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अब पेठा भी हुआ मुगलों का! वामपंथियों के अनुसार हम भारतीय सिर्फ घास-फूस खाते थे

इतिहास के साथ छेड़छाड़ करके उसे आज की पीढ़ी के सामने रखना सोशल मीडिया पर एक प्रचलन की तरह है। संस्कृति, सभ्यता से लेकर खाने-पीने तक की चीजों में नैरेटिव घुसाने की कोशिश अक्सर यहाँ होती रहती है। हाल ही में कुछ ऐसा ही जलेबी को लेकर हुआ था। इससे पहले बिरयानी को लेकर भी इसी तरह का दावा किया गया था।

लेखक और स्तंभकार शुनाली खुल्लर श्रॉफ ने सोशल मीडिया पर पेठा को लेकर एक आर्टिकल शेयर किया है। इस आर्टिकल में उन्होंने दावा किया कि इस मिठाई का आविष्कार मुगलों ने किया था, इसलिए इसका श्रेय उन्हें ही जाना चाहिए। उन्होंने यह आर्टिकल हिंदुओं पर कटाक्ष करने के स्पष्ट इरादे से शेयर किया, जो कि इस्लामी कट्टरता के कारण मुगलों से नफरत करते हैं।

शुनाली खुल्लर ने कहा, “शाहजहाँ ने अपने रसोइयों को ताजमहल की तरह कुछ शुद्ध और श्वेत बनाने का आदेश दिया और इस तरह से पेठा का अवतरण हुआ। क्या मुगल इतिहास को न मानने वाले अब पेठा छोड़ देंगे?” हालाँकि इसमें एक समस्या थी। रिपोर्ट में उन्होंने अपने दावे के सबूत के रूप में जिसे उद्धृत किया है, वह ठीक इसके विपरीत था।

Shunali Khullar Shroff on petha

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रसिद्ध शिक्षाविद्, समीक्षक और इतिहासकार पुष्पेश पंत ने कहा है, “पेठा गरीब आदमी की मिठाई है और उसका कोई शाही संबंध नहीं है। इसमें दूध या मावा नहीं होता है। यह लौकी और बहुत सारी चीनी के साथ बनाया जाता है, जो कि शाही व्यंजन का संकेत नहीं है।” उन्होंने यह भी कहा कि पेठा झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड सहित आगरा से जोड़े जाने के बावजूद भारत के विभिन्न हिस्सों में मिलता है।

उन्होंने कहा, “भारत के कुछ हिस्सों के लोग फलों के ओला कहते हैं और ओला का मुरब्बा नामक कुछ तैयार करते हैं।” वे कहते हैं, “मुरब्बा का मतलब है एक संरक्षण। उन्होंने इसे चीनी सिरप में डुबोया और इसे महीनों तक संरक्षित रखा और इसलिए इसे ओला का मुरब्बा कहा।” 

आगे उन्होंने कहा, “आगरा वह स्थान था जहाँ लोग दूर-दूर की यात्रा के दौरान या रेलगाड़ियों को बदलते समय भोजन प्राप्त कर सकते थे। आज की तुलना में ट्रेनें धीमी और लंबी थीं। लोग पूड़ी और सूखी आलू की सब्जी खाते थे। पेठा बच्चों को खुश रखने और ऊर्जा के स्तर को उच्च रखने के लिए एक सर्वोत्कृष्ट नाश्ता बन गया। चूँकि इसमें खोआ नहीं होता, इसलिए इसे मथुरा के पेड़ा से ज्यादा पसंद किया जाता था। यह यात्रियों के लिए एक उपहार देने वाला विकल्प भी था।”

गौरतलब है कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ करके उसे आज की पीढ़ी के सामने रखना सोशल मीडिया पर एक प्रचलन की तरह है। संस्कृति, सभ्यता से लेकर खाने-पीने तक की चीजों में नैरेटिव घुसाने की कोशिश अक्सर यहाँ होती रहती है। ऐसे में तथ्य व तर्क ही इस नैरेटिव को धराशायी करने के कारगर तरीके हैं। हाल ही में कुछ ऐसा ही जलेबी को लेकर हुआ था। इससे पहले बिरयानी को लेकर भी इसी तरह का दावा किया गया था।

इसके अलावा कहा गया कि मुस्लिम भारत में चपाती बनाने की कला, कुल्फी, गुलकंद, गुलाब जामुन, जलेबी, पुलाव, फालुदा, बर्फी, बीरंज, मुरब्बो, हल्वो, शिरो और शक्कर पारा लेकर आए थे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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