कई लड़ाकू विमानों पर लगाने की संभावना बढ़ाता है। इससे भारत के पास एक ऐसा कॉमन सुपरसोनिक हथियार होगा जिसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल किया जा सकेगा।
भारत ब्रह्मोस को रक्षा निर्यात के बड़े हथियार के रूप में भी देख रहा है। भारत ने ‘ब्रह्मोस’ की आपूर्ति के लिए फिलीपींस और वियतनाम के साथ आधिकारिक समझौते किए हैं तो वहीं इंडोनेशिया के साथ डील अंतिम चरण में है और यूएई (UAE) के साथ बातचीत चल रही है। मिडिल ईस्ट में तनाव के चलते UAE अपनी सैन्य खरीद बढ़ा रहा है और भारत इस मौके को रक्षा निर्यात के लिहाज से अहम मान रहा है।
भारत-रूस का ब्रह्मोस प्रोजेक्ट 1998 में शुरू हुआ था। अब यह दोनों देशों के सबसे सफल रक्षा सहयोगों में गिना जाता है। मौजूदा ब्रह्मोस ने भारत को तेज, सटीक और लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता दी है। वहीं BrahMos-NG इस क्षमता को अगले स्तर पर ले जा सकती है।


