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भोजशाला पर ASI रिपोर्ट का विश्लेषण: जानें कैसे कॉन्ग्रेस सरकार ने मंदिर के हिस्से में शुरू कराई थी नमाज, जो आज बन गई है गले की फाँस

रिपोर्ट में अनेक पुरातात्विक सबूत दिए गए हैं जैसे संस्कृत शिलालेख, देवी-देवताओं की नक्काशी, प्राचीन सिक्के और कार्बन डेटिंग। साल 2022 में हिंदू पक्ष द्वारा दायर याचिका पर ASI को सर्वेक्षण का आदेश दिया गया था। हिंदू पक्ष मंदिर में पूजा की अनुमति भी माँग रहा है।

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला मंदिर, जो कि माता सरस्वती का मंदिर माना जाता है, एक बार फिर से चर्चा में है। इस मंदिर के एक हिस्से में मुस्लिम एक दरगाह बनाकर नमाज पढ़ते थे। इस बात को लेकर 2022 में हिंदू पक्ष ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अपील की और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से इस मंदिर की जाँच कराने की माँग की।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई को यह आदेश दिया कि वह इस भोजशाला की जाँच करें और यह पता करें कि यह स्थान वाकई में मंदिर है या मस्जिद है। एएसआई ने अपनी जाँच पूरी की और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सबूत के साथ यह तथ्य रखा, कि भोजशाला कोई मस्जिद नहीं बल्कि एक मंदिर है।

ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार 1034 इस्वी में यानी 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज ने इस मंदिर की स्थापना की थी। यह मंदिर चूँकि माता सरस्वती का मंदिर था, इसलिए यह पूजा के स्थान होने के साथ-साथ पढ़ने लिखने वाला स्थान भी था। ऐसा माना जाता है, कि इस स्थान पर माता सरस्वती प्रकट भी हुई थीं।

जब भारत के उत्तरी हिस्से में मुस्लिम राजवंशों का शासन शुरू हुआ तो स्वाभाविक रूप से उन्होंने हिंदू मंदिरों को नष्ट करने की शुरुआत की। इसी क्रम में 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने इस मंदिर पर आक्रमण करके, यहां पर अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक हिंदू छात्रों को बंदी बना लिया था और उन्हें इस्लाम कबूलने से मना करने पर मार दिया था। 

खिलजी के बाद एक और मुस्लिम आक्रांता दिलावर खान ने 1401 ईस्वी में सरस्वती मंदिर भोजशाला के एक हिस्से को दरगाह में बदल दिया। जिस हिस्से को दरगाह में बदला गया था वह हिस्सा विजय मंदिर कहलाता था। और उसी विजय मंदिर को कमाल मौला मस्जिद नामक दरगाह में बदलकर मुस्लिमों ने इसमें नमाज पढ़ना शुरू कर दिया। 

इस तरह से एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में इस स्थल के विकास को 3 स्पष्ट चरणों में विभाजित किया है, जो इसके क्रमिक अतिक्रमण और परिवर्तन को दर्शाता है ।

  1. प्रथम चरण 10वीं-11वीं शताब्दी के बीच का है जब ईंटों से बनी शुरुआती संरचना मिलती है, जो शायद महाराजा भोज से भी पहले की हो सकती है।
  2. द्वितीय चरण महाराजा भोज के समय का है, 11वीं-13वीं शताब्दी का, यानी परमार काल के दौरान बेसाल्ट पत्थरों से निर्मित भव्य मंदिर और विश्वविद्यालय। इसी काल में नक्काशीदार स्तंभ और संस्कृत शिलालेख बनाए गए थे। 
  3. तृतीय चरण में 14वीं शताब्दी के बाद का दौर आता है, जब मंदिर की जगह मस्जिद और दरगाह का निर्माण किया गया। इस चरण में मंदिर को तोड़ा गया, मूर्तियों को विखंडित किया गया और चूना पत्थर का उपयोग करके मेहराब, गुंबद और मीनारें जोड़ी गईं। 

जब अंग्रेजों का शासन आया तो कर्जन ने भोजशाला मंदिर से सरस्वती माता की मूर्ति निकाल कर लंदन भेज दिया। 

आजादी के बाद भी लगातार, इस्लामिक कट्टरपंथी इस मंदिर में नमाज पढ़ने की कोशिश करने लगे, लेकिन पहले तो आर्य समाज फिर संघ के लोगों ने उनको ऐसा करने से रोका। 

मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने 90 के दशक में मुसलमानों को मंदिर में नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी थी। बाद में 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मध्य प्रदेश की सरकार को यह निर्देश भिजवाया कि हिंदुओं के लिए भी भोजशाला मंदिर के दरवाजे खुलवाए जाए। अटल बिहारी वाजपेयी के निर्देश के बाद भोजशाला मंदिर को खुलवाया गया।

बहरहाल साल 2022 में हिंदू पक्ष की तरफ से हरिशंकर जैन, विष्णु शंकर जैन और विनय जोशी ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई। याचिका में यह मांग की गई कि इस मंदिर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराया जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। 

हिन्दु याचिकाकर्ताओं ने यह भी माँग की, कि इस मंदिर में हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी जाए। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई को एक टीम गठित करने का आदेश दिया। एएसआई की तरफ से आठ लोगों की एक टीम गठित की गई थी, जो भोजशाला की जांच कर रहे थे और उन आठ लोगों में से तीन मुस्लिम थे। 

एएसआई ने अपनी डिटेल रिपोर्ट में साफ लिखा है कि अभी जो स्ट्रक्चर बना है यानी कि जो मस्जिद बनी है, वह एक पहले से मौजूद स्ट्रक्चर के ऊपर बनी है। वह बेसिक स्ट्रक्चर अभी भी मौजूद है और उसके ऊपर सिर्फ बेसाल्ट की एक मोटी परत बिछाकर मस्जिद का निर्माण किया गया है। कार्बन डेटिंग के आधार पर एएसआई ने कहा कि बेसिक स्ट्रक्चर 10वीं और 11वीं शताब्दी के आसपास का है। यहाँ तक कि मंदिर में जो सिक्के मिले हैं, उनमें सबसे प्राचीन सिक्का जो है, वह भी 10वीं शताब्दी का ही है। स्वाभाविक है, कि दसवीं शताब्दी तक तो इस्लाम मध्य प्रदेश तक पहुँचा ही नहीं था। 

एएसआई ने यह बताया है कि दसवीं शताब्दी के अनेक ऐसे अभिलेख मिले हैं, जिसमें पारिजात मंजरी लिखी गई है, और उसमें शारदा सदन लिखा है। शारदा सदन यानी माता सरस्वती का घर। मुसलमान कब से अरबी छोड़कर संस्कृत और प्राकृत में ‘शारदा सदन’ का गुणगान करने लगे?

एएसआई ने यह भी बताया है, कि मंदिर के ढांचे पर जो अवैध मस्जिद बनाई गई है, वह इतनी जल्दबाजी में बनाई गई है कि उसमें किसी भी सिमेट्री, डिजाइन और मटेरियल पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया है। ऐसा लग रहा है, जैसे केवल चूना पत्थर पोत कर कुछ कब्ज़ा करने की कोशिश की जा रही है। जबकि इसके ठीक दूसरी ओर जो पुराना मंदिर है, उसमें सिमेट्री, डिजाइन और मटेरियल हर चीज का ध्यान रखा गया है। कलाकृतियाँ भी की गई है, कमल के फूल बनाए गए हैं।  

आगे बढ़ते हुए एएसआई ने यह भी खुलासा किया है कि अवैध मस्जिद को बनाने में जिन खम्भों का इस्तेमाल किया गया है, वह मूल रूप से मंदिर के खम्भे थे। मंदिर में जो पत्थरों के शिलालेख मिले हैं उस पर भगवान गणेश, और भगवान नरसिंह के अलावा अनेक देवी-देवताओं की मनुष्यों की और पशुओं की चित्रकारी भी की गई है। यह अपने आप में एक सबूत है, क्योंकि दुनिया की किसी भी मस्जिद में किसी पशु की या किसी मनुष्य की चित्रकारी नहीं होती। 

इसके आगे एएसआई एक ऐसी बात बताता है जिसे सुनकर आपकी भी हंसी छूट आएगी. आमतौर पर हिंदू मंदिरों में नक्काशी की जाती है और उसमें पत्थरों पर कुछ लिखा जाता है। आप सबने अपने आसपास के मंदिरों में देखा होगा। भोजशाला मंदिर में भी पत्थर पर नक्काशी की गई है। ठीक उसी तर्ज पर अवैध मस्जिद में भी मुस्लिमों के द्वारा कुछ लिखा गया था। जब एएसआई ने उस लिखावट का अध्ययन किया, तो यह पता चला है कि अवैध मस्जिद में फारसी और अरबी में जो कविताएँ लिखी गई हैं, वह पत्थर को खोदकर नहीं लिखी गयी थीं, बल्कि उसको स्याही से लिखा गया था।

एएसआई ने यह भी बताया, कि अवैध मस्जिद के निर्माण में, मंदिर के जिन पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था, उन पत्थरों पर से संस्कृत श्लोक और देवी- देवताओं की आकृतियों को जानबूझकर छेनी से तराश कर मिटाया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, 106 स्तंभों और 82 पिलास्टर्स पर उकेरी गई देवी-देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को मस्जिद की आवश्यकताओं के अनुरूप जानबूझकर छेनी से काटकर विरूपित किया गया था।

इसके अलावा अनेक अभिलेख ऐसे मिले हैं, जिसमें प्राकृत भाषा में कविताएँ लिखी गई है। महाराजाधिराज परमेश्वर भोज देव को संबोधित करते हुए कविताएँ लिखी गई है, जो कि स्वाभाविक तौर पर इस मंदिर को परमार वंश के राजाओं द्वारा निर्मित बताती है। कई अभिलेख पर ओम नमः शिवाय और ॐ सरस्वती नमः भी लिखा मिला है। 

कुल मिलाकर इस मंदिर में वह सब कुछ है, जिन्हें इस्लाम हराम मानता है। एएसआई की यह रिपोर्ट केवल कागजों का एक पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह उन हजारों सालों के इतिहास का  इकबालिया बयान है, जिसे मिट्टी और चूने के नीचे दफनाने की कोशिश की गई थी। विडंबना देखिए, कि जिसे मिटाने के लिए छेनी और हथौड़े चलाए गए, वही निशान आज सनातनी होने का सबसे बड़ा प्रमाण बन गए। एएसआई की इस रिपोर्ट के बाद मुस्लिम पक्ष का क्या आधार होगा और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट आगे इस मुद्दे पर क्या फैसला सुनाता है, यह देखने वाली बात होगी। 

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रोहित पांडेय
रोहित पांडेय
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