अगर राजधानी ही संकट में हो तो सरकार कहाँ से चलेगी? जापान में यह सवाल अब सिर्फ एक काल्पनिक आपदा की चर्चा नहीं रह गया है। भूकंप और सुनामी के लगातार खतरे को देखते हुए नीति-निर्माता इस संभावना पर मंथन कर रहे हैं कि किसी बड़े संकट में टोक्यो के काम करने की स्थिति में न रहने पर देश का प्रशासन कैसे संभाला जाएगा।
प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद और प्रमुख मंत्रालयों के साथ आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा टोक्यो में केंद्रित होने के कारण यह चिंता और गंभीर हो जाती है। इसी के जवाब के तौर पर जापान ने ‘दूसरी राजधानी’ की व्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
जापानी संसद ने हाल ही में एक ऐसा कानून पारित किया है, जिसने देश में ‘दूसरी राजधानी‘ (Secondary Capital) बनाने का रास्ता खोल दिया है।
हालाँकि, इस कानून का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि टोक्यो से राजधानी हटाई जा रही है। सरकार का उद्देश्य केवल इतना है कि यदि भविष्य में कोई ऐसी आपदा आती है, जिससे टोक्यो का प्रशासन ठप पड़ जाए, तो देश की शासन व्यवस्था तुरंत किसी दूसरे शहर से संचालित की जा सके।
सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक निरंतरता से जुड़ा एक बड़ा सुधार बता रही है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि इस कानून के पीछे राष्ट्रीय हित से ज्यादा राजनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों महसूस हुई? यह नया कानून क्या कहता है? कौन-कौन से शहर इसकी दौड़ में शामिल हैं? क्या वास्तव में इससे जापान को फायदा होगा या फिर यह केवल राजनीतिक प्रयोग है? और क्या भारत में भी कभी ऐसी माँग उठी है? इन सभी सवालों के जवाब इस पूरे मामले को समझने के लिए बेहद जरूरी हैं।
आखिर जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों पड़ी और नया कानून क्या कहता है?
जापान भौगोलिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील देशों में गिना जाता है। यह चार प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों के मिलन क्षेत्र में स्थित है, जिसकी वजह से यहाँ लगातार भूकंप आते रहते हैं। देश में हर साल करीब 1500 भूकंप दर्ज किए जाते हैं और औसतन हर दिन दो से तीन बार धरती हिलती है।
वैज्ञानिक कई वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि टोक्यो महानगरीय क्षेत्र या ननकाई ट्रफ में भविष्य में एक बेहद शक्तिशाली भूकंप आने की आशंका बनी हुई है। जापानी सरकार का अनुमान है कि अगले 30 वर्षों में टोक्यो क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आने की लगभग 70 प्रतिशत संभावना है।
यदि ऐसा होता है तो केवल इमारतों को नुकसान नहीं पहुँचेगा बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद, मंत्रालय, वित्तीय संस्थान, संचार नेटवर्क और राष्ट्रीय प्रशासन भी प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में पूरे देश की शासन व्यवस्था बाधित होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इसी जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने बैकअप राजधानी की अवधारणा पर काम शुरू किया।
इसी दिशा में जापानी संसद के उच्च सदन ने जुलाई 2026 में ‘एक्ट ऑन द प्रमोशन ऑफ मेजर्स टू एंश्योर द कंटिन्यूटी ऑफ नेशनल एंड सोशल फंक्शंस एंड द डेवलपमेंट ऑफ ए सेकेंडरी कैपिटल’ को मंजूरी दी।
यह कानून किसी शहर को तुरंत दूसरी राजधानी घोषित नहीं करता बल्कि एक कानूनी ढाँचा तैयार करता है। इसके तहत जापान के विभिन्न प्रीफेक्चर (राज्य) आवेदन कर सकेंगे और सरकार तय मानकों के आधार पर यह फैसला करेगी कि कौन सी जगह आपातकालीन प्रशासनिक केंद्र बनने के लिए सबसे उपयुक्त है।
यहाँ एक बात समझना भी जरूरी है कि टोक्यो अपनी जगह राजधानी बना रहेगा। दूसरी राजधानी केवल आपातकालीन स्थिति में सरकार के कामकाज को जारी रखने के लिए होगी। यानी किसी बड़े संकट की स्थिति में प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रालय और अन्य आवश्यक प्रशासनिक संस्थान अस्थायी रूप से वहीं से काम कर सकेंगे।
कौन-सी शर्तें पूरी करनी होंगी और सरकार किस तरह मदद करेगी?
दूसरी राजधानी बनने की इच्छा रखने वाले किसी भी राज्य को केवल आवेदन भर देने से यह दर्जा नहीं मिल जाएगा। इसके लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण मानक तय किए हैं। सबसे पहले उस क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अपेक्षाकृत कम होना चाहिए।
साथ ही वहाँ पर्याप्त जनसंख्या, मजबूत अर्थव्यवस्था, विकसित प्रशासनिक ढाँचा और राष्ट्रीय स्तर के सरकारी कामकाज को संभालने की क्षमता भी होनी चाहिए। बेहतर सड़क, रेल और हवाई संपर्क के अलावा आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। आवेदन करने से पहले संबंधित राज्य की स्थानीय विधानसभा से अपनी मंजूरी भी लेनी होगी।
यदि किसी क्षेत्र का चयन दूसरी राजधानी के रूप में होता है तो उसके विकास में केंद्र सरकार महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सरकार वहाँ नए सरकारी कार्यालयों और प्रशासनिक भवनों का निर्माण कराएगी, परिवहन नेटवर्क को मजबूत बनाएगी, डिजिटल सुविधाओं का विस्तार करेगी और निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए टैक्स में रियायत तथा अन्य आर्थिक प्रोत्साहन भी देगी।
इसका उद्देश्य केवल एक बैकअप प्रशासनिक केंद्र बनाना नहीं है, बल्कि ऐसे शहर को आर्थिक और औद्योगिक रूप से भी इतना सक्षम बनाना है कि जरूरत पड़ने पर वह देश के प्रमुख प्रशासनिक कार्यों को बिना किसी बाधा के संभाल सके।
दूसरी राजधानी की दौड़ में कौन-कौन से शहर हैं और ओसाका सबसे आगे क्यों माना जा रहा है?
हालाँकि कानून में किसी भी शहर का नाम तय नहीं किया गया है, लेकिन कई प्रीफेक्चर खुलकर अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चा ओसाका की हो रही है।
जापान का दूसरा सबसे बड़ा महानगरीय क्षेत्र होने के साथ-साथ ओसाका लंबे समय से देश की आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ का विकसित बुनियादी ढाँचा, मजबूत परिवहन व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता इसे सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल करती है।
ओसाका के अलावा आइची राज्य ने भी दूसरी राजधानी बनने की इच्छा जताई है। वहाँ के गवर्नर हिदेआकी ओमुरा का कहना है कि उनका क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर की प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ संभालने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऑटोमोबाइल कंपनी टोयोटा समेत कई वैश्विक उद्योगों की मौजूदगी आइची की आर्थिक ताकत को और मजबूत बनाती है।
फुकुओका भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि पूरा क्षेत्र मिलकर दूसरी राजधानी की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार है और इस दिशा में आवश्यक प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
होक्काइडो भी खुद को मजबूत दावेदार मानता है। वहाँ के गवर्नर का तर्क है कि साप्पोरो टोक्यो से काफी दूर स्थित है, इसलिए यदि राजधानी क्षेत्र किसी बड़े भूकंप या सुनामी से प्रभावित होता है तो यहाँ उसका असर अपेक्षाकृत कम होगा।
इसके अलावा साप्पोरो में पहले से कई केंद्रीय सरकारी कार्यालय मौजूद हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में प्रशासनिक कामकाज शुरू करना आसान हो सकता है।
हालाँकि राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल ओसाका सबसे आगे दिखाई देता है। लेकिन इसकी राह पूरी तरह आसान भी नहीं है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में ननकाई ट्रफ में बड़ा भूकंप आता है तो ओसाका का कुछ हिस्सा भी प्रभावित हो सकता है।
ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या जिस शहर पर खुद प्राकृतिक आपदा का जोखिम बना हुआ है, वह पूरे देश के लिए सबसे सुरक्षित बैकअप राजधानी साबित हो पाएगा।
कानून को लेकर क्यों हो रहा है विवाद और संसद में अब तक क्या-क्या हुआ?
सरकार इस कानून को राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम बता रही है, लेकिन विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषक इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि दूसरी राजधानी की अवधारणा जितनी प्रशासनिक दिखाई देती है, उसके पीछे उतनी ही राजनीतिक रणनीति भी छिपी हुई है।
सबसे बड़ा विवाद ओसाका को लेकर है। आलोचकों का आरोप है कि यह कानून कहीं न कहीं ओसाका को बढ़त दिलाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, क्योंकि यह शहर जापान इनोवेशन पार्टी (JIP) का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ है।
दरअसल अक्टूबर 2025 में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) और जापान इनोवेशन पार्टी के बीच हुए गठबंधन समझौते में दूसरी राजधानी बनाने का वादा भी शामिल था। इसी वजह से विपक्ष का कहना है कि यह केवल राष्ट्रीय आवश्यकता नहीं, बल्कि गठबंधन की राजनीति का भी हिस्सा है।
उनका यह भी आरोप है कि सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस पूरी योजना पर कितना खर्च आएगा, किन सरकारी विभागों को भविष्य में दूसरी राजधानी में स्थानांतरित किया जाएगा और इसका आर्थिक लाभ क्या होगा।
यही कारण रहा कि संसद में यह विधेयक बिना विवाद के पारित नहीं हो सका। निचले सदन में जहाँ सत्तारूढ़ गठबंधन के पास बहुमत था, वहीं ऊपरी सदन में सरकार को कड़ा विरोध झेलना पड़ा।
विपक्षी दलों ने कई दिनों तक विधेयक का विरोध किया और मतदान टालने की कोशिश की। विवाद का एक बड़ा कारण स्थानीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) भी था। विपक्ष चाहता था कि यदि किसी राज्य में दूसरी राजधानी के लिए जनमत संग्रह कराया जाए तो उसे स्थानीय चुनावों के साथ एक ही दिन आयोजित न किया जाए, ताकि चुनावी माहौल जनमत संग्रह के नतीजों को प्रभावित न करे।
लंबी चर्चा और कई दौर की बातचीत के बाद सरकार ने सप्लीमेंट्री रेजोल्यूशन स्वीकार किया, जिसमें कहा गया कि स्थानीय चुनाव और जनमत संग्रह की समय-सीमा को यथासंभव अलग रखा जाएगा।
इसके बाद कुछ विपक्षी दल मतदान के लिए तैयार हुए और आखिरकार यह विधेयक बेहद कम अंतर से पारित हो गया। यही वजह है कि कानून बनने के बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस अभी भी खत्म नहीं हुई है।
डिजिटल गवर्नेंस से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक, जापान को क्या मिलेगा?
इस कानून का मकसद केवल किसी दूसरे शहर में सरकारी दफ्तर बनाना नहीं है। जापान की सोच इससे कहीं आगे की है। संसद में चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि यदि भविष्य में कोई बड़ा भूकंप, सुनामी या अन्य राष्ट्रीय आपदा आती है तो केवल इमारतों का सुरक्षित होना काफी नहीं होगा।
आज सरकार का अधिकांश काम डिजिटल नेटवर्क, डेटा सेंटर और ऑनलाइन सेवाओं पर निर्भर है। यदि डिजिटल व्यवस्था ठप हो गई तो प्रशासन चलाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
इसी वजह से इस कानून में डिजिटल बिजनेस कंटीन्यूटी प्लानिंग (BCP) को भी अहम स्थान दिया गया है। सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे राष्ट्रीय स्तर की सभी जरूरी सरकारी सेवाएँ ऑनलाइन माध्यम से भी निर्बाध रूप से संचालित की जा सकें। साथ ही इन व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा कर संसद को प्रगति रिपोर्ट भी देनी होगी।
यदि यह योजना सफल होती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि किसी भी बड़े संकट की स्थिति में जापान की शासन व्यवस्था पूरी तरह ठप नहीं होगी। प्रधानमंत्री कार्यालय, महत्वपूर्ण मंत्रालय और अन्य आवश्यक संस्थान जरूरत पड़ने पर दूसरी राजधानी से अपना काम जारी रख सकेंगे।
इसके साथ ही सरकार का मानना है कि इससे टोक्यो पर वर्षों से बढ़ रहा आर्थिक और प्रशासनिक दबाव भी कम होगा। आज जापान की बड़ी आबादी, प्रमुख उद्योग, वित्तीय संस्थान और सरकारी कार्यालय टोक्यो में केंद्रित हैं। दूसरी राजधानी विकसित होने से निवेश, उद्योग और रोजगार दूसरे क्षेत्रों तक भी पहुँचेंगे, जिससे क्षेत्रीय विकास को गति मिलने की उम्मीद है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी यह योजना काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि भविष्य में किसी प्राकृतिक आपदा, साइबर हमले या अन्य सुरक्षा संकट के कारण टोक्यो प्रभावित होता है तो देश के पास पहले से तैयार एक वैकल्पिक प्रशासनिक केंद्र मौजूद होगा, जहाँ से सरकार बिना किसी रुकावट के काम करती रहेगी।
क्या भारत में भी दूसरी राजधानी की बहस हुई है?
दूसरी राजधानी का विचार केवल जापान तक सीमित नहीं है। भारत में भी इस विषय पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने 1955 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स‘ में हैदराबाद को भारत की दूसरी राजधानी बनाने का सुझाव दिया था।
उनका मानना था कि दिल्ली देश के दक्षिणी हिस्से के लोगों के लिए काफी दूर है, जिससे प्रशासनिक पहुँच प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि दिल्ली भौगोलिक रूप से सीमाओं के अपेक्षाकृत करीब है, जबकि हैदराबाद देश के मध्य में स्थित होने के कारण अधिक संतुलित और सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
यह बहस बाद के वर्षों में भी समय-समय पर सामने आती रही। वर्ष 2018 में कर्नाटक के तत्कालीन आवास मंत्री एम कृष्णप्पा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बेंगलुरु को भारत की दूसरी राजधानी बनाने की माँग की थी।
उनका कहना था कि इससे दक्षिण भारत और राष्ट्रीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा। हालाँकि केंद्र सरकार की ओर से इस दिशा में कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया गया और नई दिल्ली आज भी देश की एकमात्र राजधानी है।
हालाँकि भारत में कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते रहे हैं कि राजधानी बदलने के बजाय संसद के कुछ सत्र दक्षिण भारत में आयोजित किए जा सकते हैं या फिर सुप्रीम कोर्ट की स्थायी क्षेत्रीय पीठें स्थापित की जा सकती हैं, जिससे लोगों की प्रशासन और न्याय तक पहुँच आसान हो सके।
अब आगे क्या होगा?
जापान का यह फैसला पूरी दुनिया में इसलिए चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि यह केवल राजधानी बदलने की योजना नहीं है, बल्कि भविष्य की आपदाओं के लिए शासन व्यवस्था को तैयार करने की कोशिश है। दुनिया के कई देशों ने पहले से ही प्रशासनिक शक्तियों का बंटवारा अलग-अलग शहरों में किया हुआ है।
दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, श्रीलंका, बोलीविया और नीदरलैंड जैसे देशों में अलग-अलग शहर प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। जापान भी उसी दिशा में एक नया मॉडल विकसित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी प्राथमिकता प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सरकार की निरंतरता बनाए रखना है।
फिलहाल जापान ने केवल कानूनी ढाँचा तैयार किया है। अभी किसी भी शहर को दूसरी राजधानी घोषित नहीं किया गया है। आने वाले महीनों में इच्छुक राज्य अपने प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजेंगे, जिसके बाद तय मानकों के आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाएगा। जिसके बाद अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के हाथ में होगा।


