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‘सरकार बदली तो इनकी डेंटिंग-पेंटिंग होगी’: हिंसा के बाद बरेली की शांत फिजाओं में सुलग रही चिंगारी, जानें ऑपइंडिया के कैमरे पर क्या बोले इस्लामी कट्टरपंथी?

लोगों ने कहा कि प्रदेश मे योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती तो शायद बरेली जल रहा होता। सरकार बदलने की वजह से मौलाना तौकीर रजा जैसे लोग अब कोशिश तो करते हैं लेकिन पुलिस उनका सही से इलाज कर देती है।

26 सितंबर की दोपहर 2 बजे से बरेली शहर ‘आई लव मुहम्मद’ के नारों से गूंज उठा, दोपहर की नमाज पढ़कर निकले मुसलमानों की भीड़ को पुलिस बार बार घर जाने के लिए कहती रही लेकिन भीड़ के मंसूबे अलग थे। कहीं भड़काऊ नारे थे, तो कहीं जहन में नफरत।

कुछ के हाथों में आइ लव मुहम्मद की तख्तियाँ थीं तो अधिकतर के हाथों मे पत्थर, लाठी-डंडे और पेट्रोल बम थे। इस भीड़ को मौलाना तौकीर रजा ने इसलामिया ग्राउंड मे एकत्रित होने के लिए कहा था। प्रशासन का सीधा आदेश था कि, बिना इजाज़त के कोई भी भीड़ इकट्ठा नहीं हो सकती है।

भीड़ फिर भी मानने को तैयार नहीं थी। जब भीड़ को पुलिस ने रोकने की कोशिश की 12 से 22 साल के GenZ मुस्लिम लड़कों ने पथराव शुरू कर दिया। एक FIR में इस बात का भी जिक्र है कि पुलिसवालों के सामने मुस्लिम लड़कों ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे भी लगाए थे। फिर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बरेली पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था।

इस घटना को करीब तीन दिन हो गए हैं। मुस्लिमों के मन मे क्या है, उनके मुहल्लों में किस तरह की चर्चा चल रही है और हिन्दू इस घटना को कैसे देखते हैं यह समझने के लिए मैंने ग्राउंड पर जाने का निश्चय किया।

रविवार के दिन दोपहर 1 बजे मैं बरेली के सबसे व्यस्ततम चौराहे पर पहुँचा। यहीं पर बरेली कचहरी भी मौजूद है। चौराहे पर सन्नटा था, नाम मात्र के लोग मौजूद थे। बात चीत के क्रम में टाइल्स लगाने का काम करने वाले एक अधेड़ व्यक्ति से मेरी बात हुई।

बरेली में धर्मांतरण का गिरोह

शुरुआत मे झिझकने के बाद जब वो खुला तो उसने बताया कि उसके गाँव फैजनगर मे मुसलमान बड़ी संख्या मे हैं। यहाँ एक मदरसा है और वहाँ गुप्त रूप से धर्मांतरण का गिरोह चलता था। अभी एक महीने पहले ही बरेली पुलिस के द्वारा उस मदरसे पर छापा मारकर उसका भंडाफोड़ किया था।

पता चला था कि चौदह राज्यों से चंदा मांगकर यहाँ धर्मांतरण का काम किया जाता था। कई हिन्दू लड़के-लड़कियों और नाबालिगों का धर्मांतरण करवाया जा चुका था।इसके आगे वो बरेली मे 26 सितंबर की हुई घटना को लेकर कहा कि जहां इनकी संख्या बढ़ती है ये इसी तरह के कांड करते हैं।

मौलाना तौकीर रजा को लेकर कहा कि ये लंबे समय से इसी तरह की हरकतें करता था और इसका मन बढ़ गया था। लेकिन योगी सरकार ने अब इसको पकड़कर सही कर दिया है। अब बरेली शांत हो जाए।

इसके बाद मैं सबसे पहले उस इलाके की तरफ बढ़ा जहां 26 सितंबर को घटना हुई थी। इंटरनेट बंद होने की वजह से गूगल मैप काम नहीं कर रहा था। लोगों से रास्ता पूछने और भटकने की वजह से लगभग आधा शहर देख लिया।

इस्लामिया ग्राउंड से आँखों-देखी

बरेली पुराना शहर है। शहर के लगभग इलाकों के ज़्यादातर घरों पर इस्लामिक झंडे दिख रहे थे। हिंदुओं के इक्का दुक्का घरों पर ही कोई ऐसा निशान मौजूद था जिससे पता चले कि ये हिन्दू का घर है।

सबसे पहली जगह मिलती है। इस्लामिया ग्राउंड। इस्लामिया ग्राउंड के सामने बिहारीपुर पुलिस चौकी है। वहाँ बड़ी संख्या मे पुलिस वाले तैनात थे। ये वही जगह थी जहां आने की कोशिश उस दिन मुसलमान कर रहे थे।

गेट पर बड़ा सा ताला जड़ा हुआ था, आसपास गंदगी बिखरी थी और पुलिस वाले दोपहर की कड़ी धूप में पहरा दे रहे थे। बाहर से मैंने देखा तो एक बड़ा सा मैदान नजर आया और एक पुरानी और जर्जर इमारत जो अंग्रेजों के वक़्त से पहले के होने का सबूत देती है। उसकी झड़ रही लखौरी ईंटें अब अपनी उम्र ढल जाने का इशारा कर रही थीं।

इस मैदान के तीनों तरफ बड़ी संख्या मे मुसलमानों की घनी आबादी बसी हुई थी। चूंकि मैं केवल एक मोबाइल लेकर इस पूरे इलाके की रिकॉर्डिंग कर रहा था तो किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन तीन-चार 12 से 15 साल के मुस्लिम लड़के मेरे आसपास आकर खड़े हो गए। उन्होने कुछ कहा नहीं लेकिन जबतक मैं वहाँ रहा वो मेरी मोबाइल की स्क्रीन मे झाँकने की कोशिश करते रहे।

सामने मौजूद चौकी मे पुलिसवाले लंबी ड्यूटी के बाद चेहरों पर थकान लेकर भी मुस्तैदी के साथ खड़े नजर आ रहे थे। इसके बाद मैं बढ़ा उन मस्जिदों की तरफ जहां से नमाज पढ़कर उस दिन भीड़ निकली थी। रास्ते मे एक बैनर टंगा मिला जिसपर बड़े बड़े अक्षरों मे आई लव मुहम्मद लिखा हुआ था।

पहले मैंने नौमहिल्ला मस्जिद तक जाना चुना। यहाँ चीजें सामान्य दिख रही थी। आसपास बड़ी संख्या मे मुसलिम आबादी थी। कुछ एक मुसलमान अपनी खिडकियों से झांककर सड़क और पुलिस की तरफ देख रहे थे।

कुछ एक दीवारों पर ताजे पोस्टर निकाले जाने के निशान थे। मैंने गली मे बैठे एक बुजुर्ग से पूछा तो अपनी टोपी संभालते हुए कहा कि उस दिन के लाठीचार्ज के बाद लोगों ने अपनी दीवारों से खुद ही ‘आई लव मुहम्मद’ के पोस्टर हटा लिए हैं।

हालाँकि, उस गली मे घुसने वाले रास्ते पर एक एक बड़ा सा पोस्टर लगा हुआ था, जो हवा की वजह से ऐसा मुड़ गया था कि लव और मुहम्मद नहीं दिखाई दे रहा था, बचा हुआ था सिर्फ आई!

मुझे याद था कि दंगे भड़काने वाला मौलाना तौकीर रजा, बरेलवी मसलक के सबसे बड़े नामों मे एक आला हजरत खानदान से आता है। वही आला हजरत जिनके नाम पर बरेली की ये एक बड़ी मस्जिद कायम है।

यहाँ से जब मैं आला हजरत मस्जिद की तरफ जाने के लिए पैदल निकाल पड़ा। रास्ते मे शटर गिराए बैठे लोग गले मे आईकार्ड देखकर ये अंदाजा लगा पा रहे थे कि मैं पत्रकार हूँ और शायद बाहर से आया हूँ। मस्जिद के करीब पहुँचते हुए एक ठेले वाले से मैंने पूछा कि उस दिन यहीं पर बवाल हुआ था?

उसने घूरकर मेरी तरफ देखा और फिर नजरें फेर ली। मैंने दुबारा ज़ोर देकर पूछा तो उसने कहा कि मैं शहर मे नया आया हूँ। वैसे, आजतक देश के जिस भी हिस्से मे किसी भी इलाके में मैंने रिपोर्टिंग की है तो अधिकतर मुसलमान जवाब न देने के लिए यही बात कहते नजर आए हैं।

ख़ैर, मैं अगले पाँच मिनट मे मस्जिद के गेट पर था। जहाँ एक 18 से 20 साल का लड़का बैठा हुआ था। आसपास कुछ पुलिसवाले कुर्सी लगाकर बैठे हुए थे। मस्जिद के दो एंटरेंस के रास्ते थे। सड़क की तरफ खुलने वाले स्टील के दरवाजे पर तीन पोस्टर लगे हुए थे। सभी मे दो बातें लिखी थीं। पहली ‘आई लव मुहम्मद’ और दूसरी ‘मैं, मेरे मा बाप, मेरी आल, सब आप पर कुर्बान या रसूल अल्लाह’।

मस्जिद आला हजरत पर लगा पोस्टर

घूमते हुये जब मैं जब मस्जिद के दूसरे दरवाजे पर पहुँचा तो शाम के 4 बजकर 40 मिनट का वक़्त हो चला था। कुछ बुजुर्ग नमाज़ी आना शुरू हो गए थे। मस्जिद से बुलाने का ऐलान हो चुका था। इस दरवाजे पर भी ‘आई लव मुहम्मद’ के पोस्टर लगे हुए थे। अंतर बस ये था कि ये प्रिंटेड नहीं थे। इन्हें हाथों से बनाया गया था।

बनावट को देखकर यह भी स्पष्ट था कि, इसे किसी कम उम्र के बच्चे ने बनाया है। टूटी फूटी हैंडराइटिंग मे इसी पोस्टर पर किसी बच्चे ने लिखा था कि अगर नबी सालल्हू, अलेह, वसल्लम से मुहब्बत का इजहार करना जुर्म है तो यह जुर्म हम हर रोज करेंगे।

मस्जिद के दरवाजे पर लगा पोस्टर

आला हजरत मस्जिद की ओर इशारा करने के लिए लगे बोर्ड के ठीक पीछे समाजवादी पार्टी का एक बड़ा पोस्टर लगाया गया था। जो शायद उत्तरप्रदेश मे सियासत और मजहब के गठबंधन को साफ तौर पर दिखाने के लिए काफी है।

मस्जिद आला हजरत लिखा बोर्ड

ये वही मस्जिद है जहाँ से निकली भीड़ पैगंबर से मुहब्बत के नाम पर 26 सितंबर को बरेली शहर को जला देने पर आमादा थी। बवाल वाले दिन इस मस्जिद मे केवल नौजवान लड़के ही नमाज पढ़ने आए थे जबकि आज जो मैंने देखा उसमें एक भी व्यक्ति 40 साल से कम उम्र का नहीं था।

यहाँ मैंने नामजियों से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई भी बात करने को राजी नहीं था। हर चेहरा पर्दे में रहने की कोशिश कर रहा था। यहाँ से चलकर मैं एक गली के अंदर गया। गली पतली थी लेकिन अंदर अधिकतर मुसलमानों से भरी एक बड़ी आबादी थी।

यहाँ भी अधिकतर मुसलमान कुछ भी बताने से बच रहे थे। एक महिला ने बताया कि नामजियों की ही भीड़ थी जिसने ये पूरा बवाल बनाया था। तभी, एक अधेड़ व्यक्ति ने आवाज देकर मुझे बुलाया। नदीम नाम के इस शख्स ने, पहले तो केवल नामजियों को बचाने की कोशिश की लेकिन लंबी बातचीत के दौरान उसकी जबान खुलती गयी।

उसने कहा, “आज तो मुख्यमंत्री जी के भी बयान थे कि हमने डेंटिंग पेंटिंग कर दी, तो इसका सीख क्या है? ये डेंटिंग पेंटिंग करेंगे हमारी?” आगे कहा, “अभी इनकी सरकार है तो डेंटिंग पेंटिंग हो रही है, सरकार बदलेगी तो इनकी डेंटिंग-पेंटिंग होगी।”

उसने बेहद उत्तेजित होते हुये कहा कि ‘आई लव मुहम्मद तो कयामत तलक रहेगा’। इसकी पूरी बात आप Opindia की विडियो रिपोर्ट मे भी देख सकते हैं।

इस व्यक्ति से मैंने करीब 16 मिनट तक बात की, पूरी बातचीत के दौरान एक बार भी यह व्यक्ति अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हुआ बल्कि धमकी भरे लहजे मे आगे और बुरे भविष्य की ही बात करता रहा। इसके अलावा बाक़ी के मुसलमानों ने मानो चुप रहने की कसम खाई हुई हो। एक भी शख्स कैमरे पर बात करने को तैयार नहीं था।

करीब चार घंटे तक इस इलाके मे घूमने के बाद मैं हिंदुओं के मुहल्लों मे गया। एक व्यक्ति जो अपने दरवाजे पर बैठा था उसने कहा कि ‘हिन्दू त्योहार जब भी आते हैं, तभी ये लोग ऐसी हरकतें करते हैं’ इसके साथ ही उसने 2010 के बरेली के दंगों को भी याद दिलवाया जब होली खेलने के समय कर्फ़्यू लग गया था।

हिंदुओं का कहना यह भी है कि मुसलमान सुनियोजित ढंग से हिन्दू त्योहारों के समय ही ऐसी हरकतें करते हैं। जबकि मुसलमानों के त्योहारों के समय हिन्दू शांत रहते हैं। कई हिंदुओं ने सीधे तौर पर बरेली मे होने वाली हर इस्लामी उन्माद के लिए मौलाना तौकीर रजा और उसको राजनीतिक संरक्षण देने वाली कुछ राजनीतिक पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया।

हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि आज प्रदेश मे योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती तो शायद बरेली जल रहा होता। सरकार बदलने की वजह से मौलाना तौकीर रजा जैसे लोग अब कोशिश तो करते हैं लेकिन पुलिस उनका सही से इलाज कर देती है।

दोनों पक्षों से बात करने के बाद मैं बरेली से दिल्ली की तरफ निकला। बरेली के प्रसिद्ध झुमका चौक के पहले अवेधनाथ द्वार था, जिसके ऊपर भगवान शंकर की योग मुद्रा मे मूर्ति स्थापित की गयी है।

अवेधनाथ द्वार

कुछ देर वहाँ मैं रुका और वहाँ मौजूद दुकानों के बोर्ड पढ़कर मुझे आभास हुआ कि वहाँ एक ही पक्ष की 70 फीसदी से ज्यादा दुकाने थी। यानि शहर का एंट्री पॉइंट एक ही पक्ष के कब्जे मे था। और शहर के अंदर की पूरी बसावट मैं देख ही चुका था।

आगस्टे काम्टे की पंक्ति ‘डेमोग्राफी इज डेस्टिनी’ मेरे दिमाग मे घूमने लगी थी। हालाँकि प्रदेश के मुख्यमंत्री के मंचों से दिए जाने वाले बयान और ऐसी घटनाओं मे प्रशासनिक तत्परता अभी भी समाज के दूसरे पक्ष को चैन की सांस लेने का मौका दे रहे हैं।

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अनुराग
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