Saturday, November 28, 2020
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‘आतंकवाद से लड़ने’ के बजाय फलाने दिन-तारीख-समय पर फलाने व्यक्ति को मारना है: अजित डोभाल

डोभाल किसी भी कार्य को करने के लिए हमेशा नौसिखिए के अंदाज में जाते' हैं। इससे उन्हें दो फायदे होते हैं- एक तो वह पहले से कुछ भी मान कर नहीं चलते, और दूसरा हर बार काम को करने का नया तरीका तलाशते रहते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोवाल ने हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के चीफ इनोवेशन ऑफिसर डॉ.अभय जेरे को एक साक्षात्कार दिया। लोकसभा टीवी द्वारा प्रसारित यह साक्षात्कार डोवाल का एनएसए बनने के बाद संभवतः पहला विस्तृत साक्षात्कार था। इसे हम दो हिस्सों में प्रकाशित कर रहे हैं।

प्रथम हिस्से के महत्वपूर्ण अंश:

‘बहुत महीन फर्क होता है सही निर्णय और गलत निर्णय में’

सवाल था कि बालाकोट के समय किसी भी मौके पर क्या उन्हें यह लगा कि इस निर्णय को लेना सही न रहा हो। डोवाल ने कहा कि सामान्यतः निर्णय का सही या गलत होना उसे ले लिए जाने और परिणाम आने के बाद ही समझ में आता है। और सही-गलत निर्णय लेने वालों की मानसिकता और क्षमता में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं होता। अतः ‘सही निर्णय’ लेने के लिए जरूरी मानसिक स्थिति को समझ कर उसका विकास करना सही निर्णय लेने की चिंता करने से अधिक आवश्यक है।

अपनी व्यक्तिगत निर्णय-प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए अजित डोवाल ने कहा कि वे सबसे बुरी स्थिति को सबसे पहले दिमाग में स्पष्ट तौर पर कल्पित करते हैं। उसकी ‘कीमत’ के बारे में सोचते हैं- यहाँ तक कि लोगों की मृत्यु के खतरे को भी कीमत-बनाम-परिणाम के रूप में।

फिर वे उस worst-case-scenario के छोटे-छोटे हिस्सों में छोटे-छोटे सुधार करने के तरीके ढूँढ़ते हैं- (मसलन यदि 35 लोग  worst-case-scenario में मर रहे हैं तो इसे कम-से-कम कैसे किया जाए – यह सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिया गया है, ताकि बात समझने में आसानी हो, डोवाल ने खुद नहीं कहा है।)

इस प्रक्रिया को करते हुए वह worst-case-scenario को उस स्तर पर ले आने की कोशिश करते हैं जहाँ निर्णय को लेने से होने वाला नुकसान, या उस निर्णय की ‘कीमत’, उससे होने वाले संभावित फायदे से कम हो जाए- यह उस निर्णय पर अमल करने की न्यूनतम शर्त होती है। बाद में वह इसमें और भी सुधार की जहाँ कहीं गुंजाईश हो, उसे करते रहते हैं।

इसके लिए वे जरूरी समय और तैयारी को आवश्यक मानते हैं। इसके अलावा उनके हिसाब से गुप्तचरों की दुनिया में तकनीकी और गुप्त सूचनाओं का भी आवश्यक स्तर पर होना महत्वपूर्ण होता है।

निर्णय लेने में होने वाले भय को लेकर उनका मानना है कि इस भय को भगाने का सबसे अच्छा तरीका अपने भय को विस्तारपूर्वक, स्पष्ट शब्दों में उल्लिखित करना होता है। उनके हिसाब से अधिकांश मामलों में ऐसा करने से हमें यह अहसास होता है कि हमारे भय का कारण असल में भय से बहुत छोटा है। जिन मामलों में ऐसा नहीं भी होता, वहाँ स्पष्ट रूप से भय को व्यक्त कर देने से उस स्थिति के बारे में क्या किया जा सकता है, यह समझ में आ सकता है।

बहुत महत्वपूर्ण निर्णयों- जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, में वह इस पर भी जोर देते हैं कि किसी एक योजना पर पूरी तरह निर्भर न रहा जाए, बल्कि वैकल्पिक योजनाएँ तैयार रखीं जाएँ। इसके अलावा वे हर बदलती परिस्थिति से निपटने के लिए लचीलेपन का होना जरूरी मानते हैं।

‘कठिन निर्णय लेने के लिए जरूरी है…’

डोवाल की ‘कठिन निर्णय’ की परिभाषा है – ऐसा निर्णय जिसके परिणाम एक बड़ी संख्या के लोगों को एक लम्बे समय के लिए प्रभावित करें। ऐसे निर्णयों में वह बताते हैं कि छोटी-सी चूक कई बार इतिहास की पूरी धारा पलट देती है।

ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय के लिए उदाहरण वे प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित नेहरू के कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का देते हैं। उनके अनुसार उस निर्णय के कारण ही पीओके को पाकिस्तान के चंगुल से मुक्त नहीं कराया जा सका और कश्मीर ही भारत की सभी आतंकवादी समस्याओं के मूल में है। अतः पण्डित नेहरू का वह निर्णय संयुक्त राष्ट्र के कश्मीर पर निर्णय के चलते भारत के दीर्घकालीन हितों के साथ साम्य में नहीं साबित हुआ।

इस उदाहरण को पकड़कर वे आगे समझाते हैं कि दीर्घकालीन, महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए लक्ष्य की स्पष्टता अति आवश्यक है। इसके लिए वे एक ‘टेक्नीक’ भी बताते हैं, जो कि नेताओं से लेकर आम आदमी तक हर किसी के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

डोवाल लक्ष्य को एक कथन में परिवर्तित करने की सलाह देते हैं। और उस कथन से सभी विशेषण और क्रियाविशेषण हटा देने को कहते हैं। यानि केवल संज्ञा और क्रिया बचे। यानि आप का लक्ष्य कथन यह बताए कि क्या करना है, और किन चीज़ों के साथ करना है। किन चीज़ों की भूमिका है।

उसे वे यथासंभव सरल और लघु बनाने को कहते हैं, और व्यर्थ की दार्शनिकता हटाने को कहते हैं।

“यह मत कहिए कि ‘हमें आतंकवाद से लड़ना है’।” वह उदाहरण देते हैं, “यह एक अस्पष्ट और बहुत ही सामान्यीकृत कथन है- यह लक्ष्य नहीं हो सकता। यह तय करिए कि फलाने दिन-तारीख-समय पर फलाने व्यक्ति या गुट को मार गिराना है।”

वह लक्ष्य की स्पष्टता पर जोर देते हुए यह भी इंगित करते हैं सामान्यतः भारतीयों में यह बीमारी होती है कि हम अति दार्शनिकता, तर्क, चिंतन आदि में लक्ष्य को अस्पष्ट और निर्णय को कमजोर कर देते हैं।

‘निर्णय कब नहीं लेना चाहिए’

आगे डोवाल यह समझाते हैं कि निर्णय लेने के लिए क्या-क्या आवश्यकताएँ निर्णय लेने से पहले पूरी होनी चाहिए। सबसे पहले निष्पक्ष भाव से अपनी शक्तियों, दुर्बलताओं, परिस्थितियों, संसाधनों और संभावनाओं की ईमानदार विवेचना आवश्यक है।

वे साथ में यह भी आगाह करते हैं कि भय या क्रोध के वशीभूत होकर निर्णय लेना हमेशा हानिकारक होता है क्योंकि इनके प्रभाव में व्यक्ति तटस्थ नहीं रहता। भयभीत व्यक्ति को ‘मिशन’ की सफलता से अधिक चिंता अपने भय की वस्तु (मसलन अपनी जान) की होती है; वहीं गुस्से में अँधा इंसान अपने अहम् की पूर्ति के लिए मिशन की सफलता के लिए जरूरी संसाधन (मसलन अपनी जान) को दाँव पर लगा बैठता है। यानी कि दोनों ही, क्रोध और भय, लक्ष्य आधारित निर्णय के शत्रु हैं।

डोवाल बताते हैं कि कोई भी निर्णय लेने के पूर्व वे खुद से यह जरूर पूछते हैं कि क्या वे भयभीत या क्रुद्ध तो नहीं हैं। यदि उत्तर हाँ में होता है तो वे निर्णय लेने को तब तक के लिए टाल देते हैं जब तक वे इन भावों पर जय न प्राप्त कर लें।

‘निर्णय ही नहीं, सही विकल्प का चयन भी है जरूरी’

अपने लक्ष्य को तय कर लेने के बाद डोवाल का अगला कदम होता है अपने सामने मौजूद विकल्पों की समीक्षा, और सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव। वह बताते हैं कि हालाँकि कठिन निर्णयों में विकल्प बहुत सीमित होते हैं, पर सर्वथा अभाव कभी नहीं होता। कई बार अपने अनुभव और ज्ञान से आप नए विकल्पों का ‘निर्माण’ भी कर सकते हैं।

गुप्तचरी में, डोवाल के अनुसार, हर विकल्प के साथ समय, मूल्य (आर्थिक व अन्य, यहाँ तक कि सैनिकों की जान के रूप में भी), और अवसर- यह तीन बाध्यताएँ या बंधन (constraints) होते हैं। हर विकल्प को इन तीन कसौटियों पर विश्लेषित कर यह तय करना होता है कि कम-से-कम कीमत पर लक्ष्य को पूरा करने के सबसे करीब कौन सा विकल्प है।

वे आगे बताते हैं कि अधिकांश समय निर्णय और लक्ष्य-निर्धारण भली-भांति कर लेने के बावजूद उस पर अमल करने के लिए गलत विकल्प का चुनाव असफलता का कारण बनता है। इसके अलावा कई बार असफलता का कारण यह भी हो जाता है कि सभी तरह के चुनाव सही कर लेने के बाद तैयारियों में मानवीय कमी रह जाती है- यानि हम अपना शत-प्रतिशत (100%) अपने लक्ष्य को नहीं देते। बाद में अहसास होता है कि यदि इसी चीज़ में अपना सौ फीसदी लगाते तो सफलता मिल सकती थी!

अंत में अजित डोवाल यह भी जोड़ते हैं कि कई बार लक्ष्य-निर्धारण और विकल्प का चुनाव सही होने पर भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं, और उस स्थिति में अपने निर्णय के साथ दृढ़ता के साथ खड़े होकर जो भी परिस्थिति आए, उसमें अपने निर्णय को सही साबित भी करना पड़ता है। वह ऐसी स्थिति की मिसाल के तौर पर शादी को देखते हैं। जैसे कई बार सही इन्सान से शादी करने पर भी जीवन में हर परिस्थिति सही नहीं बीतती, और कई बार हर परिस्थिति में अपने शादी के निर्णय को ही सही साबित करना पड़ता है, अपने अनुकूल परिणाम लाकर।

‘अजित डोवाल में अलग क्या है?’

सवाल था कि अजित डोवाल के बारे में उन्हें जानने वाले कई सारी चीजें कहते हैं, कई सारी विशिष्टताएँ बताते हैं, जिनमें उनका तथाकथित एकाकीपन और टीम की बजाय अकेले गुप्तचर के तौर पर काम करना पसंद करना सबसे ज्यादा उभर कर सामने आता है।

जवाब में छद्म विनम्रता का नाटक न करते हुए डोवाल यह बिना लाग-लपेट के मान लेते हैं कि उनके गुप्तचर करियर से पहले के जीवन ने उनमें निश्चय ही कुछ विशिष्ट गुणों का विकास किया है, जिनका उनके करियर की सफलता में बड़ा योगदान रहा।

अपनी सबसे विशिष्ट चीज़ वह अकेले काम करने की प्रवृत्ति को मानते हैं। उन्होंने बताया कि उनके एकाकी स्वभाव और अकेले काम करने की ओर झुकाव को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरीकों से देखा गया है। एकाकी इकाई के तौर पर काम करने के पीछे वह कारण यह बताते हैं कि एक गुप्तचर की तौर पर वह पूरी टीम की सभी परिस्थितियों को समझ पाने के बजाय अपनी खुद की सभी परिस्थितियों को समझ पाना और उनके अनुसार काम कर पाना और निर्णय ले पाना, ज्यादा आसान मानते थे।

उन्होंने बताया कि इसके अलावा एक और कारण था उनके अकेले काम करने का- गुप्तचरों के काम में खतरा बहुत ज्यादा होता है। और उन्हें यह पसंद नहीं था कि उनके कहने पर कोई खतरा मोल ले। अपने खतरे वह स्वयं उठाना पसंद करते थे। दूसरों को उनकी पसंद और इच्छा के हिसाब से क्या करना चाहिए, क्या खतरा उठाना चाहिए, ऐसा निर्णय लेने देना उन्हें ज्यादा सही लगता था।

डोवाल ने साथ में यह भी जोड़ा कि गुप्तचरी के क्षेत्र में हल्के से भी संशय के साथ काम करने वाले को असफलता का ही मुँह देखना पड़ता है- और वह अपने लिए तो पक्का पता कर सकते हैं कि उनके मन में लेशमात्र भी संशय न हो (वह गीता के श्लोक “संशयात्मा विनश्यति” को उद्धृत करते हैं) पर वह अपने साथ काम कर रहे किसी गुप्तचर के मन में संशय न होने को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकते।

वह ऑपरेशन ब्लैक थंडर का उदाहरण देते हैं कि कैसे जब किसी-न-किसी को ऑपरेशन शुरू होने के पहले अन्दर जाकर आतंकियों की स्थिति के बारे में जानकारी एकत्र करनी थी तो उन्होंने अकेले ही जाना पसंद किया। (बता दें कि इस ऑपरेशन से पहले अजित डोवाल रिक्शा चालक बनकर स्वर्ण मंदिर के अन्दर घुसे थे और दो दिन में आतंकियों की संख्या और पोजीशन के विषय में अहम जानकारी जुटाई थी)

डोवाल ने बताया कि उस दौरान वे अकेले ज्यादा महफूज़ महसूस कर रहे थे। उनके अनुसार गुप्तचरी में अकेले होने का एक फ़ायदा यह भी होता है कि अगर आप गलती से पकड़े गए तो आपके झूठ को काट कर उससे अलग कह देने वाला कोई नहीं होता। इसलिए अगर अकेला गुप्तचर बहुत चालाक है तो वह पकड़े जाने पर भी गुप्त जानकारियाँ ज्यादा आसानी से दुश्मन के हाथ लगने से रोक सकता है और मौका मिलने पर दुश्मन को यथासंभव धोखा दे स्थिति अपने हक़ में पलट सकता है।

अपनी अगली खूबी वह अप्रत्याशित होना बताते हैं। उनके अनुसार उनके 75 वर्षीय जीवन में कभी भी काम करने का तय तरीका नहीं रहा, जिसे तड़ कर दुश्मन उनकी अगली चाल को भाँप जाए। वह हमेशा किसी भी कार्य को करने के लिए हमेशा नौसिखिए के अंदाज में जाते’ हैं। इससे उन्हें दो फायदे होते हैं- एक तो वह पहले से कुछ भी मान कर नहीं चलते, और दूसरा हर बार काम को करने का नया तरीका तलाशते रहते हैं। यहाँ वह कुछ पलों के लिए दार्शनिक हो कहते हैं, “जीवन का हर एक क्षण बचे हुए जीवन का पहला क्षण होता है और इसीलिए उसे बची हुई ज़िन्दगी की एक ताज़ा शुरुआत के तौर पर लेना चाहिए।”

अपनी गति को भी वह अपने गुप्तचर करियर की सफलता का श्रेय देते हैं- उनके अनुसार बेहतर होगा कि हमेशा तेजी से या तो हमला करो या पीछे हट जाओ। इससे सामने वाले को संभलने या पलटवार करने का मौका नहीं मिलता। वह यह भी बताते हैं कि कई बार द्रुत गति गुप्त सूचना लीक हो जाने या प्रक्रियात्मक गलती की भी भरपाई कर सकती है, बशर्ते आप दुश्मन से हमेशा एक कदम आगे चलने लायक तेज़ हों। उस स्थिति में हालाँकि आपकी जीत का अंतर भले ही सामान्य परिस्थिति के मुकाबले बहुत कम हो जाता है, पर कम से कम विजय मिल जाती है।

अंत में वह यह भी जोड़ते हैं कि ‘हर गुप्तचर के लिए वाक्पटु होना’ और ‘गुप्त सूचनाओं को गुप्त रख पाने में सक्षम होना’- दोनों ही अति आवश्यक हैं।

अभी के लिए इतना ही । इस साक्षात्कार का अगला भाग शीघ्र प्रकाशित होगा।

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