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सर्विस सेक्टर से रोजगार देने वाले देश तक, 10 साल में ‘Startup India’ ने कैसे बदले हालात: 400 गुना बढ़े स्टार्टअप्स, महिलाएँ और छोटे शहर बन रहे ग्रोथ का इंजन

बेंगलुरु, हैदराबाद, मुंबई और दिल्ली-NCR जैसे बड़े शहर इस बदलाव के प्रमुख केंद्र जरूर हैं लेकिन अब छोटे शहर भी तेजी से आगे आ रहे हैं। आज लगभग 53 प्रतिशत स्टार्टअप टियर-II और टियर-III शहरों से निकल रहे हैं।

जब भारत आजाद हुआ तब देश के सामने सबसे चुनौती केवल राजनीतिक स्वतंत्रता संभालने की नहीं थी बल्कि हमें एक ऐसा आर्थिक ढाँचा खड़ा करना था जो करोड़ों लोगों को रोजगार दे सके। भारत की आबादी युवा थी, संसाधन सीमित थे और उद्योग का आधार कमजोर था। उत्पादन बढ़ाने की कोशिशें हुईं लेकिन शुरुआत से ही भारत की अर्थव्यवस्था सर्विस सेक्टर की ओर झुकती चली गई। नतीजा यह हुआ कि भारत ‘रोजगार देने वाला देश’ बनने के बजाय ‘रोजगार खोजने वाला देश’ बनता चला गया। देश के भीतर गाँव से शहर और फिर विदेशों तक काम की तलाश में बड़े पैमाने पर पलायन होता रहा।

वर्ष 2016 भारत के उद्योग जगत के लिए एक अहम मोड़ बनकर आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट दृष्टि सामने रखी कि भारत को केवल टैलेंट सप्लायर नहीं बल्कि जॉब क्रिएटर बनना होगा। इसी सोच के साथ 16 जनवरी 2016 को स्टार्टअप इंडिया को एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य केवल नए व्यवसाय खड़े करना नहीं था बल्कि एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना था जिसमें युवा अपने विचारों को व्यवसाय में बदलें, जोखिम उठा सकें और रोजगार पैदा करने वाले बनें। 16 जनवरी को भारत में ‘स्टार्टअप डे’ के रूप में मनाया जाता है।

पिछले लगभग एक दशक में इसका असर साफ दिखाई देता है। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में से एक बन चुका है। दिसंबर 2025 तक के आधिकारिक आँकड़ों की मानें तो, आज देश में सरकार की ओर से मान्यता प्राप्त 2 लाख से अधिक स्टार्टअप्स हैं यह संख्या 2016 में करीब 500 थी। इससे 21 लाख से अधिक रोजगार पैदा हुए हैं और हर दिन 50+ स्टार्टअप्स को मान्यता दी जा रही है।

स्टार्टअप इंडिया के लिए तैयार की गई शुरुआती जमीन

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के नेतृत्व वाली स्टार्टअप इंडिया पहल की शुरुआत 16 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से की थी। उन्होंने कहा था कि ‘भारत के युवा नौकरी खोजने वाले के बजाय रोजगार पैदा करने वाले बनें और एक स्टार्ट-अप सिर्फ 5 लोगों को भी रोजगार दे, तो यह भी राष्ट्र की बड़ी सेवा होगी’।

स्टार्टअप इंडिया के तहत सरकार ने नीति, फाइनेंस और संस्थागत सहयोग तीनों स्तरों पर काम शुरू किया। सबसे पहले स्टार्टअप की परिभाषा को स्पष्ट किया गया ताकि नए उद्यमों को सरकारी मान्यता मिल सके। इसके साथ ही टैक्स से जुड़े कई बोझ कम किए गए जैसे शुरुआती वर्षों में आयकर में छूट और एंजेल टैक्स से राहत। इसका सीधा असर यह हुआ कि नए उद्यमियों के लिए शुरुआती संघर्ष कुछ हद तक आसान हुआ और निवेशकों का भरोसा भी बढ़ा।

FFS, CGSS और SISFS: ताकि ना पड़े स्टार्टअप्स को पैसे की कमी

पूँजी की उपलब्धता स्टार्टअप्स के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने ‘फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स’ (FFS) की शुरुआत की, जिसके तहत सेबी-रजिस्टर्ड अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) के माध्यम से स्टार्टअप्स में निवेश किया गया। इस पहल का उद्देश्य सीधे पैसा देना नहीं था बल्कि निजी निवेश को प्रोत्साहित करना था ताकि बाजार आधारित फंडिंग का एक मजबूत ढाँचा तैयार हो सके।

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, FFS के तहत ₹10,000 करोड़ का कॉर्पस 140 से ज्यादा AIFs को दिया गया है, जिन्होंने मिलकर 1,370 से ज्यादा स्टार्टअप्स में ₹25,500+ करोड़ का निवेश किया है।

स्टार्टअप्स को मदद देने के लिए सरकार ने ‘क्रेडिट गारंटी स्कीम फॉर स्टार्टअप्स’ (CGSS) शुरू की। इस योजना का मकसद स्टार्टअप्स को बिना किसी गारंटी के लोन उपलब्ध कराना है। इसे नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (NCGTC) लिमिटेड के जरिए लागू किया जा रहा है। इस योजना के तहत अब तक 330 से अधिक स्टार्टअप्स को ₹800 करोड़ से ज्यादा के लोन की गारंटी दी जा चुकी है।

इसके साथ ही ‘स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम’ (SISFS) के जरिए शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स को मजबूत किया जा रहा है। ₹945 करोड़ के कोष वाली इस योजना से प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट, प्रोटोटाइप, प्रोडक्ट ट्रायल, मार्केट एंट्री और कमर्शियलाइजेशन जैसी गतिविधियों के लिए आर्थिक मदद दी जाती है। इस फंड के तहत 215 से अधिक इनक्यूबेटर्स को मंजूरी दी गई है।

रोजगार सृजन और वैल्यू क्रिएशन

पिछले करीब दस वर्षों में यह पहल केवल नीतियों तक सीमित नहीं रही है। इन स्टार्टअप्स ने रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां इन उद्यमों के जरिए पैदा हुई हैं। मैन्युफैक्चरिंग, फिनटेक, एग्रीटेक, हेल्थटेक, एजुटेक, लॉजिस्टिक्स और क्लीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भारतीय स्टार्टअप्स ने न केवल घरेलू समस्याओं के समाधान खोजे हैं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। इससे घरेलू वैल्यू चेन मजबूत हुई है और भारत को ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनने को भी बल मिला है।

इस पहल का असर भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम की तेज वृद्धि में साफ दिखाई देता है। वर्ष 2014 में जहाँ भारत में सिर्फ 4 ऐसी निजी कंपनियाँ थीं जिनका मूल्य 1 अरब डॉलर से अधिक था, वहीं आज यह संख्या 120 से ज्यादा हो चुकी है। इन स्टार्टअप्स का कुल मूल्यांकन 350 अरब डॉलर से अधिक है जो यह बताता है कि भारतीय स्टार्टअप न केवल बड़े पैमाने पर आगे बढ़ रहे हैं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी मजबूत पहचान बना चुके हैं।

महिलाएँ और छोटे शहर बन रहे तरक्की का नया आधार

भारत में स्टार्टअप क्रांति की अगुवाई अब सिर्फ बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है। बेंगलुरु, हैदराबाद, मुंबई और दिल्ली-NCR जैसे बड़े शहर इस बदलाव के प्रमुख केंद्र जरूर हैं लेकिन अब छोटे शहर भी तेजी से आगे आ रहे हैं। आज लगभग 53 प्रतिशत स्टार्टअप टियर-II और टियर-III शहरों से निकल रहे हैं जिससे साफ दिखता है कि उद्यमिता अब कुछ गिने-चुने शहरों तक सीमित नहीं रही। छोटे शहरों के युवा भी नए आइडिया के साथ आगे बढ़ रहे हैं और अपना कारोबार खड़ा कर रहे हैं।

ये स्टार्टअप खेती, टेलीमेडिसिन, माइक्रोफाइनेंस, टूरिज्म और एड-टेक जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जिससे गाँव और शहर के बीच की दूरी धीरे-धीरे कम हो रही है। इसी के साथ महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है। दिसंबर 2025 तक 48% से ज्यादा मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला डायरेक्टर या पार्टनर मौजूद है। यह साफ संकेत है कि स्टार्टअप इकोसिस्टम सिर्फ आर्थिक विकास का जरिया नहीं बन रहा बल्कि महिलाओं को नेतृत्व का मौका देकर सामाजिक समानता और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में संतुलित विकास को भी आगे बढ़ा रहा है।

आँकड़ों में स्टार्टअप इंडिया

  • स्टार्टअप इंडिया की वेबसाइट पर मौजूद आँकड़ों के मुताबिक, पहल के तहत अब तक 2,00,000 से अधिक स्टार्टअप्स को DPIIT द्वारा मान्यता दी जा चुकी है। यह दर्शाता है कि भारत में उद्यमिता को संस्थागत पहचान और सरकारी समर्थन बड़े स्तर पर प्राप्त हुआ है। DPIIT की मान्यता से स्टार्टअप्स को टैक्स छूट, अनुपालन में सहूलियत और विभिन्न सरकारी योजनाओं तक सीधी पहुँच मिलती है।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म BHASKAR (Bharat Startup Knowledge Access Registry) पर इस समय 6,68,516 से अधिक यूजर्स पंजीकृत हैं। भास्कर की परिकल्पना वन-स्टॉप डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में की गई है। यह प्लेटफॉर्म स्टार्टअप्स, निवेशकों, मेंटर्स और नीति निर्माताओं के बीच जानकारी, नेटवर्किंग और सहयोग का एक राष्ट्रीय माध्यम बन चुका है।
  • स्टार्टअप इकोसिस्टम को शुरुआती सहयोग देने के उद्देश्य से देश में 244 सीड फंडेड इनक्यूबेटर्स कार्यरत हैं। ये इनक्यूबेटर्स नए स्टार्टअप्स को फंडिंग, मार्गदर्शन, तकनीकी सहायता और बुनियादी ढाँचा उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाते हैं।
  • वित्तीय सहायता के मोर्चे पर स्टार्टअप इंडिया इनिशिएटिव के माध्यम से अब तक 27,000 करोड़ रुपए से अधिक की फंडिंग प्रदान की जा चुकी है। इस फंडिंग से नवाचार आधारित स्टार्टअप्स को शुरुआती और विकास के चरण में मजबूती मिली है।
  • स्टार्टअप इंडिया का प्रभाव केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रहा है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार 53% स्टार्टअप्स टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्थित हैं, जो यह दर्शाता है कि उद्यमिता छोटे शहरों और उभरते क्षेत्रों तक तेज़ी से फैल रही है।
  • सरकारी ई-मार्केटप्लेस GeM के माध्यम से स्टार्टअप्स को अब तक 51,000 करोड़ रुपए से अधिक के वर्क ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। इससे स्टार्टअप्स को सीधे सरकारी खरीद प्रणाली से जुड़ने और स्थायी व्यावसायिक अवसर हासिल करने में मदद मिली है।
  • नीतिगत और प्रशासनिक स्तर पर सरकार द्वारा 63 रेगुलेटरी सुधार लागू किए गए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य स्टार्टअप्स के लिए नियमों को सरल बनाना, अनुपालन की जटिलताओं को कम करना और कारोबार करने में आसानी को बढ़ावा देना है।
  • समावेशिता के संदर्भ में भी स्टार्टअप इंडिया ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। 48 प्रतिशत मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक मौजूद है, जो स्टार्टअप इकोसिस्टम में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और नेतृत्व को दर्शाता है।
  • राज्य स्तर पर भी स्टार्टअप नीति को मजबूती मिली है। देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्टार्टअप नीति लागू की जा चुकी है। इससे स्थानीय नवाचार, निवेश और उद्यमिता को बढ़ावा मिल रहा है।
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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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