उत्तर 24 परगना में हृदयपुर के पास रेलवे ट्रैक से पुलिस ने चार देसी बम बरामद किए। कूच बिहार में प्रदर्शनकारियों ने बस पर पथराव किया। राज्य में सीएए के विरोध के नाम पर भी जमकर हिंसा हुई थी।
प्रथमतया सर्दी का मौसम सड़क पर धरना प्रदर्शन के लिए अनुकूल नहीं होता है। सर्दियों का समय समाजवाद के शीतनिद्रा में जाने के लिए उपयुक्त होता है। समाजवादी सौंदर्यशास्त्र के साथ भी सर्दियाँ ठीक नहीं जाती। एक अच्छा वामपंथी कम नहाया हुआ, दाढ़ी बढ़ाया हुआ, महँगा कुर्ता पहन कर ग़रीबों के लिए व्यथित भाव लिए दिखता है।
"कोयंबटूर आतंकी घटनाओं के आरोपी के लिए जेल को स्पा में बदला। अब्दुल नासिर की मालिश का खर्च वहन सरकार कर रही थी, उसकी पत्नी के खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट होने के बावजूद वह नासिर से बेरोकटोक मिल सकती थी। यह तब हो रहा था जब कॉन्ग्रेस के 33 विधायक और DMK के 97 MLA थे।"
कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार की कथित नाकामियों को उजगार करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलन की योजना बनाई थी। इसकी समाप्ति रामलीला मैदान की भारत बचाओ रैली से होनी थी।
जब सुशासन की ही पोल खुल चुकी हो तो उसके बड़बोले मंत्री के दावों पर गौर करना बेमानी है। लेकिन, यह सियासत है। और वो भी बिहार की, जिसके समीकरण दिल्ली से ही तय होने हैं। लिहाजा हर ट्वीट के पीछे का गणित समझना जरूरी हो जाता है।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन कार्यकर्ताओं को देखकर लग रहा था जैसे उन्हें शरद यादव को सुनने की कोई जिज्ञासा ही नहीं। इसलिए उन्होंने समय गंवाने से अच्छा सभागार से बाहर निकलना समझा।
नोटिस के बाद 50% से अधिक पूर्व सांसदों ने सरकारी आवास खाली कर दिया था। बावजूद इसके 82 ऐसे पूर्व सांसद हैं , जो सरकारी आवास खाली करने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। नियमानुसार, दोबारा चुन कर न आए सांसदों को लोकसभा भंग होने के एक महीने के भीतर सरकारी आवास खाली करना होता है।
दाऊद इब्राहिम ने भी मुंबई बम ब्लास्ट के बाद मदद के लिए जेठमलानी को फोन किया था। जेठमलानी ने 2015 में कहा था कि दाऊद को भारत लाया जा सकता था, लेकिन महाराष्ट्र के तत्कालीन सीएम शरद पवार की वजह से ऐसा नहीं हो पाया।
जब 1977 में जॉर्ज फर्नांडीस ने जेल से लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन भरा तो सुषमा ही दिल्ली से मुजफ्फरपुर पहुॅंचीं और हथकड़ियों में जकड़ी जॉर्ज की तस्वीर दिखा प्रचार किया। उन दिनों 'जेल का फाटक टूटेगा, जॉर्ज हमारा छूटेगा' का उनका दिया नारा सबकी ज़ुबान पर था।
सुषमा स्वराज ने ट्विटर डिप्लोमेसी का दरवाजा खोला। ट्विटर पर सक्रिय रहते हुए लोगों की मदद करना इतना चर्चित हुआ कि वाशिंगटन पोस्ट ने उन्हें 'सुपरमॉम ऑफ द स्टेट' कहा। उनके देहांत के साथ ही भारतीय राजनीति का एक शालीन अध्याय समाप्त हो गया है।