सांस्कृतिक विरासत केवल कला या संग्रहालय की वस्तुएँ नहीं होती, बल्कि किसी देश की इतिहास, धर्म और पहचान का प्रतीक होती हैं। दशकों से तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई पवित्र कांस्य मूर्तियों की कहानी इस बात की याद दिलाती है कि कला और धर्म के प्रतीकों की अवैध तस्करी कितनी गंभीर समस्या है। इसी संदर्भ में अमेरिका के वाशिंगटन स्थित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय लिया है।
The National Museum of Asian Art is returning three bronzes to the Indian government after extensive provenance research indicated that the objects were removed from their original sites illegally. https://t.co/Q71IViyLXI pic.twitter.com/uFOPUsGPE2
— The Washington Post (@washingtonpost) January 29, 2026
उसने भारत सरकार को तीन दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तियों, शिव नटराज, सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई को लौटाने की घोषणा की। ये मूर्तियाँ तमिलनाडु के मंदिरों से दशकों पहले अवैध तरीके से हटाई गई थीं और बाद में अंतरराष्ट्रीय कला बाजार के जरिए अमेरिका तक पहुँचीं।
यह कदम न केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर की वापसी की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि दुनिया भर में लूटी गई विरासत को उनके मूल देशों तक लौटाने की वैश्विक मुहिम को भी मजबूती देता है।
कौन-कौन सी मूर्तियाँ भारत लौटाई जा रही हैं?
स्मिथसोनियन द्वारा जिन तीन मूर्तियों की पहचान की गई है, वे दक्षिण भारतीय कांस्य कला की उत्कृष्ट मिसाल हैं। इनमें चोल काल की प्रसिद्ध ‘शिव नटराज’ प्रतिमा शामिल है, जो लगभग 990 ईस्वी की मानी जाती है।

संग्रहालय के निदेशक चेस एफ रॉबिन्सन ने कहा, “शिव नटराज की यह प्रतिमा तंजावुर जिले के श्री भाव औषधेश्वर मंदिर से संबंधित थी, जहाँ 1957 में इसकी तस्वीर ली गई थी। बाद में 2002 में न्यूयॉर्क स्थित डोरिस वीनर गैलरी से इस कांस्य प्रतिमा को राष्ट्रीय एशियाई कला संग्रहालय ने अधिग्रहित कर लिया।”

दूसरी मूर्ति ‘सोमस्कंद’ है, जो 12वीं शताब्दी की चोलकालीन कृति है और इसमें शिव को पार्वती के साथ दर्शाया गया है। शोध में पुष्टि हुई है कि ‘सोमस्कंद’ की तस्वीर 1959 में अलत्तूर गाँव के विश्वनाथ मंदिर में ली गई थी।

तीसरी प्रतिमा ‘संत सुंदरार विद परवई’ है, जो विजयनगर काल की 16वीं शताब्दी की मूर्ति है। संत सुंदरर विद परावई की तस्वीर 1956 में वीरसोलापुरम गाँव के एक शिव मंदिर में ली गई थी।
ये तीनों मूर्तियाँ केवल कलात्मक वस्तुएँ नहीं थीं, बल्कि तमिलनाडु के मंदिरों में पूजनीय और पवित्र प्रतिमाएँ थीं। इन्हें धार्मिक उत्सवों के दौरान बाहर निकाला जाता था। इसलिए इनका मंदिरों से चोरी होना धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से गंभीर अपराध माना जाता है।
मंदिरों से चोरी और अवैध तस्करी का मामला
संग्रहालय अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इन प्रतिमाओं को जिस समय हटाया गया, उस दौरान भी भारत में पुरावशेष संरक्षण कानून लागू थे। इसका मतलब यह है कि इनका निर्यात या बिक्री पहले से ही कानूनन प्रतिबंधित थी।
जाँच में सामने आया कि इन मूर्तियों को मंदिरों से हटाकर चोरी-छिपे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँचाया गया और फिर इन्हें निजी कलेक्शन व संग्रहालयों में शामिल कर लिया गया। शिव नटराज प्रतिमा को 2002 में न्यूयॉर्क की डोरिस वीनर गैलरी के जरिए खरीदा गया था।
जाँच में यह भी संकेत मिले कि इस बिक्री के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया। वहीं सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई की प्रतिमाएँ 1987 में आर्थर एम सैकलर द्वारा दान की गई लगभग 1,000 वस्तुओं के संग्रह के साथ संग्रहालय में आई थीं।
प्रोवेनेंस रिसर्च से हुआ बड़ा खुलासा
इन मूर्तियों की वापसी का फैसला विस्तृत प्रोवेनेंस जाँच के बाद हुआ। प्रोवेनेंस रिसर्च का अर्थ है किसी कलाकृति के स्वामित्व और इतिहास की पूरी कड़ी को खंगालना। स्मिथसोनियन की टीम ने अधिग्रहण रिकॉर्ड, लेन-देन का इतिहास, डीलर दस्तावेज, शिपिंग व कस्टम पेपर्स, पुरानी तस्वीरें, पत्राचार और संग्रहालय के आर्काइव की गहन समीक्षा की।
इस प्रक्रिया में कई गंभीर ‘रेड फ्लैग’ सामने आए, जैसे 1973 से पहले मूर्तियों का कोई स्पष्ट इतिहास नहीं होना, अधिग्रहण को पीछे की तारीख में दिखाने की कोशिश और कुछ कस्टम दस्तावेजों में मूर्ति का स्रोत ‘थाईलैंड’ तक लिखा जाना।
फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी की तस्वीरों ने निभाई निर्णायक भूमिका
साल 2023 में स्मिथसोनियन ने पांडिचेरी स्थित फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के फोटो आर्काइव्स के साथ मिलकर काम किया। इन अभिलेखों में दक्षिण भारतीय मंदिरों की दुर्लभ तस्वीरें मौजूद हैं। जाँच में पुष्टि हुई कि ये तीनों कांस्य मूर्तियाँ 1956 से 1959 के बीच तमिलनाडु के सक्रिय मंदिरों में मौजूद थीं और उनकी तस्वीरें उसी दौरान ली गई थीं।
इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इन निष्कर्षों की समीक्षा की और आधिकारिक रूप से माना कि मूर्तियों को भारतीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए हटाया गया था। इसी आधार पर स्मिथसोनियन ने इन्हें लौटाने का निर्णय लिया।
शिव नटराज की ‘लॉन्ग-टर्म लोन’ व्यवस्था पर विवाद
तीनों मूर्तियाँ भारत लौटाई जाएँगी, लेकिन इनमें से एक ‘शिव नटराज’ को भारत सरकार ने एक विशेष समझौते के तहत दीर्घकालिक ऋण (Long-term loan) पर संग्रहालय में प्रदर्शित रहने की अनुमति दी है। संग्रहालय का कहना है कि इससे वह मूर्ति का पूरा सच दुनिया के सामने रख सकेगा, जिसमें इसका मंदिर से संबंध, अवैध तस्करी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिक्री और अंततः भारत वापसी की कहानी शामिल होगी।
यह मूर्ति संग्रहालय की प्रदर्शनी ‘The Art of Knowing in South Asia, Southeast Asia, and the Himalayas’ में प्रदर्शित रहेगी। हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि मंदिर की मूर्तियाँ पवित्र और अविभाज्य संपत्ति होती हैं, इसलिए उन्हें लोन पर रखना कानूनी और नैतिक रूप से विवादित है।
ऑपरेशन ‘Hidden Idol’ और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई
इस घोषणा के साथ ही अमेरिका में सांस्कृतिक तस्करी के खिलाफ कार्रवाई भी तेज हुई है। उसी दिन ‘अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन’ (ICE) ने ‘ऑपरेशन हिडन आइडल’ के तहत कई भारतीय कांस्य मूर्तियाँ जब्त कीं।
इनमें 14वीं शताब्दी की पार्वती प्रतिमा और तमिलनाडु की चार अन्य मूर्तियाँ शामिल थीं, जिनकी कुल अनुमानित कीमत 5 मिलियन डॉलर से अधिक बताई गई। यह प्रतिमा न्यू जर्सी के Port of Newark पर पकड़ी गई थी। जाँच में पता चला कि इसे कम से कम छह डीलरों के जरिए फर्जी प्रोवेनेंस के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में घुमाया गया था।
अमेरिकी एजेंसियों ने कई मामलों को कथित तस्कर सुभाष कपूर के नेटवर्क से जोड़ा है, जिस पर 100 मिलियन डॉलर से अधिक की सांस्कृतिक संपत्ति की तस्करी का आरोप है। कपूर 2011 में जर्मनी में गिरफ्तार हुआ था और 2012 में भारत प्रत्यर्पित किया गया।
अमेरिका ने 2007 से अब तक 24 देशों को 6600 से अधिक कलाकृतियाँ लौटाने में मदद की है, जो वैश्विक सहयोग के बढ़ते स्तर को दर्शाता है।
तमिलनाडु आइडल विंग और भारत की रिकवरी रणनीति
तमिलनाडु पुलिस की आइडल विंग-CID ने भी इस वापसी को बड़ी उपलब्धि बताया है। पूर्व डीजीपी के जयनथ मुरली ने कहा कि यह मामला भारत की MLAT (आपसी कानूनी सहायता संधि) आधारित रणनीति की सफलता है।
उन्होंने बताया कि सोमस्कंद मूर्ति थिरुवारूर जिले के अलत्तूर गाँव के विश्वनाथ मंदिर से चोरी हुई थी और इसके दस्तावेज भारत ने पहले ही 2022 में प्रस्तुत कर दिए थे।
2014 से अब तक 640+ धरोहर वापस आए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत लंबे समय से मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों से चोरी हुई मूर्तियों की वापसी के लिए कदम उठाता रहा है। औपनिवेशिक काल और बाद के वर्षों में कमजोर सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नीलामी बाजार ने तस्करी को बढ़ावा दिया। कई बार सही दस्तावेज और फोटोग्राफ रिकॉर्ड न होने के कारण मूर्तियों की पहचान और वापसी कठिन हो जाती है। फिर भी भारत सरकार लगातार प्रयास कर रही है और 2014 के बाद से अब तक 640 से अधिक चोरी की गई धरोहरें वापस लाई जा चुकी हैं।
स्मिथसोनियन का यह फैसला इसी श्रृंखला की एक बड़ी कड़ी है। यह केवल मूर्तियों की वापसी नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि अब संग्रहालयों को अपने संग्रह की पारदर्शिता और नैतिक जिम्मेदारी निभानी होगी। स्मिथसोनियन द्वारा तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई तीन पवित्र कांस्य मूर्तियों की वापसी भारत के लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जीत है।


