मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने बुधवार (3 दिसंबर 2025) को डिडीगुल और मदुरै जिला प्रशासन के खिलाफ दो अलग-अलग कंटेम्प्ट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सख्त रुख अपनाया। ये याचिकाएँ हाईकोर्ट के उन आदेशों की अवहेलना के खिलाफ दाखिल की गई थीं, जिनमें हिंदू भक्तों को कार्तिगई दीपम उत्सव मनाने और दीप जलाने की अनुमति दी गई थी।
पहला मामला डिंडीगुल के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मंदु कोविल से जुड़ा है, जहाँ स्थानीय हिंदू समुदाय को उत्सव मनाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन जिला प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के नाम पर इसे रोक दिया। दूसरा मामला मदुरै के थिरुप्परनकुंद्रम हिल से संबंधित है, जहाँ हाईकोर्ट ने दीपथून स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने का आदेश दिया था, लेकिन प्रशासन ने इसे लागू नहीं किया।
हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में कंटेम्प्ट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए अधिकारियों को फटकार लगाई और कहा कि कोर्ट के आदेश की अवहेलना लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है।
हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने इन मामलों में सुनवाई की और अपने आदेश में साफ कहा कि जब तक सिंगल बेंच का फैसला डिवीजन बेंच या सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द या स्थगित नहीं किया जाता, तब तक इसे पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों की इस हरकत को ‘नियम कानून की अवहेलना’ करार दिया और कहा कि यह संवैधानिक मूल्यों पर हमला है।
आइए, दोनों मामलों में कोर्ट के आदेश की प्रमुख बातों और फैसलों को विस्तार से समझते हैं।
डिंडीगुल के मांडू कोविल (पेरुमल कोविलपट्टी) का मामला और कोर्ट का आदेश
डिंडीगुल जिले के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मंदु कोविल (सर्वे नंबर 780/12) में कार्तिगई दीपम उत्सव मनाने की अनुमति माँगने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने 2 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाया था। दरअसल, डिंडीगुल जिले के अथूर तालुक के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मांडू करुप्पसामी मंदिर (राजस्व रिकॉर्ड में मांडू कोविल के नाम से दर्ज) परिसर में हिंदू समुदाय कार्तिगई दीपम मनाना चाहता था। गाँव में ईसाई बहुसंख्यक हैं और हिंदू अल्पसंख्यक।
2 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन ने रिट याचिका (WP(MD)No.32468 of 2025) स्वीकार करते हुए हिंदुओं को बुधवार-गुरुवार (3-4 दिसंबर) को कुछ घंटे के लिए दीपम जलाने और झाड़ियाँ साफ करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने साफ कहा था कि कोई स्थायी निर्माण नहीं होगा और ईसाई समुदाय के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
लेकिन अगले ही दिन डिंडीगुल के जिलाधकारी ए. सरवनन (IAS) ने धारा 163 BNSS के तहत आदेश जारी कर गाँव में 5 या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने और बाहरी लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसका सीधा मतलब था कि कोर्ट के आदेश के बावजूद हिंदू दीपम नहीं जला सकेंगे।
कोर्ट ने इसे ‘खुली अवमानना’ और ‘हिंदुओं के मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन’ बताया। जज ने कहा-
“मैंने सिंगल बेंच में आदेश दिया था। जब तक डिवीजन बेंच या सुप्रीम कोर्ट उसे स्थगित या रद्द नहीं करता, उसे अक्षरशः मानना होगा। जिलाधकारी मुझ पर अपीलीय अधिकार नहीं रखते। वह मेरे आदेश को रद्द करने वाला आदेश जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं?”
“कानून-व्यवस्था का बहाना देकर नागरिकों के वैध अधिकारों को कुचलना प्रशासन की लाचारी की स्वीकारोक्ति है। पुलिस अधिकार सुरक्षित रखने के लिए है, उन्हें छीनने के लिए नहीं।”
“पेरुमल कोविलपट्टी के किसी भी हिंदू का पूजा और उत्सव मनाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत मौलिक अधिकार है। जिलाधकारी ने सामान्य धार्मिक उत्सव तक रोक दिया। इससे बड़ा मौलिक अधिकारों का हनन और क्या हो सकता है?”
कोर्ट ने जिलाधकारी सरवनन और पुलिस अधीक्षक प्रतीप (IPS) को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सफाई देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि उनकी सफाई के बाद तय होगा कि अवमानना हुई है या नहीं।
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थिरुप्परनकुंद्रम हिल मामले में कोर्ट का फैसला और प्रमुख बातें
मदुरै के थिरुप्परनकुंद्रम हिल पर स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्या स्वामी मंदिर के प्रबंधन को दीपथून स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने का आदेश हाईकोर्ट ने 1 दिसंबर 2025 को दिया था। दरअसल, मदुरै के प्रसिद्ध अरुलमिगु सुब्रमण्या स्वामी मंदिर के पास थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी है। इस पहाड़ी के निचले शिखर पर एक प्राचीन पत्थर का स्तंभ है जिसे ‘दीपथून’ कहते हैं। सदियों से कार्तिगई दीपम के दिन यहाँ विशाल दीप जलाने की परंपरा रही है। ऊपरी शिखर पर कथित तौर पर दरगाह है।
1 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन ने रिट याचिका (WP(MD)No.32317 of 2025) में मंदिर प्रशासन को 3 दिसंबर शाम ठीक 6 बजे दीपथून पर कार्तिगई दीपम जलाने का स्पष्ट आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह केवल निचले शिखर पर होगा, इससे दरगाह या मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
लेकिन 3 दिसंबर को शाम 6 बजे तक कोई तैयारी नहीं हुई। मंदिर के कार्यकारी अधिकारी यज्ञ नारायणन फोन नहीं उठा रहे थे। मंदिर प्रशासन ने 2 दिसंबर को ही खामीपूर्ण अपील दाखिल की थी, जिसे रजिस्ट्री ने बताया कि वकील ने कागजात वापस ले लिए। दरगाह की ओर से कोई अपील नहीं की गई। कोर्ट ने इसे ‘आदेश की अवहेलना करने की चाल’ बताया।
जज स्वामीनाथन ने कहा-
“मंदिर को मेरे आदेश से कोई शिकायत कैसे हो सकती है? शिकायत सिर्फ दरगाह को हो सकती थी। अपील खामीयुक्त दाखिल करना और फिर वापस लेना साफ तौर पर आदेश नहीं मानने की तरकीब है।”
“घड़ी पीछे नहीं की जा सकती। अधिकारी स्पष्ट कर चुके हैं कि वे कोर्ट का आदेश नहीं मानेंगे।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट (मई 2025) और केरल हाईकोर्ट (2020) के कड़े फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट का आदेश न मानना लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला है। कोई अधिकारी, चाहे कितना ऊँचा हो, कानून से ऊपर नहीं है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को खुद दीप जलाने की दी अनुमति
इस मामले में सजा देने के बजाय कोर्ट ने अपने मूल आदेश को तुरंत लागू करवाने का रास्ता चुना। जज ने कहा कि अवमानना का मकसद सिर्फ सजा नहीं, बल्कि कोर्ट के आदेश को बहाल करना भी है। इसलिए-
- याचिकाकर्ता रामा रविकुमार को खुद पहाड़ी पर चढ़कर दीपथून पर दीप जलाने की अनुमति दी गई।
- वे 10 अन्य लोगों (अन्य याचिकाकर्ताओं सहित) को साथ ले जा सकते हैं।
- मद्रास हाईकोर्ट मदुरै बेंच की CISF यूनिट को आदेश दिया गया कि वह सुरक्षा टीम भेजकर याचिकाकर्ताओं की पूरी सुरक्षा करे और दीप जलाने में मदद करे।
कोर्ट ने माना कि यह ‘प्रतीकात्मक कदम’ है, लेकिन प्रतीकात्मकता का बहुत महत्व है। हालाँकि इसके बावजूद डीएमके सरकार ने मूल जगह पर दीपथून की अनुमति नहीं दी।
पढ़ें- फैसले की कॉपी
ये फैसले दिखाते हैं कि हाईकोर्ट न्यायपालिका की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए कितना सख्त है। जस्टिस स्वामीनाथन ने बार-बार जोर दिया कि कार्यपालिका कोर्ट के आदेश पर फैसला नहीं सुना सकती। कानून-व्यवस्था का बहाना बनाकर धार्मिक अधिकारों को दबाना असंवैधानिक है। मंदु कोविल मामले में अल्पसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों पर जोर दिया गया, जबकि थिरुप्परनकुंद्रम में प्रतीकात्मक अनुपालन से कोर्ट ने अपनी शक्ति दिखाई।
ये फैसले तमिलनाडु की डीएमके सरकार को चेतावनी हैं कि धार्मिक मामलों में तटस्थ रहें और कोर्ट आदेशों का पालन करें। अगर अधिकारी स्पष्टीकरण नहीं देते, तो सजा हो सकती है। हालाँकि डीएमके सरकार की तानाशाही के सामने हाई कोर्ट भी बेबस दिखी। ऐसे में अब हाई कोर्ट ने दोनों मामलों में अवमानना की याचिकाएँ स्वीकार कर ली है। अब देखना ये है कि हिंदू विरोधी डीएमके सरकार हाई कोर्ट को कब तक अँगूठा दिखाती है, या फिर कानून इन मामलों में कोई अलग रास्ता अपनाएगा, ये भी देखने वाली बात होगी।


