प्रियंका गाँधी कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार से आती हैं, उनकी जगह अगर कोई भाजपा वार्ड सदस्य के साले के फूफे की बहन का भतीजा होता तो न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट में भी इस पर एकाध लेख लिखा जा चुका होता कि कैसे भारत की 'राइट विंग हिंदुत्व पार्टी' ने मीडिया की स्वतंत्रता पर ग्रहण लगा दिया है और देश में पत्रकारों को खतरा है।
कुछ लोगों का कहना है कि लिबरल पत्रकार जिस डर की बात कर रहे थे, प्रियंका गाँधी के गुंडे बस यही समझा रहे हैं। वहीं कुछ यूज़र्स का मानना है कि पत्रकार को प्रियंका वाड्रा के से सवाल नहीं करना चाहिए था क्योंकि उन्होंने मना कर दिया था।
ऐसी घटना पर गुस्सा और नाराजगी जायज है लेकिन चुनावों में महिलाओं को उनके अधिकारों से रू-ब-रू करवाने वाली प्रियंका गाँधी ये भूल गईं कि किसी भी रेप पीड़िता का नाम उगाजर करना न केवल मना है बल्कि कानूनन यह एक जुर्म भी है।
प्रियंका को शुक्रवार को जब सोनभद्र जाने से रोका गया तो वह सड़क पर ही बैठ गईं और जोर देने लगीं कि उन्हें आगे जाने की इजाजत दी जाए। इसके बाद वहां मौजूद अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में ले लिया और उन्हें चुनार गेस्ट हाउस ले जाया गया।
राजस्थान के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट और मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया को अध्यक्ष बनाने की चर्चा शुरू होने के बाद शुरू हुआ प्रियंका का अभियान। इसके पीछे सोच यह है कि पार्टी अध्यक्ष के तौर पर गॉंधी ही गॉंधी की जगह ले।
पुलिस द्वारा की गई त्वरित कार्रवाईयों के संदर्भ में अपने अन्य ट्वीट में यूपी पुलिस ने लिखा कि प्रभावी कार्रवाई करने के फलस्वरूप अपराधों में 20-35% की कमी आई है। सभी सनसनीखेज अपराधों का यथासम्भव 48 घंटे में ख़ुलासा हुआ है।
"जो घबरा रहा है, जो समझौता करना चाहता है, जिसका दिल इस संघर्ष में नहीं है, उसके लिए रायबरेली कॉन्ग्रेस और यूपी की कॉन्ग्रेस में कोई जगह नहीं है। कॉन्ग्रेस में काम करना है, तो दिल से करना है और इसके लिए संघर्ष करना पड़ेगा।"
इस बैठक में पार्टी के नेताओं ने एक सुर में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपित रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी को 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की माँग की है।
"प्रियंका गाँधी ने अपना काम किया। लेकिन, पार्टी कार्यकर्ताओं, स्थानीय नेताओं, प्रत्याशियों और संगठन उनसे चुनावी लाभ नहीं ले सके। राहुल जी ने इस चुनाव के लिए बहुत कड़ी मेहनत की और प्रियंका जी ने भी उसी दमखम के साथ उनसे ताल से ताल मिलाईं।"
गाँधी परिवार ने इस बैठक में कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा राहुल गाँधी को जरूरी समर्थन ना देने पर नाराजगी जाहिर की थी। परिवार की नाराजगी स्पष्ट थी, क्योंकि सोनिया भी पूरी बैठक के दौरान नहीं बोलीं और यह जाहिर किया कि उन्हें भी अपने विश्वस्त साथियों से निराशा हासिल हुई।