हे संजय! सच-सच बतलाना: तुम इतनी बेशर्मी, इतना बड़बोलापन लाते कहाँ से हो?

दिल्ली में जदयू कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षिण शिविर होने जा रहा है। सीएम नीतीश कुमार और उनके बेहद खास मंत्री इस आयोजन की शोभा होंगे। बिहार में सुशासन की पोल खुलने के बाद दिल्ली के संकट पर दुबला होना बनता है।

लीडर वो होता है जो रास्ता जानता है, रास्ते पर चलता है और रास्ता दिखाता है।
-जॉन सी मैक्सवेल, अमेरिकी लेखक

मैक्सवेल ने जब यह बात कही होगी तो रास्ते से उनका आशय उस प्रक्रिया से रहा होगा, जिसके जरिए एक नेता अपने लोगों को नई ऊॅंचाइयों तक ले जाता है। सीधी जुबान में कहें तो जनता का जीवन आसान बनाना ही नेता का काम है। लेकिन, ऐसे नेताओं को क्या कहेंगे जो ‘ब’ के लिए जिम्मेदार हों, पर उसे गटर में छोड़ ‘द’ के फेर में दुबले हो रहे हों।

कॉन्ग्रेस के एक प्रवक्ता हैं संजय झा। उनके हमनाम संजय कुमार झा जदयू के विधान पार्षद और बिहार सरकार में मंत्री हैं। दोनों बड़बोले दावों के उस्ताद हैं। इतने बड़े कि उनके बयान से शब्द भी शर्मा जाए। पर इन्हें शर्म आती नहीं।

आज बात बिहार के मंत्री संजय कुमार झा की। बुधवार यानी 23 अक्टूबर को दिल्ली में जदयू कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण शिविर होना है। मुख्य अतिथि होंगे बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार, जिनका सुशासन अभी कुछ दिनों पहले बारिश के पानी में उतरा रहा था। राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा बतौर विशिष्ट अतिथि इस कार्यक्रम की शोभा होंगे।

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सोमवार को इस कार्यक्रम को लेकर जदयू और संजय कुमार झा की ओर से कई ट्वीट किए गए। इन्हें पढ़कर आपको लगेगा कि बिहार में तो साक्षात राम राज्य है और सारी समस्याओं ने दिल्ली में डेरा डाल रखा है। संजय
कुमार झा का एक ट्वीट है, “दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री के होने के बावजूद दिल्ली भीषण जल संकट के दौर से गुजर रहा है। वहीं, बिहार जैसा राज्य गॉंवों में बसे लोगों के लिए योजनाएँ बना कर उसे जमीनी स्तर पर क्रियान्वित कर रहा है। प्रशिक्षण शिविर में इन सभी मुद्दों पर हम चर्चा करेंगे।”

दिमाग पर जोर डालने की भी जरूरत नहीं है। बिहार नाम लेते ही आपके दिमाग में मुजफ्फरपुर शेल्टर कांड, गर्मी आते ही पानी के लिए मचा हाहाकार, चमकी बुखार, बाढ़ और बारिश से डूबी राजधानी पटना अपने आप कौंध जाती है। बावजूद इसके बिहार के एक मंत्री का दिल्ली के जल संकट के लिए चिंतित होना बताता है कि वह कितने मजबूत कलेजे का होगा!

संजय कुमार झा वही नेता हैं जिन्होंने इसी साल 14 जुलाई को एक साक्षात्कार में दावा किया था कि बिहार सरकार इस बार बाढ़ के हालात से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। दो ही दिन बाद जब बिहार डूब गया और सरकार के सारे दावे बह गए तो उन्होंने कहा, ‘बांध से जब पानी बहेगा तो कोई क्या करेगा।’ वैसे, दावे करना इनकी पुरानी फितरत है। लोकसभा चुनाव से पहले मार्च में इन्होंने एक निजी विमान कंपनी के स्थानीय अधिकारियों के हवाले से बताया था कि 1 अगस्त से दरंभगा से हवाई सेवा शुरू हो जाएगी। टिकट की बुकिंग 1 मई से शुरू होगी। इस ऐलान के साथ दरभंगा में उन्होंने अपने बड़े-बड़े पोस्टर भी लगवाए थे।

मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना उड़ान के तहत दरभंगा से विमानों का परिचालन शुरू होना है। इस दिशा में वहॉं तेजी से काम हो रहा है। लेकिन, तारीख को लेकर आज तक मोदी सरकार ने भी कोई ऐलान नहीं किया है। पर संजय कुमार झा ने जिस वक्त यह घोषणा की थी, उस वक्त वे न मंत्री थे और न ही विधान पार्षद। उनकी पहचान पूर्व विधान पार्षद और जदयू के राष्ट्रीय महासचिव तक सीमित थी। असल में, उस वक्त ऐसी चर्चा थी कि झा को जदयू दरभंगा से लोकसभा चुनाव लड़वा सकती है। लेकिन, न यह सीट जदयू के खाते में गई और न झा लोकसभा चुनाव लड़े। उससे पहले 2014 के आम चुनावों में वे दरभंगा में जदयू के टिकट पर बुरी तरह हारे थे।

बिहार की राजनीति में संजय कुमार झा का उदय भी दिलचस्प है। जब बिहार में सुशासन आया तो वे बीजेपी के विधान पार्षद हो दिल्ली से पटना लैंड हुए थे। कहते हैं कि उनकी पैरवी दिवंगत हो चुके भाजपा के एक बड़े नेता ने की थी। फिर वे नीतीश के करीब हो गए। विधान पार्षद का कार्यकाल पूरा होने के बाद जुलाई 2012 में बीजेपी छोड़ जदयू का दामन थाम लिया। इस साल लोकसभा चुनाव के बाद जदयू उन्हें विधान परिषद में लेकर आई और वफादारी का ईनाम देते हुए नीतीश ने उन्हें अपने कैबिनेट में शामिल कर लिया।

जिस तरीके से सुशासन की पोल खुली है उसमें बतौर मंत्री झा के प्रदर्शन को उनका हनीमून पीरियड मानकर भूलना ही बेहतर होगा। लेकिन, उनके दावों के पीछे का गणित नजरंदाज नहीं किया जा सकता। वैसे भी बिहार में पर्दे के पीछे भाजपा और जदयू बीच खींचतान चल रही है। सो लगे हाथ प्रशिक्षण शिविर के बहाने अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा को भी लपेटने की कोशिश हो रही है। जरा जदयू के इस ट्वीट पर गौर करिए, “दिल्ली में अभी तक जिनकी भी सरकार बनी है, सबने दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का वादा किया, लेकिन एक बार सत्ता में आने के बाद वे यह वादा भूल गए..! हमारी नीति और निष्ठा राज्य को पूरा अधिकार दिलाने में है..!!”

मैक्सवेल ने भले यह न बताया हो कि नेतृत्व गुमराह हो, जिम्मेदारियों को भूल जाए तो क्या करें। पर लोकतंत्र हर पॉंच साल में भूल सुधार का मौका देता है। दिल्ली के बाद ही सही, अगले साल बिहार में भी चुनाव होने हैं। सो, संजय झा के हर दावे को याद रखिएगा। शायद ऐसे ही नेताओं के लिए मैथिली में कहा गया है, “जे भोज नै करे, से दाइल बड्ड सुरके।”

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