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सड़क से संसद तक रामलला के लिए की लड़ाई, 12 साल की उम्र में छोड़ा घर: जानिए- अयोध्या आंदोलन के योद्धा रामविलास दास वेदांती को, जिन्होंने भव्य मंदिर देखकर ली अंतिम सांस

वेदांती जी ने अपनी पूरी जिंदगी राम मंदिर के लिए लगा दी थी। यह देश के लिए एक बहुत बड़ी और भावुक बात है कि उन्होंने भव्य राम मंदिर को बनते हुए देख लिया। उनका निधन ऐसे समय में हुआ है, जब राम मंदिर का काम पूरा हो चुका है।

अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में से एक, पूर्व सांसद और वरिष्ठ संत डॉ रामविलास दास वेदांती का सोमवार (15 दिसंबर 2025) सुबह 77 साल की उम्र में निधन हो गया। मध्य प्रदेश के रीवा में रामकथा के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी थी। वेदांती जी का पार्थिव शरीर अयोध्या लाया गया है, जहाँ उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए संतों, नेताओं और श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। डॉ वेदांती का निधन राम जन्मभूमि आंदोलन के एक युग का अंत माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन राम मंदिर के लिए समर्पित कर दिया था और भव्य मंदिर निर्माण देखने के बाद ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा।

बचपन में छोड़ा घर, बने अयोध्या के संत

डॉ रामविलास दास वेदांती जी का जन्म 7 अक्टूबर 1958 को मध्य प्रदेश के रीवा शहर में हुआ था। वह बचपन से ही बहुत धार्मिक थे और भगवान की भक्ति में उनका मन लगता था। जब वह सिर्फ 12 साल के थे, यानी बहुत छोटे थे, तभी उन्होंने फैसला कर लिया कि वह साधु बनेंगे। उन्होंने अपना घर-परिवार छोड़ दिया और सीधे भगवान राम की नगरी अयोध्या आ गए। एक तरह से, उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी राम जी के नाम कर दी।

अयोध्या पहुँचकर, वह हनुमानगढ़ी के बहुत मशहूर संत महंत अभिराम दास के शिष्य बन गए और उनके मार्गदर्शन में रहने लगे। वेदांती जी संस्कृत के बहुत बड़े जानकार (प्रकांड विद्वान) थे। अयोध्या में उनका एक अपना आश्रम ‘वशिष्ठ भवन’ था और वह अक्सर सरयू नदी के पास ‘हिंदू धाम’ नाम की जगह पर रहते थे।

राम मंदिर आंदोलन के बने प्रमुख योद्धा

1980 के आस-पास, जब देश में राम मंदिर बनाने का आंदोलन जोर पकड़ रहा था, तब वेदांती जी भी इसमें शामिल हो गए। वह अकेले नहीं थे, बल्कि उन्हें कई बड़े संतों का साथ मिला। इनमें महंत अवैद्यनाथ (जो आगे चलकर योगी आदित्यनाथ के गुरु बने), रामचंद्र परमहंस और अशोक सिंघल जैसे दिग्गज संत थे।

वेदांती जी बहुत जल्द इस आंदोलन का एक मुख्य चेहरा बन गए। वह सिर्फ अयोध्या में नहीं रुके, बल्कि देश के कोने-कोने में गए। उन्होंने लोगों से मिलकर राम मंदिर बनाने की बात की और जनता को जोड़ा। उनकी मेहनत और जोशीले भाषणों के कारण ही उन्हें पूरे देश में एक मजबूत पहचान मिली। वह उन संतों में से थे जिन्होंने राम मंदिर के सपने को सच करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी।

डॉ रामविलास दास वेदांती जी राम मंदिर आंदोलन के एक बहुत ही बेबाक और तेज-तर्रार नेता थे। वह अपनी बात खुलकर और जोरदार तरीके से रखते थे। आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका के चलते ही उन्हें राम जन्मभूमि न्यास (ट्रस्ट जो मंदिर का काम देखता है) का सदस्य और बाद में कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया गया।

बाबरी ढाँचा विवाद और उनका दावा

साल 1992 में, जब 6 दिसंबर को बाबरी ढाँचा गिराया गया तो इस मामले में जिन बड़े नेताओं पर केस चला, उनमें वेदांती जी का नाम भी शामिल था। उन्होंने कोर्ट में और बाहर भी हमेशा यह कहा कि उन्होंने कोई गलती नहीं की।

उनका दावा था कि हमने किसी मस्जिद को नहीं तोड़ा, बल्कि जहाँ ढाँचा खड़ा था, वहाँ असल में बहुत पहले राजा विक्रमादित्य ने एक मंदिर बनवाया था। समय के साथ वह मंदिर खंडहर बन चुका था। वेदांती जी ने कहा कि उन्होंने और कारसेवकों ने मिलकर केवल उस पुराने खंडहर को हटाया था, ताकि उसकी जगह पर भव्य राम मंदिर बन सके।

वेदांती ने साफ कहा कि उनका मकसद वहाँ सिर्फ नया मंदिर बनाना था। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें, लालकृष्ण आडवाणी और उमा भारती जैसे सभी बड़े नेताओं के साथ बरी कर दिया।

वेदांती जी राम मंदिर को लेकर बहुत उत्साहित थे। उनकी इच्छा थी कि अयोध्या में बनने वाला राम मंदिर इतना ऊँचा हो (करीब 1111 फुट) कि वह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों जैसे इस्लामाबाद या कोलंबो से भी दिखाई दे। उनका मानना था कि यह मंदिर दुनिया का सबसे भव्य और बड़ा मंदिर होना चाहिए।

संत से सियासत तक का सफर

राम मंदिर आंदोलन में वेदांती जी की पहचान इतनी मजबूत हो गई थी कि उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उन्हें चुनाव लड़ने का मौका दिया।

  • पहली जीत (1996): वह सबसे पहले मछली शहर (जौनपुर और प्रतापगढ़ के हिस्सों वाली सीट) से लोकसभा चुनाव लड़े। राम मंदिर की वजह से लोगों ने उन्हें भरपूर प्यार दिया और वह चुनाव जीतकर सांसद बन गए, यानी दिल्ली में संसद पहुँच गए।
  • दूसरी जीत (1998): इसके बाद, उन्होंने प्रतापगढ़ सीट से चुनाव लड़ा। यह सीट ऐसी थी जहाँ बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के खानदान का दबदबा रहता था, लेकिन वेदांती जी ने कॉन्ग्रेस की उम्मीदवार रत्ना सिंह को हरा दिया। उनकी यह जीत बहुत बड़ी मानी गई, क्योंकि उन्होंने पुरानी राजाओं वाली राजनीति को चुनौती दी थी। वेदांती जी हमेशा कहते थे कि वह अपनी ये जीतें भगवान राम के नाम पर मिली ‘राम लहर’ के कारण ही जीत पाए।

मंदिर का सपना पूरा होते देखा और फिर ली अंतिम सांस

जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, तो डॉ वेदांती जी बहुत खुश थे। उन्होंने कहा था कि यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण ही हो पाया है, जिन्होंने महंत अवैद्यनाथ और रामचंद्र परमहंस जैसे संतों के पुराने सपने को सच कर दिखाया।

वेदांती जी ने अपनी पूरी जिंदगी राम मंदिर के लिए लगा दी थी। यह देश के लिए एक बहुत बड़ी और भावुक बात है कि उन्होंने भव्य राम मंदिर को बनते हुए देख लिया। उनका निधन ऐसे समय में हुआ है, जब राम मंदिर का काम पूरा हो चुका है। इसीलिए, पूरे देश में लोग कह रहे हैं कि ‘वह राम मंदिर देखकर स्वर्ग सिधारे’, यानी उनकी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई और वह शांति से दुनिया छोड़कर चले गए।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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