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चुप्पी कई बार सहमति बन जाती है: ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ के नारे लगाने वाली कॉन्ग्रेस नेता की आलोचना से भी बच रहीं प्रियंका गाँधी, लोकतंत्र के लिए यह शुभ नहीं

प्रियंका गाँधी सदन में बीजेपी को घेरें, जनहित के मुद्दे उठाएँ सब जरूरी है लेकिन जब बात ऐसे आपत्तिजनक नारों की हो तो बिना किसी हिचक के उसका विरोध भी करें। चुने हुए प्रधानमंत्री की मौत की कामना करना और उस पर लीपा-पोती करना कतई जायज नहीं है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार (14 दिसंबर 2025) को कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ आयोजित रैली से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए गए। कॉन्ग्रेस ने नेता और कार्यकर्ताओं ने कैमरे के सामने, माइक पर चिल्लाते हुए खुलकर ‘मोदी, तेरी कब्र खुदेगी’ के नारे लगाए। कॉन्ग्रेस नेतृत्व से उम्मीद थी कि वो अपने नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करेगी और ऐसे नारे लगाने वालों पर सख्ती दिखाएगी लेकिन नतीजा वही हुआ ‘ढाक के तीन पात’।

बीजेपी ने संसद में यह मुद्दा उठाया और कॉन्ग्रेस से माफी की माँग की। प्रियंका गाँधी ने इस पर माफी या आलोचना तो छोड़िए लीपा-पोती ही करनी शुरू कर दी। उन्होंने कहा, “स्टेज से किसी ने भी ऐसी कोई बात नहीं कही। फिर हमें पता चला कि जनता में से किसी ने या किसी कार्यकर्ता ने वह बयान दिया था लेकिन यह साफ नहीं है कि वह कौन था। तो फिर, इस मामले को सदन में क्यों उठाया जा रहा है? वे (सत्ता पक्ष) नहीं चाहते कि सदन चले।”

कॉन्ग्रेस की जिस नेता को जानने से प्रियंका गाँधी इनकार कर रही हैं, जिस नेता के आपत्तिजनक बयान पर वो लीपा-पोती कर रही हैं वो कोई राह चलती महिला या आम कार्यकर्ता नहीं हैं। वो जयपुर महिला कॉन्ग्रेस की जिला अध्यक्ष मंजू लता मीणा हैं। मीणा अपने बयान पर अब भी कायम है और इस बयानबाजी को वो जनता का गुस्सा बता रही हैं। जनता का गुस्सा चुनावों में कितना दिख रहा है ये मीणा और कॉन्ग्रेस पार्टी दोनों को ही स्पष्ट नजर आ रहा होगा, अलग-अलग राज्यों के चुनावी नतीजे इस बात की तस्दीक करते हैं।

वापस लौटते हैं प्रियंका गाँधी पर, राजनीति में ‘शुचिता’ की झंडाबरदार प्रियंका गाँधी ने जिस तरह कॉन्ग्रेस की एक नेता के बयान पर स्पष्ट आलोचना करने से बचने का रवैया अपनाया, वह वाकई गंभीर सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में सत्ता की आलोचना करना, नीतियों का विरोध करना और सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है या कहें तो कर्तव्य है। पर किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए ‘कब्र खुदेगी’ जैसे नारे न केवल अमर्यादित हैं बल्कि ‘राजनीतिक हिंसा’ को उकसाने वाले भी हैं।

ऐसे में यदि किसी पार्टी की शीर्ष नेता इस नारेबाजी साफ शब्दों में विरोध जताने से बचती हैं, तो यह संदेश जाता है कि पार्टी भीतर ही भीतर ऐसी भाषा को स्वीकार करती है। खुद को लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरोकार दिखाने वाली प्रियंका गाँधी का ऐसे नारों पर कड़ा विरोध ना जताने उनके मूल्यों को सिर्फ दिखावटी बना देता है। गलत का विरोध करना ही राजनीति का पहला नियम क्यों नहीं होना चाहिए? चाहे वो किसी भी खेमे से आए।

कॉन्ग्रेस और उसके नेता अक्सर भाजपा और PM मोदी पर असहिष्णुता, नफरत और विभाजनकारी राजनीति का आरोप लगाते हैं। यदि वही कॉन्ग्रेस अपने नेताओं के हिंसक या अपमानजनक नारों पर चुप्पी साध लेती है तो उसका नैतिक आधार खोखला प्रतीत होता है। जब शीर्ष नेतृत्व कठोर शब्दों की निंदा नहीं करता तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को यह संकेत जाता है कि ‘सब जायज है’ लेकिन लोकतंत्र में ‘सब जायज नहीं’ हो सकता है प्रियंका गाँधी जी।

प्रियंका गाँधी सदन में बीजेपी को घेरें, जनहित के मुद्दे उठाएँ सब जरूरी है लेकिन जब बात ऐसे आपत्तिजनक नारों की हो तो बिना किसी हिचक के उसका विरोध भी करें। चुने हुए प्रधानमंत्री की मौत की कामना करना और उस पर लीपा-पोती करना कतई जायज नहीं है। पार्टी के भीतर अनुशासन हो, मर्यादा हो उसके लिए प्रियंका गाँधी जैसे नेताओं को ही बात करनी होगी। चुप्पी कई बार सहमति बन जाती है और यह लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति होती है।

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शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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