केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार (15 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि भारत 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेजबानी करेगा। यह खेल भारत में 2010 के विवादों से घिरे गेम्स के 20 साल बाद फिर से आयोजित होंगे।
कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स की कार्यकारी समिति ने 2030 के शताब्दी संस्करण (100वें साल) के लिए अहमदाबाद को मेजबान शहर के रूप में सुझाया है। नाइजीरिया की राजधानी अबुजा भी एक प्रस्तावित शहर था, लेकिन आखिरकार अहमदाबाद को अंतिम रूप से चुना गया।
A day of immense joy and pride for India.
— Amit Shah (@AmitShah) October 15, 2025
Heartiest congratulations to every citizen of India on Commonwealth Association's approval of India's bid to host the Commonwealth Games 2030 in Ahmedabad. It is a grand endorsement of PM Shri @narendramodi Ji's relentless efforts to…
कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन की जनरल असेंबली में 26 नवंबर 2025 को ग्लासगो में औपचारिक मंजूरी मिलने की उम्मीद है। यह कदम भारत के 2036 के ओलंपिक्स की मेजबानी की महत्वाकांक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसे ‘अत्यंत खुशी और गर्व का दिन’ बताया है।
अमित शाह ने इस फैसले की सराहना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खेल अवसंरचना और प्रतिभा विकास पर ध्यान देने की वजह से भारत अब एक महान खेल गंतव्य बन गया है। भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पी टी उषा ने कहा कि यह गेम्स भारत की आयोजन क्षमता को दिखाएँगे और युवाओं को प्रेरित करेंगे। उन्होंने इसे ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
भारत ने आखिरी बार 2010 में दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित किए थे, लेकिन वह आयोजन खराब योजना, निर्माण में देरी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की वजह से प्रभावित हुआ था। उस विवाद की याद 2030 की तैयारी के दौरान हमेशा बनी रहेगी। अब सरकार के लिए जिम्मेदारी बड़ी हो गई है कि वह यह साबित करे कि उसने पहले से सीखे हैं और समय पर पारदर्शी, सफल और बजट में रहकर गेम्स आयोजित कर सकता है।
2010 की परछाईं- कैसे हुआ राष्ट्रमंडल खेल घोटाला
जब भारत ने 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेज़बानी जीतकर नई दिल्ली को चुना, तो इसे देश के लिए गर्व की बात माना गया। लेकिन यह आयोजन जल्द ही कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया।
यह कहानी नवंबर 2003 में शुरू हुई, जब भारत ने 2010 के CWG की मेजबानी का अधिकार जीता। कनाडा मुख्य प्रतिस्पर्धी था। भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने इस आयोजन की कुल लागत केवल 1,200 करोड़ रुपए बताई थी, जिसे बाद में बहुत छोटा और असलियत से दूर माना गया। बाद में पता चला कि बजट काफी कम आंका गया था और अंतिम खर्च कई गुना बढ़ गया। इसके अलावा आरोप लगा कि भारत ने हर कॉमनवेल्थ देश की ओलंपिक समिति को 1,00,000 डॉलर का घुस देकर समर्थन खरीदा था। पूर्व खेल मंत्री मणि शंकर अय्यर ने इसे रिश्वत देने जैसा बताया था।
दिसंबर 2004 में कॉन्ग्रेस के सांसद सुरेश कलमाड़ी को प्रधानमंत्री कार्यालय की सिफारिश पर CWG आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि उस समय के खेल मंत्री सुनील दत्त ने इसका विरोध किया था। कलमाड़ी के अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने गेम्स की तैयारियों पर पूरा नियंत्रण ले लिया। बाद में लेखा परीक्षकों ने इसे एक बड़ी गलती बताया।
स्टेडियम और शहर की संरचना का निर्माण 2006 से 2009 के बीच धीमी गति से हुआ। बजट कई बार बढ़ाया गया। अप्रैल 2007 से सितंबर 2010 तक आधिकारिक लागत का अनुमान सात बार बदला गया। शुरुआत में जो 1,100 करोड़ रुपए का अनुमान था, वह बढ़कर 3,566 करोड़ और फिर 11,687 करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जो कि शुरूआती अनुमान से दस गुना ज्यादा था। गेम्स के समय कुल खर्च लगभग 18,532 करोड़ रुपए हो गया, जो लगभग 15 गुना अधिक था।
2009 के अंत में, कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के अध्यक्ष माइकल फेनेल ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि तैयारियाँ समय से पीछे हैं और ‘समय आपके दुश्मन है।’ इस वजह से CGF ने एक विशेष निगरानी पैनल बनाया जो हर महीने प्रगति की समीक्षा करता रहा।
भारत के खेल मंत्री एम एस गिल ने सरकार की ओर से अधिक फंड देने का भरोसा दिया ताकि आयोजन सफल हो सके। इससे साफ था कि खर्च पर नियंत्रण खो चुका था।
पूर्व खेल मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर ने जुलाई 2010 में आयोजन पर कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि 35,000 करोड़ रुपए एक सर्कस पर खर्च हो रहे हैं, जबकि देश के गरीब खिलाड़ियों की जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अगर गेम्स सफल रहे तो वह नाखुश होंगे क्योंकि इससे इस तरह के खर्च बढ़ेंगे। उन्होंने भारत पर अन्य देशों को रिश्वत देने के आरोप भी लगाए। कलमाड़ी ने उन्हें लापरवाह और देश विरोधी कहा।
सितंबर 2010 में खेल शुरू होने से ठीक पहले अफरातफरी बढ़ गई। 21 सितंबर 2010 को मुख्य स्थल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के बाहर 95 मीटर लंबा नया फुट ओवरब्रिज गिर गया, जिसमें लगभग 27 मजदूर घायल हो गए। इस घटना ने कमजोर निर्माण गुणवत्ता को उजागर किया। इस तरह 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए एक बड़ी सीख और चेतावनी साबित हुए।

खराब निर्माण ही अकेली समस्या नहीं थी। जब अंतरराष्ट्रीय टीमें दिल्ली पहुँचीं, तो उन्होंने एथलीट्स विलेज की हालत पर गंभीर शिकायतें कीं। उन्होंने कहा कि वहाँ की सफाई बेहद खराब थी, काम अधूरा था और वह जगह ‘इंसानों के रहने लायक नहीं’ थी।
जलभराव वाले फ्लैटों और कमरों में घूमते आवारा कुत्तों की तस्वीरें दुनियाभर की मीडिया में छा गईं। कई देशों के दल प्रमुखों ने खुले तौर पर सवाल उठाया कि क्या इतने खराब हालात में कॉमनवेल्थ गेम्स कराना भी ठीक है, क्योंकि खेल शुरू होने में बस कुछ ही दिन बचे थे और जरूरी सुविधाएँ अब भी अधूरी थीं। कॉमनवेल्थ गेम्स स्कॉटलैंड ने साफ कहा कि स्थिति असुरक्षित है और अगर हालात में सुधार नहीं हुआ तो CGF को खेल रद्द करने पर विचार करना चाहिए।

एक असाधारण कदम के तहत आयोजनकर्ताओं की मदद के लिए भारतीय सेना को बुलाया गया। सेना के इंजीनियरों ने गिरे हुए फुटओवर ब्रिज की जगह सिर्फ चार दिनों में एक अस्थाई बैली ब्रिज बना दिया। उन्होंने दिन-रात काम किया ताकि सुरक्षा और व्यवस्थाओं से जुड़ी बड़ी समस्या को टाला जा सके।
इसके बावजूद, भारतीय अधिकारियों ने दावा किया कि सारी समस्याएँ समय पर ठीक कर ली जाएँगी और ज़्यादातर दिक्कतों को सिर्फ बाहरी दिखावटी बताया। आख़िरी समय में की गई आपातकालीन सफाई और मरम्मत से किसी तरह स्टेडियम और अन्य स्थानों को खेलों से पहले तैयार कर लिया गया।

दिल्ली में 2010 में हुए 19वें कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) का आयोजन 3 से 14 अक्टूबर के बीच तय समय पर हुआ। 71 देशों के 6,000 से ज़्यादा एथलीट्स ने भाग लिया। खेल शुरू होने के बाद भारत ने एक हद तक सफल आयोजन किया और मेडल तालिका में दूसरा स्थान हासिल किया।
लेकिन यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिकी। आयोजन से पहले हुए घोटालों और अव्यवस्थाओं की परछाई इन खेलों पर बनी रही। जैसे ही समापन समारोह हुआ, भ्रष्टाचार और वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप चर्चा में आ गए।
तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 25 अक्टूबर 2010 को पूर्व CAG वी के शुंगलू की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई, जिसका काम था पूरे आयोजन से जुड़ी एजेंसियों (जैसे आयोजन समिति, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के मंत्रालयों) की भूमिका की जाँच करना और कार्रवाई की सिफारिश करना। साथ ही, CVC (सेंट्रल विजिलेंस कमिशन) और CBI ने भी घोटालों की जाँच शुरू कर दी।
CBI ने पहली चार्जशीट दाखिल की, जिसमें सुरेश कलमाड़ी को मुख्य आरोपित ने बताया। आरोप था कि उन्होंने एक स्विस कंपनी को Timing, Scoring, Results (TSR) सिस्टम का ठेका 141 करोड़ रुपए में दिलवाया, जो बाजार कीमत से लगभग 95 करोड़ ज्यादा था। 24 अप्रैल 2011 को कलमाड़ी को गिरफ्तार किया गया।
उनके करीबी सहयोगी जैसे आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट और महानिदेशक वी के वर्मा भी गिरफ्तार हुए। कलमाड़ी 9 महीने तक तिहाड़ जेल में रहे और जनवरी 2012 में जमानत मिली। CAG (भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) ने 5 अगस्त 2011 को संसद में एक ऑडिट रिपोर्ट पेश की। इसमें बताया गया कि खेल परियोजनाओं में भारी खर्च बढ़ोतरी, गलत योजनाएँ और नियमों का उल्लंघन हुआ।
शुंगलू समिति ने 2012 से 2015 के बीच 6 रिपोर्टें दीं। रिपोर्टों में दिल्ली के उपराज्यपाल तेजिंदर खन्ना और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को Games Village और शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर में लागत बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। इसके अलावा, प्रसारण सौदों में गड़बड़ी पाई गई और समिति ने प्रसार भारती के तत्कालीन CEO बी एस लाली के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की। 2012 तक CBI ने 19 FIR दर्ज कीं। इन मामलों में खेल स्थलों का निर्माण, स्ट्रीट लाइटिंग और अन्य कान्ट्रैक्ट शामिल थे।
एक विशेष कोर्ट ने 2014 में एक स्विमिंग पूल कान्ट्रैक्ट मामले में सबूत के अभाव में केस बंद कर दिया। दिल्ली की एक कोर्ट ने 2015 में स्ट्रीट लाइट घोटाले में 6 लोगों को दोषी ठहराया। इनमें 4 दिल्ली नगर निगम के इंजीनियर और एक निजी कंपनी के 2 निदेशक शामिल थे। उन्हें 4 से 6 साल की सजा सुनाई गई, लेकिन सभी ने हाई कोर्ट में अपील की और सजा रोक दी गई।
CBI ने कई मामलों को 2016-17 के बीच चुपचाप बंद कर दिया। एक हाई प्रोफाइल केस में लंदन की इवेंट नॉलेज सर्विसेज को 70 करोड़ रुपए के कान्ट्रैक्ट देने में गड़बड़ी के आरोप थे, लेकिन सबूत नहीं मिलने पर केस बंद कर दिया गया।
दो ठेकेदारों को 2017 में स्टेडियम निर्माण में गड़बड़ी के लिए सजा हुई। लेकिन इसमें शामिल सरकारी अधिकारी बरी कर दिए गए। इसी साल स्कोरिंग सिस्टम वाले केस में 11 आरोपितों (जैसे कलमाड़ी और भनोट) को कोर्ट ने बरी कर दिया क्योंकि प्रमाण नहीं मिल सके।
2020 से 2025 के बीच, ज्यादातर केस या तो बंद हो गए या कोर्ट में लटक गए। 19 में से 11 केस CBI ने बिना आरोप तय किए बंद कर दिए। सिर्फ 2 मामलों में सजा हुई, जिनमें अपील चल रही है और किसी को अब तक जेल नहीं हुई।
दिल्ली की एक कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अंतिम रिपोर्ट स्वीकार की, जिसमें कहा गया कि कलमाड़ी, भनोट या किसी अन्य के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का कोई मामला नहीं बनता। जज ने कहा कि CBI पहले ही केस बंद कर चुकी है, इसलिए कोई ‘अपराध से अर्जित धन’ साबित नहीं हो सका।
15 साल बाद भी, इस बड़े घोटाले में कोई शीर्ष अधिकारी दोषी नहीं ठहराया गया। इससे भारत की जाँच प्रक्रिया और न्याय प्रणाली की कमजोरियाँ उजागर हुई हैं। 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स को भले ही भारत ने सफलतापूर्वक आयोजित किया हो, लेकिन इससे जुड़ी भ्रष्टाचार की कहानी और लंबी कोर्ट लड़ाई भारत की छवि पर अब भी एक धब्बा बनी हुई है।
प्रमुख खिलाड़ी और भ्रष्टाचार का व्यापक स्तर
कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के घोटाले में केंद्र में उस समय के कॉन्ग्रेस सांसद सुरेश कलमाड़ी थे, क्योंकि उनके पास गेम्स से जुड़ी ठेकेबाज़ी और खर्चों पर बड़ा नियंत्रण था। कलमाड़ी एक अनुभवी खेल प्रशासक माने जाते थे। उनके साथ आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट और महानिदेशक वी के वर्मा जैसे नजदीकी सहयोगी भी थे। इनके अलावा टी एस दरबारी, एम जयरचंद्रन और दिल्ली की कई सरकारी एजेंसियों के अधिकारी भी आयोजन की तैयारियों में शामिल थे।
आरोपों के अनुसार इस घोटाले में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी हुई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस घोटाले में लगभग 70,000 करोड़ रुपए की गड़बड़ी की आशंका है, जो कि पूरी गेम्स की अनुमानित लागत के बराबर है। इससे 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स इतिहास के सबसे महंगे गेम्स बन गए।
तुलना करें तो 2006 में ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में हुए पिछले CWG पर सिर्फ 7,000 करोड़ रुपए से भी कम खर्च हुआ था। CAG की रिपोर्ट में बताया गया कि 2003 से 2010 के बीच लागत 15 गुना तक बढ़ गई और इस पर किसी भी स्तर पर सही तरीके से नियंत्रण नहीं रखा गया।
खर्चों में बढ़ोतरी लगभग हर क्षेत्र में देखी गई। कनॉट प्लेस के नवीनीकरण का खर्च 76 करोड़ से बढ़कर 671 करोड़ रुपए हो गया। स्ट्रीट लाइटिंग परियोजना का बजट 13 करोड़ से बढ़कर 37 करोड़ पहुँच गया। CAG के अनुसार, सौंदर्यीकरण के नाम पर 101 करोड़ रुपए फिजूल में खर्च कर दिए गए। कई ठेके जरूरत से ज्यादा दरों पर, मनचाही कंपनियों को दिए गए। CVC ने भी खेलों से पहले ही चेतावनी दी थी कि लागतें बहुत अधिक बताई जा रही हैं।
मीडिया में कई चौंकाने वाले उदाहरण सामने आए, जैसे टॉयलेट पेपर रोल्स के लिए 4,000 रुपए प्रति पीस और छातों के लिए 6,000 रुपए प्रति छाता का बिल लगाया गया। CAG ने कहा कि जानबूझकर काम में देरी की गई ताकि बाद में ‘तत्काल जरूरत’ दिखाकर नियमों को दरकिनार कर दिया जाए और सीधे महँगे सौदे किए जा सकें।
सबसे चर्चित मामलों में से एक था 141 करोड़ रुपए का TSR (Timing, Scoring, Results) सिस्टम, जिसका ठेका स्विस कंपनी Swiss Timing को दिया गया था, जबकि इसकी असली लागत केवल 50 करोड़ रुपए थी। यानी इस अनुबंध में करीब 90 करोड़ रुपए की अनियमितता पाई गई।
गेम्स विलेज का निर्माण Emaar MGF ने किया था, जिसमें कई गड़बड़ियाँ सामने आईं। जब यह प्रोजेक्ट फंसा तो दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को 766 करोड़ रुपए लगाकर इसे बचाना पड़ा। बाद में इसकी कई यूनिट्स को व्यावसायिक रूप से बेच दिया गया, जिस पर भी सवाल उठे।
लंदन में हुई क्वीन की बैटन रिले यात्रा के दौरान भी घोटाले के आरोप लगे। इसमें बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के कुछ गुमनाम ब्रिटिश कंपनियों को 3.8 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया, जो कथित तौर पर सुरेश कलमाड़ी के एक करीबी की व्यक्तिगत सिफारिश पर किया गया था। CAG ने इन भुगतानों को बेहद संदिग्ध करार दिया।
कुल मिलाकर सिर्फ 12 दिन के इस खेल आयोजन के लिए 18,000 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए गए। इसके बाद कॉमनवेल्थ गेम्स भारत में सरकारी भ्रष्टाचार, अफसरशाही की लापरवाही और अनियंत्रित खर्च का प्रतीक बन गए।
बुनियादी ढांचे में देरी, बढ़ी हुई लागत और राष्ट्रीय शर्मिंदगी
अक्टूबर 2010 से पहले के हफ्तों में, दिल्ली की तैयारियों की कमी ने पूरी दुनिया में सुर्खियाँ बटोरीं। खेलों का आयोजन द्वितीय पृष्ठ पर चला गया और हर कोई भारत की अव्यवस्था की चर्चा करने लगा। लगभग हर कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) प्रोजेक्ट में देरी थी। कई खेल स्थल या तो अधूरे थे या उद्घाटन समारोह से ठीक पहले हड़बड़ी में पूरे किए जा रहे थे।
मुख्य खेलों और समारोहों का स्थल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम समय पर बस किसी तरह तैयार हो पाया। वहीं, शिवाजी स्टेडियम, जिसे हॉकी प्रशिक्षण स्थल बनना था, 2012 में यानी खेलों के दो साल बाद पूरा हुआ। सितंबर 2010 तक भी आयोजक बुनियादी ढाँचे को पूरा करने के लिए दौड़-भाग कर रहे थे, जिससे भारत की मेज़बानी पर सवाल उठने लगे।
21 सितंबर को सबसे शर्मनाक और गंभीर घटना हुई, जब नेहरू स्टेडियम के बाहर बना नया फुटओवर ब्रिज गिर गया। यह पुल 10.5 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जा रहा था। हादसे के समय मजदूरों द्वारा कंक्रीट डाला जा रहा था। इस दुर्घटना में 27 मजदूर घायल हुए, जिनमें से पाँच की हालत गंभीर थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
पुल के मलबे की तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियाँ बन गईं। दिल्ली के लोक निर्माण मंत्री (PWD) ने माना कि पुल में संरचनात्मक कमजोरी थी। स्थिति इतनी खराब हो गई कि सेना को तुरंत बुलाना पड़ा। एक हजार सैनिकों और इंजीनियरों ने केवल चार दिन में एक अस्थाई ‘बेली ब्रिज’ तैयार किया, जिसे 29 सितंबर को प्रशासन को सौंपा गया। सेना की ये कार्रवाई एक नागरिक संकट में बचाव अभियान के रूप में देखी गई।
खिलाड़ियों के ठहरने के लिए यमुना नदी के किनारे बनाया गया ‘एथलीट्स विलेज’ 6,500 खिलाड़ियों और अधिकारियों के लिए बनाया गया था। लेकिन स्कॉटलैंड और न्यूजीलैंड की शुरुआती टीमों ने इसे मानव निवास के लायक नहीं बताया। उन्होंने शिकायत की कि वहाँ पानी भरा हुआ था, गंदगी फैली थी, जंगली कुत्ते घूम रहे थे, नल और पाइपिंग खराब थी और बिजली की तारें खुली पड़ी थीं। कई टीमों ने तो प्रतियोगिता में हिस्सा न लेने या आने में देरी करने की धमकी दी।
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने स्थिति संभालने की कोशिश की। सफाई दल तैनात किए गए और खुद दीक्षित ने निगरानी की। अधिकारियों ने स्थिति के लिए मजदूरों को दोषी ठहराया और दावा किया कि कुछ ही दिनों में सब कुछ सही कर दिया जाएगा। लेकिन यह सफाई अभियान तब चला जब अंतरराष्ट्रीय आलोचना हो चुकी थी। इंग्लैंड और कनाडा की टीमें पहले होटलों में ठहरीं और बाद में, अंतिम समय पर सुधारों के बाद, विलेज में आईं।
CAG की रिपोर्ट के अनुसार, खराब योजना और आखिरी समय की हड़बड़ी के कारण खर्च कई गुना बढ़ गया, जिसे रोका जा सकता था। दुनिया भर की मीडिया ने भारत की इस अव्यवस्था को उजागर किया और भारत की तुलना चीन के 2008 के शानदार बीजिंग ओलंपिक से की, जिससे भारत की छवि को गहरा नुकसान पहुँचा।
कैग रिपोर्ट और खुलासे जिसने भारत को चौंका दिया
जहाँ एक ओर मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्ष की आलोचना पहले से ही चर्चा में थीं, वहीं असली झटका तब लगा जब 5 अगस्त 2011 को संसद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट पेश की गई। यह रिपोर्ट 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़ी बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार की पहली आधिकारिक पुष्टि थी।
इसमें CWG 2010 की परफॉर्मेंस ऑडिट बेहद कठोर थी और उसने आयोजन समिति के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों की कई एजेंसियों को भी कटघरे में खड़ा किया। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पूरे आयोजन में नियमों की अनदेखी, चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुँचाना और प्रशासनिक विफलताएँ आम बात थीं। इस रिपोर्ट के बाद पूरे देश में हलचल मच गई और कई जिम्मेदार लोगों पर सवाल उठने लगे।
सीएजी रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट ने दिखाया कि कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के दौरान लागत में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई, लेकिन इस पर किसी स्तर पर नियंत्रण नहीं रखा गया। 2003 में गेम्स की अनुमानित लागत सिर्फ 1,200 करोड़ रुपए थी, लेकिन 2010 तक यह बढ़कर 18,532 करोड़ रुपए हो गई।
CAG ने कहा कि सरकार ने हर स्तर पर लागत को न तो दोबारा जाँचा और न ही रोकने की कोशिश की। इससे आयोजन समिति (OC) को बिना किसी जवाबदेही के असीमित सरकारी फंडिंग मिलती रही। रिपोर्ट में इसे वित्तीय अनुशासन का पूरी तरह टूट जाना कहा गया।
CAG ने यह भी बताया कि फैसलों में जानबूझकर देरी की गई, ताकि बाद में ‘तत्काल जरूरत’ दिखाकर टेंडरिंग प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सके। इससे कई ठेके सीधे दिए गए या मनचाही कंपनियों को लाभ पहुँचाया गया। ये सभी कार्य नियमित प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं से हटकर किए गए, जो पूरी व्यवस्था की गंभीर खामी को दिखाते हैं।
रिपोर्ट में बताया गया कि सुरेश कलमाड़ी को 2004 में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की सिफारिश पर CWG आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त ने इसका विरोध किया था। PMO ने बाद में किसी गलती से इनकार किया, लेकिन CAG ने इसे एक बड़ी चूक बताया। इस फैसले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी सवालों के घेरे में ला दिया, हालांकि उन्हें किसी आपराधिक आरोप में नहीं घसीटा गया।
CAG ने यह भी पाया कि हॉकी टर्फ, ट्रैक सतह और स्ट्रीट लाइटिंग जैसी चीजों के ठेके विदेशी कंपनियों को बिना निष्पक्ष तुलना के दिए गए। उदाहरण के लिए, विदेश से मंगाई गई स्ट्रीट लाइटें भारत में उपलब्ध लाइटों की तुलना में दो गुना महँगी थीं और दस्तावेजों से पता चला कि इसमें दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की भूमिका रही थी।
गेम्स विलेज के लिए Emaar MGF को दिया गया ठेका और लंदन में क्वीन बैटन रिले से जुड़े खर्चों में भी नियमों की गंभीर अनदेखी हुई। ब्रिटेन की कंपनी AM Films और SIS Live को बिना पारदर्शिता के करोड़ों रुपए के कांट्रैक्ट दिए गए। खासतौर पर Rs 246 करोड़ का ब्रॉडकास्टिंग कॉन्ट्रैक्ट, जिस पर शुंगलू समिति ने आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की।
CAG ने बताया कि आयोजन की निगरानी के लिए कई ओवरलैपिंग कमेटियाँ बनाई गईं, जिससे जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई। एक भी एजेंसी अकेले जवाबदेह नहीं थी, जिससे चेतावनियों पर समय से कार्रवाई नहीं हो सकी और कामकाज में समन्वय की कमी बढ़ती गई।
रिपोर्ट में ठेकों की दरें बढ़ाने, फर्जी टेंडरों और दस्तावेजों में छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोपों का भी उल्लेख किया गया। उदाहरण के तौर पर, किसी सामान की टेंडर दर Rs 800 से बढ़ाकर Rs 1,800 कर दी गई। कुछ मामलों में टेंडर नियमों को तोड़ने के लिए ठेके टुकड़ों में बांटे गए। कई बार बदले गए दस्तावेजों की फॉरेंसिक जाँच तक नहीं करवाई गई।
हालाँकि CAG की भाषा संयमित थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट की गंभीरता को छुपाया नहीं जा सका। इस रिपोर्ट ने जनता के उस शक की पुष्टि कर दी कि गेम्स में भारी बर्बादी, पक्षपात और कुप्रशासन हुआ है। रिपोर्ट के सामने आते ही राजनीतिक भूचाल आ गया और विपक्ष ने जवाबदेही की माँग शुरू कर दी।
इसी दौरान शुंगलू समिति ने भी अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल तक को विलंब और लागत बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया।
हालाँकि CAG रिपोर्ट ने घोटाला जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन यह साफ संकेत दिया कि पूरा सिस्टम विफल हो गया था। इस रिपोर्ट की गूंज सिर्फ CWG तक सीमित नहीं रही, यह भारत की संस्थागत कमजोरियों का प्रतीक बन गई।
कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कॉन्ग्रेस के अंदर के लोग भी निजी रूप से इस नुकसान को मानने लगे थे। संसद में कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का बचाव कमजोर साबित हुआ और यह पूरा मामला राजनीतिक बदलाव और सुधार की जरूरत का प्रतीक बन गया।
राजनीतिक परिणाम – यूपीए सरकार को जनता के आक्रोश का सामना कैसे करना पड़ा
कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) घोटाला कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक परेशानी बन गया था। उस समय कॉन्ग्रेस पहले से ही 2G स्पेक्ट्रम घोटाले जैसे अन्य भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर आलोचना झेल रही थी। 2010 से 2011 के बीच जनता का गुस्सा तेजी से बढ़ा मीडिया के खुलासे, CAG की रिपोर्ट और शुंगलू समिति की लगातार रिपोर्टों ने हालात और बिगाड़ दिए।
इसी दौर में उस समय देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सरकार के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया। बीजेपी नेताओं ने कॉन्ग्रेस पर ‘राष्ट्रीय सम्मान को नुकसान पहुँचाने’ का आरोप लगाया और तत्कालीन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के इस्तीफे की माँग की। पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अगर दीक्षित इस्तीफा नहीं देतीं, तो उन्हें हटाया जाना चाहिए।
सरकार पर हमले इतने तीखे थे कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने एक-दूसरे पर आरोप लगाना शुरू कर दिया। कलमाड़ी और दीक्षित के बीच खुली तकरार हुई, जिससे कॉन्ग्रेस पार्टी को बीच में आकर दोनों को चुप रहने के लिए कहना पड़ा।
वहीं डॉ मनमोहन सिंह के दफ्तर से भी सवाल पूछे गए कि कलमाड़ी की नियुक्ति कैसे हुई, जब तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त ने इस पर आपत्ति जताई थी। कॉन्ग्रेस ने बचाव में कहा कि CAG ने ‘भ्रष्टाचार’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है और कानून की प्रक्रिया चलने दी जानी चाहिए, लेकिन जनता का गुस्सा कम नहीं हुआ।
समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने अप्रैल 2011 में लोकपाल बिल की माँग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की। यह आंदोलन कई घोटालों खासकर CWG और 2G से नाराज जनता के समर्थन से तेजी से बढ़ा। इसी महीने सुरेश कलमाड़ी को गिरफ्तार किया गया और कॉन्ग्रेस ने उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया। उस समय तक उन पर आधिकारिक आरोप नहीं थे, लेकिन वो अपने गृहनगर पुणे में राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गए।
प्रदर्शन और राजनीति में उठापटक का असर 2014 के आम चुनावों तक देखने को मिला। 2013 में बीजेपी ने चुनावी अभियान शुरू किया और UPA के कथित घोटाले जिनमें CWG प्रमुख था प्रचार का मुख्य मुद्दा बने।
नरेंद्र मोदी, जो अब राष्ट्रीय नेता बन चुके थे, उन्होंने अपनी रैलियों में CWG घोटाले को लेकर कॉन्ग्रेस पर हमला किया। एक भाषण में उन्होंने कहा कि “एक देश खेल के ज़रिये दुनिया में सम्मान कमाता है और दूसरा अपमान” यह तुलना भारत के CWG और दक्षिण कोरिया के ओलंपिक आयोजन को लेकर की गई थी।
इसी साल दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें कॉन्ग्रेस को आम आदमी पार्टी (AAP) से भारी हार का सामना करना पड़ा। AAP ने कॉन्ग्रेस के समर्थन से कुछ महीनों के लिए सरकार बनाई, लेकिन शीला दीक्षित का चुनाव हार जाना कॉन्ग्रेस के लिए बड़ा झटका था और इसमें CWG घोटाले की अहम भूमिका रही।
कुछ सालों बाद जब मुकदमे कमजोर पड़े और आरोपितों को राहत मिलनी शुरू हुई, तो कॉन्ग्रेस ने कहना शुरू कर दिया कि यह सब राजनीतिक साजिश थी। 2025 में, पुणे में कॉन्ग्रेस नेताओं ने कलमाड़ी की बरी होने और ईडी केस के बंद होने को सबूत बताते हुए कहा कि CWG घोटाला राजनीतिक रूप से प्रेरित आरोप था।
लेकिन इसके बावजूद, CAG और शुंगलू समिति की रिपोर्टें आज भी यह दिखाती हैं कि उस समय व्यवस्था पूरी तरह विफल थी। जनता की नजर में, CWG घोटाला आज भी कुप्रशासन और भ्रष्टाचार का प्रतीक बना हुआ है।
परिणाम – परीक्षण, गिरफ्तारियाँ और दोषसिद्धि
कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) घोटाले से जुड़े कानूनी नतीजे लंबे, जटिल और निराशाजनक रहे। हालाँकि शुरुआत में जाँच तेजी से हुई और मुकदमे जल्द शुरू हो गए थे, लेकिन जवाबदेही तय करने में व्यवस्था पूरी तरह फेल रही। 2010 से 2012 के बीच CBI ने घोटाले के विभिन्न पहलुओं पर कुल 19 FIR दर्ज की थीं। सुरेश कलमाड़ी, वी के वर्मा और अन्य पर षड्यंत्र, धोखाधड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। कलमाड़ी और वर्मा को अप्रैल 2011 से जनवरी 2012 तक जेल में रहना पड़ा, इसके बाद उन्हें जमानत मिली।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी इनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में जाँच शुरू की। कई मामलों में रोज़ाना सुनवाई भी हुई, लेकिन भारी दस्तावेज़ी बोझ, गवाहों की अनुपलब्धता और कानूनी प्रक्रिया की देरी के कारण मामले धीरे-धीरे ठंडे पड़ गए। एक मामले में तो छेड़छाड़ किए गए टेंडर दस्तावेजों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा ही नहीं गया, जिससे कोर्ट ने नाराज़गी जताई।
अब तक सिर्फ दो मामलों में छह लोगों को दोषी ठहराया गया, लेकिन वे मामले दिल्ली हाई कोर्ट में अपील के तहत विचाराधीन हैं और दोषियों की सजा पर रोक लगी हुई है। ज्यादातर मुख्य मामले या तो बंद हो गए या फिर अभियुक्त बरी हो गए। 2016 में, CBI ने स्विमिंग पूल कॉम्प्लेक्स मामले को सबूतों की कमी के कारण बंद कर दिया। 2017 में, सबसे अहम TSR कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े मुकदमे में कलमाड़ी, भानोट और सभी आरोपित को बरी कर दिया गया, क्योंकि कोर्ट ने कहा कि कोई आपराधिक साजिश साबित नहीं हुई। इसी मामले से जुड़े ED के केस को भी 2025 में बंद कर दिया गया, क्योंकि कोर्ट ने माना कि मनी लॉन्ड्रिंग का कोई ठोस सबूत नहीं है।
अब तक किसी भी बड़े राजनीतिक व्यक्ति (राजनेता) को दोषी नहीं ठहराया गया, जिससे यह साफ हो गया कि जाँच में खामियाँ, सबूतों की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने सिस्टम की विफलता को उजागर किया है।
आज जहाँ कॉन्ग्रेस खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश कर रही है, वहीं बीजेपी और अन्य विपक्षी दल अब भी CAG और CVC की रिपोर्टों को भ्रष्टाचार के सबूत के रूप में सामने रखते हैं। भले ही कानूनी सज़ा न हुई हो, लेकिन जनता की नजर में CWG घोटाला अब भी भारतीय सिस्टम की विफलता और लापरवाही का प्रतीक बना हुआ है।
सबक सीखा या भुला दिया? बड़े आयोजनों में जवाबदेही
कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) जो 2010 के घोटाले के बाद कई बदलाव हुए। सुधारों की बात तो हुई, लेकिन उन्हें सही तरीके से लागू नहीं किया गया। कैग (CAG) की रिपोर्ट में सबसे बड़ी गलती यह बताई गई कि किसी एक केंद्रीय समन्वय संस्था की कमी के कारण पूरे आयोजन में अव्यवस्था फैली।
इसके बाद मोदी सरकार के कार्यकाल में हुए 2016 के साउथ एशियन गेम्स और 2017 के फीफा अंडर-17 वर्ल्ड कप जैसे आयोजनों को बेहतर निगरानी और सख्त नियंत्रण के साथ संभाला गया।
उस समय 2011 में खेल मंत्री अजय माकन ने नेशनल स्पोर्ट्स बिल पेश किया था। इसमें भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) जैसे खेल संगठनों को ऑडिट और सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में लाने का प्रस्ताव था, जिससे पारदर्शिता आ सके। लेकिन इस बिल को विरोध के कारण पास नहीं किया जा सका।
CAG की 2009 में जो शुरुआती रिपोर्ट पहले नजरअंदाज कर दी गई थी, वह बाद में एक चेतावनी बन गई। इसके बाद योजना आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने दिशा-निर्देश जारी किए कि भविष्य में समय पर ऑडिट हो और शुरुआती चेतावनियों को नजरअंदाज न किया जाए।
सुरेश कलमाड़ी को हटाया गया और IOC (इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी) ने उन्हें बैन कर दिया। IOA को भी 2012 में दूसरी गड़बड़ियों के चलते निलंबित कर दिया गया था। फिर 2014 में IOA ने एक नया संविधान अपनाया जिसमें निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया। अब पीटी उषा जैसी पूर्व खिलाड़ी इस संगठन की अध्यक्ष हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत अब ओलंपिक जैसे आयोजनों की तैयारी में ज्यादा गंभीर है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बदलाव हुए। कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) ने भी आगे के आयोजकों के लिए कड़े नियम और निगरानी प्रणाली बनाई। इससे ग्लासगो 2014 और गोल्ड कोस्ट 2018 गेम्स की तैयारियों में सुधार दिखा। हालांकि, हाल के सालों में कुछ आयोजक देशों को लागत के कारण पीछे हटना पड़ा। डरबन (2022) और विक्टोरिया (2026) ने खेलों की मेज़बानी से मना कर दिया। इसके बाद CGF ने खेलों की संख्या घटाकर 10 कर दी ताकि खर्च कम हो सके।
2010 के घोटाले ने भारत को कई सबक सिखाए, लेकिन सुधार अब भी अधूरे और बिखरे हुए हैं। सरकार अब डिजिटल खरीद प्रक्रिया और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता की बात कर रही है, लेकिन 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए एक मौका हैं यह साबित करने का कि हमने पिछली गलतियों से सच में सीखा है, वरना इतिहास खुद को दोहरा सकता है।
इस बार क्या अलग है – नई पारदर्शिता और निगरानी रूपरेखा
भारत ने 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेज़बानी के लिए जो दावेदारी पेश की, उसमें यह साफ कहा गया कि 2010 जैसी गलतियाँ दोहराई नहीं जाएँगी। भारत सरकार और कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) दोनों ने इस बार पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कई सुधारों की बात की है।
हालाँकि इस बार भारत को तैयारी के लिए कम समय मिल रहा है, फिर भी तैयारियाँ समय पर चल रही हैं। अच्छी बात यह है कि कई खेल स्थलों पहले से मौजूद हैं या फिर उन्हें 2036 ओलंपिक के आयोजन की बिडिंग के लिए तैयार किया जा रहा है। इसका मतलब है कि 2010 जैसी अंतिम समय की अव्यवस्था और हड़बड़ी वाली निर्माण योजनाएँ नहीं होंगी।
मोदी सरकार ने इस बार ई-प्रोक्योरमेंट (डिजिटल टेंडर प्रणाली) और खुली निविदाओं को अपनाया है, जिससे खर्च और अनुबंधों में पारदर्शिता बनी रहेगी। वहीं, CGF की निगरानी प्रणाली भी पहले से ज्यादा सख्त हो गई है।
जनता, मीडिया और नागरिक निगरानी की भूमिका भी अब 2010 की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय है। अगर कोई अनुचित खर्च या देरी होती है, तो वह तुरंत राष्ट्रीय खबर बन जाती है, जिससे जिम्मेदार लोगों पर दबाव बढ़ता है।
राजनीतिक दाँव भी इस बार ज्यादा ऊँचे हैं। सरकार के लिए 2030 CWG सिर्फ एक खेल आयोजन नहीं, बल्कि भारत के 2036 ओलंपिक की दावेदारी का पहला कदम है। गृहमंत्री अमित शाह समेत केंद्र सरकार के शीर्ष स्तर के नेता खुद योजना और निगरानी में शामिल हैं, जिससे लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं बचती। इस बार का मकसद साफ है, भारत को एक दुनिया के भरोसेमंद खेल आयोजक के रूप में पेश करना।
2030 का रास्ता – क्या भारत अपनी छवि सुधार पाएगा?
भारत को 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी मिलने से 2010 की बदनाम छवि को सुधारने का एक बड़ा मौका मिला है। अब आने वाले पाँच साल में तैयारी और आयोजन की गुणवत्ता यह तय करेगी कि भारत पर जो भरोसा जताया गया है, वह सही था या नहीं।
अगर ये गेम्स समय पर बिना भ्रष्टाचार और देरी के सफलतापूर्वक आयोजित किए जाते हैं, तो भारत न सिर्फ 2010 की नकारात्मक छवि से बाहर निकल सकेगा, बल्कि यह भी साबित कर देगा कि वह ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों के लिए पूरी तरह तैयार है। भारत एक ऐसा देश बनना चाहता है जो विश्व में खेल आयोजनों के लिए पसंदीदा गंतव्य बन जाए।
भारत के लिए इस सफलता का लंबे समय का असर भी महत्वपूर्ण है। 2010 दिल्ली CWG के बाद वहाँ बना इन्फ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाया। लेकिन अगर अहमदाबाद में बहुउद्देश्यीय स्टेडियम, बेहतर शहरी सेवाएँ और टिकाऊ विकास हो पाया, तो यह आयोजन शहर के लिए लंबे समय के फायदे ला सकता है। हालांकि यह सब पारदर्शिता और खर्च पर नियंत्रण के दायरे में ही होना चाहिए।
2030 भारत के लिए दूसरा मौका है। इस बार नई पीढ़ी की अगुआई में, डिजिटल तकनीकों और पिछली गलतियों से सीखी गई सीखों के साथ तैयारी हो रही है। अगर यह पीढ़ी सफल होती है, तो 2030 का उद्घाटन समारोह भारत के लिए पूरा चक्र पूरा करने जैसा क्षण बन सकता है, जहाँ से देश पुरानी शर्म से निकलकर, ईमानदारी और क्षमता के साथ वैश्विक मंच पर अपनी नई पहचान बना सकेगा।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)


