पवार ने सरकार बनाने के लिए शिवसेना के साथ कॉन्ग्रेस-एनसीपी की अटकलों पर विराम लगा दिया है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रपति शासन से बचने का एकमात्र विकल्प यह है कि भाजपा-शिवसेना मिलकर सरकार बनाएँ।
"शिवसेना के फ़ैसला लेते ही सब कुछ तय हो जाएगा क्योंकि ठाकरे को समर्थन देने को लेकर कॉन्ग्रेस में कोई अंदरूनी विवाद नहीं है। शिवसेना जब से भाजपा के साथ गई, तभी से उसने धर्म की राजनीति शुरू की है। भाजपा का साथ छोड़ते ही उसकी विचाधारा बदल जाएगी।"
इमरजेंसी के दौरान इंदिरा का समर्थन। चुनाव में कॉन्ग्रेस का समर्थन। मुस्लिम लीग का समर्थन। फिर कॉन्ग्रेस के विरोध के लिए पवार के साथ मंच साझा करना। 2 राष्ट्रपति चुनावों में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार का समर्थन। बालासाहब ठाकरे के रहते ही शिवसेना 'सौदेबाजी' में पारंगत हो गई थी।
BJP के दो महासचिव शिवसेना से आखिरी दौर की बातचीत कर चुके। कोई परिणाम नहीं निकला। भाजपा सीएम पद को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है। इसी बीच पर्यटन मंत्री जयकुमार रावल ने राज्य में दोबारा चुनाव...
अख़बार ने 1955-99 का भी दौर याद दिलाया, जब शिवसेना महाराष्ट्र के राजग गठबंधन में 'बड़ा भाई' की भूमिका में थी और बालासाहब ठाकरे ने मातोश्री से रिमोट कण्ट्रोल सरकार चलाई थी। अगर उस समय भाजपा सीएम पद माँगती तो क्या शिवसेना दे देती?
संजय राउत के मुताबिक 'महाराष्ट्र के हित में' शिवसेना के साथ कॉन्ग्रेस और एनसीपी आ सकते हैं। बकौल राउत शिवसेना को समर्थन का आँकड़ा 175 तक पहुँच सकता है। 288 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आँकड़ा 145 है।
मुंबई में विधान भवन के कैंपस में शपथ ग्रहण की तैयारियाँ चल रही हैं। शपथ ग्रहण के लिए स्टेज बनाया जा रहा है। शामियाना लगाया जा रहा है, कुर्सियाँ लगाई जा रही है। बाक़ी तैयारियाँ भी ज़ोरों पर है।
पवार ने एक बार फिर शिवसेना को झटका देते हुए कहा है कि वो विपक्ष में बैठेंगे। नासिक में एनसीपी के संस्थापक-अध्यक्ष ने कहा कि चूँकि उन्हें विपक्ष में बैठने का जनादेश प्राप्त हुआ है, इसीलिए उनकी पार्टी सरकार गठन की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेगी।
“सब जानते हैं कि विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने हमारे कई विधायक और नेताओं को अपने खेमे में शामिल कर लिया था। अगर वे सरकार बनाने में सक्षम होते हैं, तो वे फिर से और अधिक सख्ती के साथ ऐसा करेंगे। ऐसे में अगर हम शिवसेना के साथ सरकार बनाने में सक्षम....."
शिवसेना को समर्थन पर कॉन्ग्रेस का विभाजन साफ-साफ नजर आ रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण इसके पक्ष में बताए जाते हैं। वहीं, सुशील शिंदे और संजय निरुपम जैसे नेता इसका विरोध कर रहे हैं।