"जो घबरा रहा है, जो समझौता करना चाहता है, जिसका दिल इस संघर्ष में नहीं है, उसके लिए रायबरेली कॉन्ग्रेस और यूपी की कॉन्ग्रेस में कोई जगह नहीं है। कॉन्ग्रेस में काम करना है, तो दिल से करना है और इसके लिए संघर्ष करना पड़ेगा।"
कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष के इस्तीफे के बाद सदन में नेता चुनने को लेकर भी अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है। ऐसे में, शायद पार्टी को अब फिर से सोनिया पर ही भरोसा है और इसीलिए कार्यकर्ता उनमें जबरदस्ती 'झाँसी की रानी' को देखने की कोशिश कर रहे हैं।
हैरान करने वाली बात ये है कि जो कॉन्ग्रेस सरकार कुछ दिन पहले तक सीएम योगी पर टिप्पणी करने पर गिरफ्तार हुए पत्रकार की गिरफ्तारी का विरोध कर रही थी, वो आज खुद पर उँगली उठने पर इतना क्यों बौखला गए हैं?
कॉन्ग्रेस की समस्या को और बढ़ाते हुए, पाटिल के साथ पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार ने भी कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने तो यहाँ तक दावा किया कि जल्द ही 8-10 और विधायक भी पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो सकते हैं।
"हमारे राष्ट्रपिता ने कहा था कि किसी भी योजना की रूपरेखा तैयार करने से पहले यह सोचना ज़रूरी है कि इससे सबसे ग़रीब व्यक्ति को क्या लाभ पहुँचेगा? मोदी ने इसे काफ़ी अच्छी तरह से वास्तविकता का रूप दिया है।"
"मैं महाराज सिंधिया से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ। गुना-शिवपुरी सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार की वजह ईवीएम में गड़बड़ी भी हो सकती है।" इमरती देवी के बाद कई अन्य नेताओं ने भी बग़ावती तेवर दिखाए।
कॉन्ग्रेस को अब राहुल गाँधी के आगे सोचना होगा, एक नेता और देश के नेतृत्त्व के लिए वे स्वयं को सर्वोत्तम प्रत्याशी साबित नहीं कर पाए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे स्वयं भी प्रधानमंत्री बनना नहीं चाहते हैं और उन्हें पार्टी जबरदस्ती नेता बना कर रखना चाहती है।