DMCH में कार्यरत डॉक्टर प्रशांत वत्स 5 दिन कश्मीर में गुजार कर हाल ही में लौटे हैं। ऑपइंडिया ने उनसे बातचीत की, वहाँ का हाल जाना। डॉक्टर वत्स ने मीडिया के तमाम प्रोपेगेंडे को ध्वस्त करते हुए कुछ ऐसी बातें बताई, जिन्हें आप लोगों तक पहुँचाना ज़रूरी है।
सिब्बल ने दावा किया था कि यह सब ट्वीट करने के पहले ही बरखा दत्त को चैनल से बर्खास्त किया जा चुका है। इसके पीछे उन्होंने कारण अनुशासनहीनता बताया था। इसके अलावा उन्होंने दत्त को एक भी पैसा देने से साफ़ इनकार कर दिया था।
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में मुस्लिम आलिम द्वारा काले जादू का उपयोग करके किए गए इलाज में 10 साल के बच्चे की मौत हो गई। मगर मीडिया गिरोह ने इस अपराध को हिन्दू तांत्रिक द्वारा किए गए अपराध के रूप में फैलाया।
बरखा ने आरोप लगाया था कि कपिल सिब्बल की पत्नी प्रोमिला सिब्बल तिरंगा टीवी में कार्यरत महिला कर्मचारियों को “कुतिया” या “बिच” कह कर बुलाती थीं। सिब्बल दम्पति के ख़िलाफ़ बरखा ने सिविल सूट दायर कर रखा है।
The Hindu ने भारतीय सेना के बारे में बड़े ही स्पष्ट और सीधे शब्दों में लिखा है, मगर प्रदर्शनकारियों के बारे में लिखते हुए इसी अखबार के शब्द खत्म हो गए! या फिर यूँ कहें कि ये भी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले गिरोह का हिस्सा बनकर अराजत तत्वों का तुष्टिकरण करना चाहते हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने विज्ञापन में लिखा कि कश्मीर में अब तक सुरक्षाबलों के हाथों 60000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि दस लाख से ज्यादा लोग घायल हो चुके हैं। पत्रकारिता की खातिर न्यूयॉर्क टाइम्स को ये बताना चाहिए कि आखिर जो आँकड़े छापे हैं, वो कहाँ से आए?
Editors Guild पर तंज़ कसते हुए रिपब्लिक टीवी की दक्षिण भारत ब्यूरो प्रमुख पूजा प्रसन्ना ने कहा कि आंध्र और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों का नाम न पता होना अक्षम्य है।
क्योंकि चुनाव आने में अभी थोड़ा समय है और बलात्कारी जब अपने ही जात-बिरादरी के हों, तो उनके बारे में लिखने पर क्या पता नरक-वरक जाना पड़ जाए, या कोई पूछ ले कि क्या इसी दिन के लिए अवार्ड दिया था? क्या इसी दिन के लिए तुम्हें भीड़ दे कर खड़ा किया था, तुम्हें नेता बनाया था?
"ये एक पुरानी तस्वीर है। और एक कवि की कुछ पंक्तियों का यहाँ इस्तेमाल प्रोपगेंडा फैलाने के लिहाज से हुआ है। तस्वीर में दिख रहे अधिकारी उन नाबालिग बच्चों की कॉउंसलिंग कर रहे हैं, जो साल 2010 में पत्थरबाजी में शामिल थे।"
समाचारों की दुनिया के रुमानी वाचक रवीश कुमार का कहना है कि भारतीयों का आत्मविश्वास कमज़ोर है। उनका दिल छोटा है। वे दुनिया का केवल खाते हैं, खिलाते नहीं। आँकड़े कहते हैं कि रवीश झूठे हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति का बयान बताता है कि उनके शब्द प्रोपगेंडा की चाशनी में सने हैं।