Friday, October 2, 2020
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लोकसभा में पेपर प्लेन, विधानसभा में पेपर बॉल: लेकिन लोकतंत्र की हत्या मोदी कर रहा है!

रैली हम रोकेंगे, चॉपर हम उतरने नहीं देंगे, सीबीआई को गिरफ़्तार हम करेंगे, संसद में प्लेन हम फेंकेंगे, विधानसभा में काग़ज़ की गेंद हम चलाएँगे, हिन्दुओं की यात्राएँ और विसर्जन हम रोकेंगे, लेकिन लोकतंत्र की हत्या तो मोदी कर रहा है!

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने जब बजट सत्र की शुरूआत के लिए दोनों सदनों के सदस्यों को संबोधित करने की कोशिश की तो विपक्ष के कुछ लोगों ने ‘राज्यपाल वापस जाओ’ के नारे लगाए और उनके ऊपर काग़ज़ की गेंद बनाकर उछाली। इससे पहले राफ़ेल पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने संसद में पेपर के हवाई जहाज उड़ाए थे। 

लोकतंत्र की हत्या चिल्लाने वाले महागठबंधन के एक-एक नेता और पार्टी आजकल हर दिन नीचे गिरने के नए कीर्तिमान गढ़ते जा रहे हैं। आज की ख़बर यह है कि शाहनवाज़ हुसैन, शिवराज चौहान और योगी आदित्यनाथ को बंगाल में रैलियाँ करने की इजाज़त नहीं दी गई है। यह जानना भी ज़रूरी है कि जिस उत्तर प्रदेश में ‘राज्यपाल वापस जाओ’ के नारे ‘साइमन गो बैक’ की लाइन पर लग रहे हैं वहाँ लोकसभा की लगभग नब्बे प्रतिशत और विधानसभा की लगभग तीन चौथाई सीटों पर भारी बहुमत से लोगों ने भाजपा को चुना है।

दोनों चुनावों के बीच समय का ठीक-ठाक अंतर भी था। ऐसे में, सपा के नेताओं का हुड़दंग
यह दिखाता है कि क्यों मीडिया वाले इनसे जुड़ी घटनाओं को कवर करते वक्त ‘कार्यकर्ता’ की जगह ‘सपा के गुंडे’ का प्रयोग करते हैं। ये लोग लोकतंत्र, फ़ेडरल स्ट्रक्चर, संविधान और तमाम तरह की बातें करते हैं लेकिन सत्ता से दूर होने पर इनकी बिलबिलाहट इनसे हर वो कार्य पब्लिक में करवा रही है, जो किसी भी जन प्रतिनिधि को प्राइवेट स्पेस में भी नहीं करना चाहिए।

इसलिए, आजकल जब भी हम ‘लोकतंत्र की हत्या’ जैसे जुमले सुनते हैं तो लग जाता है कि या तो केजरीवाल को सपना आया होगा, या सीबीआई ने रेड मारी होगी, या ममता की नींद टूटी होगी या राहुल को याद आया होगा कि घोटाला हुआ नहीं, तो कुछ बोल देना चाहिए। ऐसे गंभीर शब्द अगर हर दूसरे दिन, टुच्ची बातों पर बोले जाते रहें तो इनकी गंभीरता खत्म हो जाएगी। 

यही हाल ‘आपातकाल आ गया’ वाले ‘भेड़िया आया’ कांड में हुआ है। किसी नेता पर जाँच बिठाने का मतलब आपातकाल है, किसी के राज्य के पुलिस अधिकारी को सीबीआई द्वारा बुलाना सुपर-आपातकाल है! हर वो घटना आपातकाल हो गई है जो किसी भी नेता को निजी स्तर पर भी प्रभावित कर रही हो। ये लोग कैसे भूल गए कि आपातकाल क्या था! 

चाणक्य का एक कथन था कि जब चोरों में खलबली मच जाए, तो समझो राजा अपना काम ठीक तरीके से कर रहा है। यही बात अब दिख रही है। सारे चोर एक साथ होकर मंच पर आ गए हैं, और एक व्यक्ति के पीछे लगातार झूठ बोलकर एक नैरेटिव तैयार करना चाह रहे हैं ताकि जनता उनके झाँसे में आ जाए। 

ऐसा नहीं है कि हर सरकार की हर नीति सही ही हो। हर सरकार में ख़ामियाँ होती हैं, लेकिन सरकार की हर बात में नकारात्मकता ढूँढकर, घोटाले मैनुफ़ैक्चर करना, आपातकाल की दुहाई देना और संसद जैसी पवित्र संस्थाओं में बेहूदगी के निम्न स्तर तक गिर जाना बताता है कि अब ये लोग कुछ भी कर सकते हैं! 

आप सोचिए कि विधानसभा या लोकसभा में ये लोग पेपर प्लेन और काग़ज़ की गेंद फेंक रहे हैं! ये लोग देश चलाने की बात करते हैं? यही लोग कभी ‘मर्यादा’ और ‘गरिमा’ की भी बातें करते नज़र आते हैं जो कि हास्यास्पद है। 

एक समय में सुप्रीम कोर्ट के डिसीजन को यह कहकर सर-आँखों पर बिठाना की लोकतंत्र में एक संस्था तो काम कर रही है, और फिर सीबीआई जैसी केन्द्रीय संस्था को अपने राज्यों में घुसने की अनुमति न देना, बताता है कि इनके लिए संस्थाओं का महत्व तभी तक है जब तक वो इनके मतलब के फ़ैसले सुनाए। वरना, सीबीआई को जाँच के लिए आन्ध्र प्रदेश या पश्चिम बंगाल में प्रदेश की सरकारों द्वारा घुसने की अनुमति न देना और क्या है? 

लोकतंत्र और फ़ेडरल स्ट्रक्चर की बात करनेवाली ममता बनर्जी आखिर भाजपा की रैलियाँ क्यों रोक रही है बंगाल में? अगर उनकी दलील साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने से संबंधित है तो क्या प्रदेश की पुलिस घास छीलने के लिए है? या प्रदेश की पुलिस का काम ममता बनर्जी के इशारों पर सीबीआई के ही अफ़सरों को, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करते हुए जाँच करने आए थे, गिरफ़्तार करना भर रह गया है?

यही वो ममता बनर्जी हैं जिन्होंने मुहर्रम और दुर्गा विसर्जन के एक ही दिन होने पर दुर्गा विसर्जन को रोकने का आदेश जारी किया था। तब, कोर्ट ने फटकार लगाई थी कि कानून व्यवस्था सरकार का ज़िम्मा है, और ममता लगातार एक सम्प्रदाय के तुष्टीकरण में लगी रहती हैं। इसी ममता ने ‘हथियारों’ के साथ होनेवाली धार्मिक यात्राओं (रामनवमी, दुर्गा विसर्जन आदि) पर यह कहा था कि उनके राज्य में ये नहीं होगा, जबकि वहीं सम्प्रदाय विशेष ऐसी यात्राएँ अपने त्योहारों पर खूब निकालता है। 

फिर जब ममता को लगने लगा कि प्रदेश के हिन्दू नाराज हो रहे हैं तो उन्होंने पिछले साल दुर्गा पूजा पंडालों को सरकारी सहयोग राशि देने की बात की। और, हो न हो, यही कारण है कि भाजपा की रैलियाँ रोकी जा रही हैं क्योंकि इनके यूनाइटेड अपोज़िशन रैली में तमाम दिग्गजों के होने के बावजूद भीड़ नहीं जुट पाई थी। 

कुमारस्वामी अपने क्लर्क होने की दुहाई देते हैं तो उनके पिता बेटे की इस हालत पर रोने लगते हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में किसानों की कर्ज़माफ़ी के नाम पर तेरह रुपए बाँटने की नौटंकी और जिन्होंने कर्ज़ लिया नहीं, उनके नाम पर पैसे जारी होना बताता है कि ये चाहे कितना भी जनेऊ पहन लें, इनकी नीयत चोरों वाली ही रहेगी। 

कॉन्ग्रेस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, और इसी कारण छोटे क्षेत्रीय पार्टियों को बिना माँगे समर्थन देने को हर जगह तैयार दिखती है। सपा-बसपा पुराने कांड भुलाकर एक हो रहे हैं। चंद्रबाबू नायडू सीबीआई से डरे दिख रहे हैं जैसे कि सीबीआई सबूत पैदा कर लेगी और उसी सुप्रीम कोर्ट में उनको न्याय नहीं मिलेगा जहाँ कई बार ‘लोकतंत्र की जीत’ के नारे वो लगा चुके हैं। 

कुल मिलाकर, इस स्तर का छिछलापन महागठबंधन की सोच और सत्ता को पाने की लालसा में वर्तमान सरकारों के परेशान करने के अलावा और कुछ भी नहीं दिखता। सोशल मीडिया के कारण ऐसी ख़बरें जनता तक भी पहुँचती हैं, और अब वो भी समझते हैं कि कौन आदमी क्या चाहता है। 

जब केजरीवाल, फ़ारूक़पुत्र उमर अब्दुल्ला, लालूपुत्र तेजस्वी, मुलायमपुत्र अखिलेश, मायावती, ममता, नायडू, देवगौड़ानंदन कुमारस्वामी एक साथ किसी की भी निंदा करें तो सामान्य बुद्धि यही कहती है कि वो कार्य पूर्णतः सही हो रहा होगा। 

ये अवसरवादियों का गिरोह है, जो पूर्णतः अव्यवस्थित है। स्वार्थसिद्धी के अलावा इनका और कोई विजन नहीं दिखता। लोग लालू के साथ मिलकर बिहार की स्थिति सुधारने की बात करते हैं। लोग चार साल पहले ममता को चिटफ़ंड घोटाले में चार साल पहले घेर रहे थे, आज उसी की जाँच होने पर उसे फासीवाद और लोकतंत्र पर हमला बता रहे हैं। इंटरनेट के दौर में चीज़ों को अपने टाइमलाइन से तो डिलीट कर सकते हैं, लेकिन पब्लिक के स्क्रीनशॉट से नहीं। यहाँ अब हर सच घूमफिर कर वापस आ ही जाता है।

जब हर वार खाली जा रहा है, तो बेहूदगी का दाँव बचा दिखता है। इसलिए मर्यादा की बात करने वाले ‘चौकीदार चोर है’ से लेकर स्वयं राफ़ेल पर चर्चा बुलाकर, पेपर प्लेन उड़ाते दिखते हैं। इसीलिए, तीन चौथाई बहुमत वाली सरकार के राज्यपाल का स्वागत ‘वापस’ जाने के नारों से होता है। इसीलिए, लालू में मसीहाई की तासीर नज़र आती है। इसीलिए, मायावती बुआ हो जाती है। 

रैली हम रोकेंगे, चॉपर हम उतरने नहीं देंगे, सीबीआई को गिरफ़्तार हम करेंगे, संसद में प्लेन हम फेंकेंगे, विधानसभा में काग़ज़ की गेंद हम चलाएँगे, हिन्दुओं की यात्राएँ और विसर्जन हम रोकेंगे, लेकिन लोकतंत्र की हत्या तो मोदी कर रहा है! 

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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