बोर्ड ने मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन लेने से इनकार किया है। कहा है कि इस्लमिक व्यवस्था में एक बार जहाँ मस्जिद बन गई, वहाँ मस्जिद ही रहती है। साथ ही रामलला को 'ज्यूरिस्टिक पर्सन' मानने पर भी सवाल उठाए हैं।
तेलंगाना के गृह मंत्री का कहना है कि महिलाओं पर लगाए गए आरोपों से हैदराबाद ही नहीं दिल्ली के लोग भी दुखी हैं। इसे देखते हुए मामले की जॉंच के आदेश दिए गए हैं। उनकी माने तो जिस फैसले से उलेमा सहमत हैं, उसका महिलाएँ विरोध ही नहीं कर सकतीं।
"पीएम मोदी की वर्तमान सरकार को भारत में 'हिंदू राज (शासन) स्थापित करने का अधिकार' है और यदि भारतीय राजनेता असदुद्दीन ओवैसी और उनके जैसे अन्य को भारत पसंद नहीं है, तो उन्हें पाकिस्तान चले आना चाहिए।"
मौलाना अरशद मदनी ने बाबर को भी क्लीन चिट देते हुए कहा था कि बाबर ने जबरन मंदिर तोड़ कर मस्जिद नहीं बनाई। उन्होंने कहा कि मस्जिद तोड़ कर बनाए गए मंदिर में नमाज नहीं पढ़ी जा सकती है। उन्होंने इस बात को भी नकार दिया कि जिस मस्जिद में नमाज नहीं होती है, वो मस्जिद नहीं है।
राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बैंक ने उन खाता धारकों के लिए विशेष पुरस्कार की भी घोषणा की है जिन्होंने सवा लाख राम नाम जमा कर रखे हैं। इस बैंक की न तो कोई एटीएम है और न ही कोई चेक बुक।
रिजवी ने अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सर्वश्रेष्ठ निर्णय बताया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ओवैसी को छोड़कर सभी इस निर्णय से सभी संतुष्ट हैं। ऐसे में इन दोनों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।
"जैसे ईसाइयों के लिए वेटिकन सिटी और मुस्लिमों के लिए मक्का है, वैसे ही हिन्दुओं के लिए अयोध्या में राम मंदिर को एक मुख्य तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।"
"एक महिला ज़िले हुमा के नेतृत्व में लगभग 110 मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों ने ग़ैर-क़ानूनी रूप से इकट्ठा होकर ईदगाह मैदान में एकत्र होकर नमाज अता की। लगभग 20 मिनट की नमाज पूरी होने के बाद, हुमा ने माइक सँभाला और देश-विरोधी नारे लगाए।"
वसीम रिजवी ने कहा कि ओवैसी जैसे नेता समाज में नफरत फैलाने का काम करते हैं। ओवैसी जैसे नेताओं के ऐसे बयानों का मतलब सिर्फ नफरत को बढ़ावा देना और देश के मुस्लिमों को इस देश में अलग-थलग करने की साजिश है।
जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष और अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्षकार अरशद मदनी ने अयोध्या मसले पर फैसला आने से पहले कहा था कि सर्वोच्च अदालत जो भी फैसला देगी, वह उन्हें स्वीकार होगा। यह अलग बात है कि फैसला आने के पाँच दिनों के बाद ही उन्हें...