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रमजान शुरू होते ही फिर कट्टरपंथियों के निशाने पर हिंदू, 3 राज्यों में शोभायात्राओं में चलाए पत्थर-जूते-चप्पल: पहले भी लव जिहाद-हत्या-धर्मांतरण और मंदिरों पर हमलों का रहा इतिहास

कट्टरपंथियों की यह मानसिकता बदलने वाली नहीं है। उन्हें केवल 'कानून के डंडे' से ही सुधारा जा सकता है। यह देश का दुर्भाग्य है कि जहाँ दीपावली पर प्रदूषण की बात होती है, वहीं रमजान के दौरान होने वाली सरेआम हिंसा पर कथित बुद्धिजीवी मौन धारण कर लेते हैं।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहाँ ‘सर्वधर्म समभाव’ को संविधान की आत्मा माना गया है, वहाँ एक बेहद डरावना और सुनियोजित ‘पैटर्न’ उभरकर सामने आता है। यह विचार आज करोड़ों हिंदुओं के मन में घर कर रहा है कि क्या उनके त्यौहार और महापुरुषों की जयंतियाँ अब कट्टरपंथियों की दया पर निर्भर हैं? विडंबना देखिए कि जैसे ही रमजान का महीना शुरू होता है, देश के विभिन्न हिस्सों से हिंदुओं पर हमलों की खबरें बाढ़ की तरह आने लगती हैं।

चाहे वह छत्रपति शिवाजी महाराज की शोभायात्रा हो, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की नवमी हो या सावन की पावन काँवड़ यात्रा… इन सभी पर होने वाली पत्थरबाजी और हिंसा महज कोई ‘तात्कालिक गुस्सा’ नहीं है। यह हिंदुओं के प्रति गहरी घृणा और उनके नागरिक अधिकारों को कुचलने की एक दीर्घकालिक और खतरनाक साजिश का हिस्सा है। कट्टरपंथियों की यह मानसिकता कि ‘मस्जिद के सामने से हिंदू जुलूस नहीं निकल सकता’, भारत के लोकतंत्र और अखंडता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

कर्नाटक में शिवाजी जयंती पर पथराव: जब रक्षक ही बना निशाना

कर्नाटक के बागलकोट से आई खबरें और भी भयावह हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के अवसर पर निकाले गए जुलूस पर तब हमला किया गया जब वह पंका मस्जिद के सामने से गुजर रहा था। कट्टरपंथियों ने मस्जिद की ओर से चप्पलें और पत्थर बरसाए

इस हमले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) सिद्धार्थ गोयल के सिर और गर्दन पर चोट आई। उनकी वर्दी पर खून के धब्बे इस बात के गवाह थे कि कट्टरपंथियों के मन में कानून और व्यवस्था का कोई डर शेष नहीं रहा है।

बागलकोट की इस घटना में यह आरोप लगाया गया कि मस्जिद के बाहर डीजे की आवाज तेज थी। क्या डीजे की आवाज का समाधान पत्थरबाजी है? पुलिस के अनुसार, जुलूस जब मस्जिद के पास रुका, तभी विवाद बढ़ा और मस्जिद के भीतर से पत्थर फेंके गए। बाद में उग्र माहौल में कुछ ठेलों में आग भी लगा दी गई।

यह पूरी घटना दिखाती है कि कैसे एक ऐतिहासिक महापुरुष के सम्मान में निकाले जा रहे जुलूस को ‘संवेदनशील इलाके’ के नाम पर निशाना बनाया जाता है। जब पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी ही सुरक्षित नहीं है, तो आम हिंदू श्रद्धालु की सुरक्षा की कल्पना करना कठिन है।

मध्य प्रदेश: दुर्गा मंदिर पर प्रहार और जबलपुर का तनाव

जबलपुर के संवेदनशील सिहोरा तहसील में जो हुआ, वह कट्टरपंथी मानसिकता का एक ज्वलंत उदाहरण है। गुरुवार (19 फरवरी) की रात जब हिंदू समाज अपनी परंपरा के अनुसार दुर्गा मंदिर में शाम की आरती कर रहा था, उसी समय पास की मस्जिद में नमाज का समय भी था।

विवाद तब शुरू हुआ जब एक युवक ने कथित तौर पर मंदिर की ग्रिल को नुकसान पहुँचाया। यह घटना केवल संपत्ति के नुकसान की नहीं थी, बल्कि यह हिंदुओं की श्रद्धा पर सीधा हमला था। जब स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया, तो देखते ही देखते कट्टरपंथी समूह ने पत्थरबाजी शुरू कर दी, जिससे पूरा इलाका सांप्रदायिक तनाव की आग में झुलस गया।

जिला प्रशासन और पुलिस को स्थिति संभालने के लिए हल्का बल प्रयोग करना पड़ा और भारी सुरक्षा बल तैनात करना पड़ा। पुलिस ने 20 उपद्रवियों को हिरासत में लिया है, लेकिन सवाल वही खड़ा है… क्या एक ही समय पर आरती और नमाज का होना हिंसा का बहाना बन सकता है?

यह घटना दर्शाती है कि कैसे कट्टरपंथी तत्व हिंदुओं की धार्मिक गतिविधियों को बर्दाश्त करने के बजाय उसे विवाद का रूप देकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। मंदिर की ग्रिल तोड़ना और फिर संगठित होकर पत्थरबाजी करना एक डराने वाले भविष्य की ओर इशारा करता है।

आंध्र प्रदेश और हैदराबाद: ‘मंदिर बनाएँगे’ के नारों पर कट्टरपंथियों का बवाल

हैदराबाद के अंबरपेट इलाके में भी शिवाजी जयंती के जुलूस के दौरान कट्टरपंथियों ने मोर्चा खोल दिया। जब जुलूस एक मस्जिद के पास से गुजर रहा था, तब वहाँ मौजूद लोगों ने संगीत और ‘मंदिर बनाएँगे’ जैसे गानों पर कड़ी आपत्ति जताई।

आपत्ति धीरे-धीरे तीखी बहस और धक्का-मुक्की में बदल गई। कट्टरपंथी तत्वों का यह दावा कि हिंदू गानों से उनकी प्रार्थना में खलल पड़ता है, अक्सर हिंदू सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को दबाने का एक जरिया बन जाता है।

इस घटना के बाद शहर में तनाव इतना बढ़ गया कि प्रशासन को अगले चार दिनों के लिए धारा 144 लागू करनी पड़ी और 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया। यह विडंबना ही है कि जिस देश में हजारों लाउडस्पीकरों से दिन में पाँच बार आवाजें गूँजती हैं, वहाँ साल में एक बार निकलने वाले हिंदू जुलूस के डीजे और गानों पर इतना बवाल खड़ा कर दिया जाता है। यह कट्टरपंथियों की उस मानसिकता को उजागर करता है जो सार्वजनिक स्थानों पर केवल अपनी धार्मिक प्रधानता चाहती है और दूसरे धर्म के प्रतीकों को बर्दाश्त नहीं कर पाती।

रमजान 2025 का काला इतिहास: 70 घटनाओं का खूनी लेखा-जोखा

पुरानी रिपोर्टों और आँकड़ों पर नजर डालें तो रमजान के महीने में कट्टरपंथियों का असली चेहरा और भी भयावह होकर सामने आता है। मार्च 2025 के दौरान भारत और बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ अपराधों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हुई, जो कट्टरपंथियों की अटूट नफरत को दर्शाती है।

हत्या और मॉब लिंचिंग: बिहार के सारण में राकेश कुमार (18) की वकील शाह और शकील ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दिल्ली के वजीरपुर में 65 साल के राधेश्याम को इरशाद ने मौत के घाट उतार दिया। यहाँ तक कि नागपुर में 1000 से ज्यादा की भीड़ ने केवल ‘अफवाह’ पर हिंदुओं के घरों और 40 गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया।

होली और कीर्तन पर प्रहार: मुरादाबाद में मंदिर में कीर्तन कर रहे हिंदुओं पर असलम और शरीफ जैसे लोगों ने हमला किया। होली के पावन अवसर पर वाराणसी, गिरिडीह और लुधियाना में कट्टरपंथियों ने डीजे और गुलाल का विरोध करते हुए पत्थर और बोतल बमों से हमला किया। यह दर्शाता है कि हिंदुओं के हर त्यौहार को ‘अपराध’ की तरह देखा जाता है।

इन घटनाओं में एक बात सामान्य है ‘साजिश’। चाहे वह मुजफ्फरनगर में हिंदू लड़के का जबरन खतना कराना हो या नागपुर में सुनियोजित तरीके से दंगा भड़काना, कट्टरपंथी कभी अपनी मानसिकता नहीं बदलते। वे हर उस अवसर का लाभ उठाते हैं जहाँ वे हिंदू समाज को चोट पहुँचा सकें।

‘लव जिहाद’ और महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध

हिंदुओं के खिलाफ चल रही इस साजिश का एक सबसे घिनौना हिस्सा ‘लव जिहाद’ है। रमजान के दौरान भी कट्टरपंथियों ने हिंदू बेटियों को अपना शिकार बनाने का धंधा जारी रखते हैं। दिल्ली के सीमापुरी में आसिफ ने कोमल की हत्या कर दी, तो बाराबंकी और बरेली में हिंदू लड़कियों को अगवा कर धर्मांतरण के लिए मजबूर किया गया। देहरादून में नदीम ने ‘नवीन’ बनकर हिंदू लड़की से शादी की और धोखा दिया। ये घटनाएँ साबित करती हैं कि पहचान छिपाकर हिंदू समाज की जड़ों को खोखला करने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है।

इतना ही नहीं, बच्चों और बुजुर्गों को भी नहीं बख्शा गया। बिहार के गोपालगंज में 80 साल की बुजुर्ग महिला के साथ सैय्यद अली और उसके साथियों ने जो दरिंदगी की, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। नवी मुंबई में मोहम्मद अंसारी ने दो मासूम बच्चियों की हत्या कर दी। कट्टरपंथियों की यह घृणा इतनी गहरी है कि वे अब मासूमों के खून से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। स्कूलों में हिंदू छात्राओं से छेड़खानी (सूरजपुर मामला) और धर्मांतरण का दबाव (भोपाल और झाँसी मामले) यह बताने के लिए काफी है कि हिंदू समाज के खिलाफ चौतरफा मोर्चा खोला गया है।

मंदिरों को अपवित्र करने और रेल पलटाने की साजिशें

कट्टरपंथ की यह आग केवल सड़कों तक सीमित नहीं है, यह हिंदुओं के आराध्य और सार्वजनिक सुरक्षा तक पहुँच चुकी है। कर्नाटक के बेलगावी में याशिर ने केवल इसलिए मंदिर पर पत्थर फेंके क्योंकि उसे ‘मंदिर देखकर गुस्सा‘ आता था। पश्चिम बंगाल में शीतला मंदिर में आगजनी और मूर्तियों को तोड़ना अब एक आम घटना बनती जा रही है। ये हमले केवल ईंट-पत्थर के ढाँचे पर नहीं, बल्कि हिंदू मानबिंदुओं पर चोट करने के लिए किए जाते हैं।

सबसे खतरनाक बात यह है कि कट्टरपंथी अब ‘जिहाद’ के नए तरीके अपनाते हैं। गाजियाबाद में शावेज और इस्रार जैसे लोग जागरण और होटलों में रोटियों पर थूकते पकड़े गए। यह केवल घृणा नहीं, बल्कि हिंदुओं की आस्था को भ्रष्ट करने का निकृष्टतम प्रयास है। यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश के हरदोई में इबादुल्लाह और अनवारुल जैसे किशोरों ने रेल की पटरी पर बोल्ट रखकर ट्रेन पलटाने की कोशिश की। यह साफ़ संकेत है कि कट्टरपंथ अब केवल मजहबी नहीं रहा, बल्कि यह सीधे-सीधे देश के खिलाफ युद्ध (Terrrorism) के स्तर पर पहुँच चुका है।

क्या हिंदू अपने ही देश में ‘दोयम दर्जे’ का नागरिक है?

इन तमाम घटनाओं और रिपोर्टों पर अगर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए, तो एक डरावनी सच्चाई सामने आती है। भारत में एक ऐसा ‘इको-सिस्टम’ खड़ा हो गया है जो हिंदुओं को उनके ही घर में असुरक्षित महसूस कराने के लिए दिन-रात काम कर रहा है। कट्टरपंथियों की मानसिकता सदियों से नहीं बदली है। वे आज भी उसी मध्यकालीन सोच में जी रहे हैं जहाँ ‘काफिरों’ के त्यौहारों को रोकना वे अपना मजहबी कर्तव्य समझते हैं। रमजान के दौरान शांति और इबादत की दुहाई दी जाती है, लेकिन उसी महीने में हिंदुओं का खून सबसे ज्यादा बहाया जाता है।

यह हिंदुओं के खिलाफ एक गहरी और स्थायी साजिश है। कट्टरपंथी जानते हैं कि वे संगठित हैं और उन्हें ‘सेक्युलर’ राजनीति का संरक्षण प्राप्त है। जब शिवाजी महाराज की जयंती पर पत्थर चलते हैं, तो यह केवल एक जुलूस पर हमला नहीं है, बल्कि यह भारत के शौर्य और इतिहास पर हमला है। जब काँवड़ यात्रा को रोका जाता है, तो यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान है। प्रशासन को अब यह समझना होगा कि ‘तुष्टीकरण’ की नीति ने कट्टरपंथियों के हौसले इतने बढ़ा दिए हैं कि वे अब पुलिस अधिकारियों पर हमला करने से भी नहीं हिचकिचाते।

अगर आज हिंदू समाज अपनी सुरक्षा और सम्मान के लिए खड़ा नहीं हुआ, तो आने वाले समय में अपने त्यौहारों को मनाना भी दूभर हो जाएगा। कट्टरपंथियों की यह मानसिकता बदलने वाली नहीं है। उन्हें केवल ‘कानून के डंडे’ से ही सुधारा जा सकता है। यह देश का दुर्भाग्य है कि जहाँ दीपावली पर प्रदूषण की बात होती है, वहीं रमजान के दौरान होने वाली सरेआम हिंसा पर कथित बुद्धिजीवी मौन धारण कर लेते हैं। अब समय आ गया है कि इन कट्टरपंथी साजिशों का पर्दाफाश किया जाए और हिंदुओं को उनके अपने ही देश में गरिमा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित किया जाए।

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विशेषता
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मीडिया जगत में 5 साल से ज्यादा का अनुभव हो चला है। इटीवी भारत और इंडिया न्यूज के साथ ट्रेनिंग की शुरुआत की, तो सुदर्शन न्यूज चैनल में एंकरिंग, सोशल मीडिया और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अवसर मिला। न्यूज के अलावा मौका मिला एमएच1 नेशनल चैनल में, जहाँ सोशल मीडिया एक्जिक्यूटिव के पद पर तीन चैनल (श्रद्धा एमएच1, एमएच1 म्यूजिक और एमएच1 न्यूज) संभाला। इसके बाद सीनियर कंटेंट राइटर के पद पर एफिलिएट विभाग में जागरण न्यू मीडिया में काम करने का मौका मिला। अब सफर ले चला ऑपइंडिया की ओर...

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