पैगंबर मुहम्मद पर विचार रखना नहीं है ईशनिंदा: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

"किसी एक धर्म की आलोचना 'ईशनिंदा' नहीं होनी चाहिए, ठीक वैसे ही किसी दूसरे धर्म की आलोचना को भी क्रांतिकारी नहीं माना जाना चाहिए।"

मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) को ईशनिंदा और किसी व्यक्ति के ज्ञान के आधार पर की गई धार्मिक विषयों पर टिप्पणी, के बीच फर्क को बताते हुए भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता को जमानत दे दी। कार्यकर्ता रंगास्वामी ने अपने एक फेसबुक पोस्ट में पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ पिछले साल कथित रूप से ‘ईशनिंदा’ सम्बंधित लेख लिखा था।

49 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता को चेन्नई में चितलपक्कम पुलिस ने सोशल मीडिया के माध्यम से ‘घृणा’ फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया था। कल्याणसुंदरम रंगास्वामी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के द्वारा मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया है। रंगास्वामी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने पैगंबर मुहम्मद पर कुछ टिप्पणी की थी। जैसे ही वह अहमदाबाद से चेन्नई पहुँचे, उन्हें ‘साइबर पुलिस’ ने पूछताछ के लिए पकड़ा और बाद में अदालत में पेश किया गया जहाँ से रंगास्वामी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

न्यायमूर्ति एन आनंद वेंकटेश ने रंगास्वामी द्वारा किए गए फेसबुक पोस्ट की समीक्षा करने के बाद कहा, “इस अदालत के विचार में, जमानत याचिकाकर्ता ने पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार के बारे में अपनी समझ के अनुसार प्रासंगिक इतिहास पढ़ने के बाद ही लिखा है। इसलिए वो इस शर्त पर जमानत के हकदार हैं कि वह जाँच में सहयोग करेंगे।”

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ज्ञात हो कि यह ‘आपत्तिजनक पोस्ट’ वर्ष 2015 में लिखा गया था। यह मामला इस वजह से भी दिलचस्प है क्योंकि चितलपक्कम के उप-निरीक्षक डी सेल्वमणि ने इस ‘फेसबुक पोस्ट’ को संज्ञान में लिया था और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी थी। सेल्वमणि ने ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ को बताया, “मैंने फेसबुक पर उसकी खोज की और अपमानजनक टिप्पणियाँ पाईं, जो मैंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दिखाई, उन्होंने ही मुझे इस मामले में शिकायतकर्ता बनने के लिए कहा।”

इस बीच, MMK नेता एमएच जवाहिरुल्लाह ने कहा कि रंगास्वामी को 30 दिसंबर को पुलिस आयुक्त ने उनकी शिकायत के बाद गिरफ्तार किया था। जबकि सेल्वमणि और MMK नेता एमएच जवाहिरुल्लाह के बीच इस ‘आपत्तिजनक पोस्ट को संज्ञान’ में लिए जाने के ‘क्रेडिट’ को लेकर विवाद भी हुआ कि आखिर किसकी सक्रियता ने रंगास्वामी को एक फेसबुक पोस्ट के लिए गिरफ्तार कर जेल में बंद करवाया।

भाजपा कार्यकर्त्ता के खिलाफ मामला यह था कि पैगंबर मुहम्मद पर उनकी टिप्पणी से धार्मिक तनाव पैदा होगा और इस कारण दो धर्मों के बीच घृणा और दुर्भावना पैदा होगी। 21 फरवरी 2019 को, लगभग 19 दिनों तक कैद में रहने के बाद, रंगास्वामी को जमानत मिली।

रंगास्वामी के वकील ने अदालत में कहा कि भाजपा कार्यकर्ता ने पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ कोई अपमानजनक या निंदनीय टिप्पणी नहीं की है। बल्कि उनका फेसबुक पोस्ट इतिहास पढ़ने, पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार की राय और समझ देने के बारे में था। उन्होंने तर्क दिया कि रंगास्वामी के ऐसा करने का अधिकार भारत के संविधान द्वारा दी गई स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के तहत सुरक्षित है।

यह ऐतिहासिक निर्णय रंगास्वामी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकरण के निम्न तर्कों पर कसा गया:

  • “धार्मिक विश्वास की बातों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हमेशा से चुनौती मिलती रही है। लेकिन ऐसे भी मौके आए हैं जब ‘दा विंची कोड’ पुस्तक में ईसा मसीह पर सवाल उठाया गया है। ठीक इसी तरह से रामायण में सीता के ऊपर भी सवालिया लेख लिखे गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ लापरवाही भरा और अपमानजनक टिप्पणी करना गलत है लेकिन उससे संबंधित पूरे साहित्य / इतिहास को पढ़ने के बाद अपनी राय व्यक्त करना कहीं से भी गलत नहीं है।”
  • रंगास्वामी की ओर से पेश अधिवक्ता प्रभाकरण ने बहुत ही शानदार और धारदार ढंग अपने तर्क रखे। उन्होंने कोर्ट के सामने तर्क रखा कि अल्पसंख्यक समुदायों और उनसे संबंधित धर्मों (इस्लाम या ईसाई धर्म) की आलोचना पर सरकार हमेशा से कड़े रुख अपनाती रही है। जबकि हिंदू धर्म की आलोचना ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के तहत स्वीकार्य मानी जाती रही है।
  • अधिवक्ता प्रभाकरण ने स्पष्ट किया कि उनका तर्क हिंदू धर्म की आलोचना करने वालों को दंडित करने के लिए नहीं है। बल्कि भारत के संविधान में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कानून समानता के सिद्धांत पर होनी चाहिए। इसलिए किसी एक धर्म की आलोचना ‘ईशनिंदा’ नहीं होनी चाहिए, ठीक वैसे ही किसी दूसरे धर्म की आलोचना को भी क्रांतिकारी नहीं माना जाना चाहिए।

कोर्ट ने वरिष्ठ वकील की दलीलों से सहमति जताई और रंगास्वामी को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि रंगास्वामी ने प्रासंगिक इतिहास पढ़ने के बाद ही पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार पर अपने विचार व्यक्त किए थे। न की उनके ख़िलाफ़ कोई अपमानजनक टिप्पणी की थी।

मद्रास हाई कोर्ट का यह निर्णय आज शायद कानून के नज़रिए से छोटा प्रतीत हो लेकिन ‘ईशनिंदा’ मामले या ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में समानता’ के नज़रिए से यह शायद भविष्य के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।


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