बिहार की राजनीति में दशकों से अपनी धाक जमाने वाले लालू प्रसाद यादव के परिवार के लिए ‘लैंड फॉर जॉब’ घोटाला एक ऐसा चक्रव्यूह बन गया है, जिससे निकलना उनके लिए अब और भी कठिन होता जा रहा है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार समेत 41 लोगों पर आरोप तय कर दिए हैं। कोर्ट ने माना है कि यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता का दुरुपयोग कर चलाया गया एक संगठित नेटवर्क था।
एक संगठित आपराधिक नेटवर्क का उदय
यह कहानी शुरू होती है साल 2004 में, जब देश में यूपीए-1 की सरकार बनी और लालू प्रसाद यादव को रेल मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। 2004 से 2009 के अपने इस पाँच साल के कार्यकाल के दौरान लालू यादव ने रेलवे के विकास के कई दावे किए, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल चल रहा था। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने हाल ही में टिप्पणी की कि यह मामला पहली नजर में किसी साधारण भ्रष्टाचार जैसा नहीं, बल्कि एक ‘संगठित आपराधिक नेटवर्क‘ जैसा दिखाई देता है।
अदालत का मानना है कि सत्ता, पद और प्रभाव का ऐसा दुरुपयोग कम ही देखने को मिलता है, जहाँ सरकारी नियुक्तियों को एक निजी सौदेबाजी की वस्तु बना दिया गया। कोर्ट ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उनकी बेटियों मीसा भारती और हेमा यादव, और उनके बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप यादव समेत कुल 41 आरोपितों के खिलाफ आरोप (Charges) तय कर दिए हैं। यह एक ऐसा पड़ाव है जहाँ से अब लालू परिवार को कोर्ट में लंबे ट्रायल का सामना करना होगा।
नौकरी के बदले जमीन: सरकारी पद का निजी इस्तेमाल
जाँच एजेंसियों (CBI और ED) का दावा है कि लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए एक बेहद शातिर तरीका अपनाया। रेलवे में ग्रुप-डी (चतुर्थ श्रेणी) की नौकरियों के लिए कोई विज्ञापन नहीं निकाला गया, न ही कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई। इसके बजाय, उन लोगों को चुना गया जो नौकरी के बदले अपनी जमीन लालू परिवार के नाम करने को तैयार थे।
इस घोटाले का पैमाना इतना बड़ा है कि लालू परिवार ने इसके जरिए बिहार के पटना जैसे महत्वपूर्ण इलाकों में 1 लाख स्क्वायर फीट से ज्यादा जमीन अपने कब्जे में ले ली। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन बेशकीमती जमीनों के लिए जो कागजी भुगतान दिखाया गया, वह महज 26 लाख रुपए था। जबकि सीबीआई के मुताबिक, उस समय के सरकारी सर्कल रेट के हिसाब से भी इनकी कीमत 4.39 करोड़ रुपए से ज्यादा थी। अगर बाजार भाव की बात करें, तो यह कीमत सर्कल रेट से भी चार से छह गुना ज्यादा थी। यानी करोड़ों की संपत्ति को सिर्फ कुछ लाख रुपए में, और कई बार तो ‘गिफ्ट’ के नाम पर हथिया लिया गया।
बिना विज्ञापन और अधूरे आवेदनों पर मेहरबानी
जाँच में यह बात भी सामने आई कि नियमों की जमकर धज्जियाँ उड़ाई गईं। आमतौर पर सरकारी नौकरियों के लिए विज्ञापन जारी किए जाते हैं, परीक्षाएँ होती हैं और इंटरव्यू होते हैं, लेकिन यहाँ मामला उल्टा था। उम्मीदवारों ने मुंबई, जबलपुर, कोलकाता, जयपुर और हाजीपुर जैसे रेलवे जोनों के लिए आवेदन दिए।
कई मामलों में तो आवेदन मिलने के महज तीन दिन के भीतर ही नौकरी को मंजूरी दे दी गई। आश्चर्य की बात यह है कि कई उम्मीदवारों के आवेदन फॉर्म अधूरे थे, उनके पते तक साफ नहीं थे, फिर भी उन्हें रेलवे में ‘नियुक्त’ कर दिया गया। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि उनके परिवार की जमीन की रजिस्ट्री लालू परिवार के किसी न किसी सदस्य के नाम हो चुकी थी।
7 बड़ी डील्स: जिनसे खुला भ्रष्टाचार का पूरा काला चिट्ठा
सीबीआई ने इस पूरे घोटाले को साबित करने के लिए सात प्रमुख डील्स का हवाला दिया है।
डील-1 (किशुन देव राय और राबड़ी देवी): 6 फरवरी 2008 को पटना के रहने वाले किशुन देव राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट की जमीन राबड़ी देवी को सिर्फ 3.75 लाख रुपए में बेच दी। इस रजिस्ट्री के होते ही उसी साल किशुन देव राय के परिवार के तीन सदस्यों ‘राज कुमार सिंह, मिथिलेश कुमार और अजय कुमार’ को मध्य रेलवे मुंबई में नौकरी दे दी गई।
डील-2 (संजय राय और राबड़ी देवी): फरवरी 2008 में ही पटना के महुआबाग के संजय राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट जमीन फिर से राबड़ी देवी के नाम कर दी। कीमत वही 3.75 लाख रुपए रखी गई। इस जमीन के ‘सौदे’ के बदले संजय राय के परिवार के दो सदस्यों को रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरी मिल गई।
डील-3 (किरण देवी और मीसा भारती): नवंबर 2007 का मामला और भी बड़ा था। किरण देवी ने अपनी 80,905 वर्ग फीट की विशाल जमीन महज 3.70 लाख रुपए में लालू की बेटी मीसा भारती के नाम कर दी। इसके ठीक बाद 2008 में उनके बेटे अभिषेक कुमार को मुंबई सेंट्रल रेलवे में नियुक्त कर दिया गया।
डील-4 (हजारी राय और एके इन्फोसिस्टम): फरवरी 2007 में हजारी राय ने अपनी 9,527 स्क्वायर फीट जमीन ‘एके इन्फोसिस्टम प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी को बेची। इसके बदले उनके भतीजों दिलचंद कुमार और प्रेम चंद कुमार को रेलवे में नौकरी मिली। दिलचस्प बात यह है कि 2014 में इस पूरी कंपनी का मालिकाना हक और नियंत्रण राबड़ी देवी और मीसा भारती ने अपने हाथ में ले लिया, जिससे जमीन सीधे उनके पास आ गई।
डील-5 (लाल बाबू राय और राबड़ी देवी): पटना के लाल बाबू राय के बेटे लाल चंद कुमार को 2006 में जयपुर रेलवे में नौकरी मिली थी। इसकी ‘फीस’ के तौर पर मई 2015 में लाल बाबू राय ने अपनी 1,360 वर्ग फीट जमीन 13 लाख रुपए में राबड़ी देवी के नाम कर दी।
डील-6 (बृज नंदन राय, हृदयानंद चौधरी और हेमा यादव): इस डील में एक बिचौलिए का इस्तेमाल दिखा। 2008 में बृज नंदन राय ने अपनी जमीन हृदयानंद चौधरी को बेची। हृदयानंद वही व्यक्ति थे जिन्हें 2005 में हाजीपुर रेलवे में नौकरी मिली थी। 2014 में हृदयानंद ने यह जमीन एक ‘गिफ्ट डीड’ के जरिए लालू की दूसरी बेटी हेमा यादव को दान (Gift) कर दी।
डील-7 (विशुन देव राय, ललन चौधरी और हेमा यादव): यहाँ भी वही तरीका अपनाया गया। विशुन देव राय ने अपनी जमीन ललन चौधरी को दी। ललन के पोते पिंटू कुमार को 2008 में मुंबई रेलवे में नौकरी मिली। बाद में 2014 में ललन चौधरी ने वह जमीन हेमा यादव को ट्रांसफर कर दी।
नाबालिग बच्चों के नाम पर संपत्ति का खेल
CBI की चार्जशीट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव को लेकर है। 14 जून 2005 की एक डील का जिक्र है, जहाँ एक पिता ने अपने बेटे को नौकरी दिलाने के बदले महज 5,700 रुपए (पाँच हजार सात सौ) में दो कीमती जमीनें राबड़ी देवी के संरक्षण में तेजस्वी और तेज प्रताप के नाम कर दीं।
उस समय ये दोनों भाई नाबालिग थे। जाँच एजेंसी का कहना है कि यह इस बात का सबूत है कि भ्रष्टाचार की योजना कितनी पहले से और कितनी गहराई तक तैयार की गई थी कि बच्चों के भविष्य के नाम पर तब से ही संपत्तियाँ बटोरना शुरू कर दिया गया था।
कानूनी कार्रवाई का सफर: 2022 से 2026 तक
इस घोटाले पर कानूनी शिकंजा 2022 में कसना शुरू हुआ, जब CBI ने लालू परिवार के खिलाफ एक नई FIR दर्ज की और दिल्ली-बिहार के 17 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की। इसके बाद ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से भी जाँच शुरू की।
मई 2025 तक आते-आते CBI ने पुख्ता सबूतों के साथ चार्जशीट दाखिल की, जिसमें लालू यादव को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया। 24 अगस्त को हुई छापेमारी के बाद जाँच एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि नौकरी पाने वाले कई उम्मीदवार अयोग्य थे और उन्होंने फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया था।
राजनीतिक भविष्य पर मंडराते बादल
राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने का मतलब है कि अब यह मामला ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) सही पाया गया है और अब गवाहों के बयान और जिरह शुरू होगी। लालू प्रसाद यादव पहले से ही चारा घोटाले के कई मामलों में सजायाफ्ता हैं और खराब स्वास्थ्य के चलते जमानत पर हैं। अब उनके साथ उनके दोनों बेटों (तेजस्वी और तेज प्रताप) और बेटियों पर भी जेल जाने की तलवार लटक रही है।
कोर्ट की टिप्पणियों ने यह साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में जब पद का इस्तेमाल ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ बनाने के लिए किया जाता है, तो कानून की नजरों से बचना नामुमकिन होता है। अब सबकी नजरें कोर्ट के ट्रायल पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि बिहार का यह शक्तिशाली राजनीतिक परिवार इस कानूनी भंवर से निकल पाएगा या नहीं।


