देश में प्रस्तावित बिजली संशोधन विधेयक 2025 को लेकर केंद्र सरकार और बिजली क्षेत्र से जुड़े कर्मचारी-इंजीनियर संगठनों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। सरकार इस विधेयक को बिजली क्षेत्र में बड़े सुधारों के रूप में पेश कर रही है जबकि कर्मचारी संगठन इसे निजीकरण की दिशा में उठाया गया कदम बताते हुए विरोध कर रहे हैं।
संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस बिल को मौजूदा बजट सत्र के दूसरे हिस्से में संसद में पेश कर सकती है, जिसके खिलाफ बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति ने 10 मार्च 2026 को देशभर में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह विधेयक बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनियों के आने का रास्ता खोल सकता है। उनका मानना है कि इससे किसानों, आम उपभोक्ताओं और बिजली विभाग के कर्मचारियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वहीं, सरकार का कहना है कि इस विधेयक का मकसद बिजली क्षेत्र को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना, इसमें प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा को तेजी से बढ़ावा देना है।
बिजली संशोधन बिल को लेकर क्या है विवाद?
प्रस्तावित विधेयक को लेकर सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनियों को शामिल किया जा सकता है। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि यह कानून बिजली क्षेत्र के निजीकरण को बढ़ावा देगा। उनका कहना है कि अगर यह बिल पास हो गया तो निजी कंपनियों को भी बिजली वितरण का लाइसेंस मिल सकता है, जिससे सरकारी बिजली व्यवस्था में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी।
इस व्यवस्था के लागू होने पर कंपनियों को यह तय करने की छूट मिल सकती है कि वे किन उपभोक्ताओं को बिजली दें। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि ऐसी स्थिति में निजी कंपनियाँ उन इलाकों पर ज्यादा ध्यान देंगी जहाँ ज्यादा मुनाफा है जबकि कम कमाई वाले क्षेत्रों की जिम्मेदारी सरकारी बिजली कंपनियों पर ही ज्यादा आ जाएगी।
कर्मचारी संगठनों का यह भी आरोप है कि सरकार निजी कंपनियों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने जैसे कदम उठा रही है। इसी मुद्दे को लेकर देशभर में विरोध की तैयारी की गई है।
कर्मचारियों और संगठनों का विरोध क्यों?
बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति के अनुसार, यह बिल आम उपभोक्ताओं और किसानों के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उनका कहना है कि अगर वितरण व्यवस्था में निजी कंपनियाँ आती हैं तो बिजली दरों पर असर पड़ सकता है और सब्सिडी व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।
समिति का आरोप है कि सरकार ने बिजली क्षेत्र से जुड़े संगठनों और ट्रेड यूनियनों से सुझाव जरूर माँगे थे लेकिन उनकी आपत्तियों को सार्वजनिक नहीं किया गया। इसके अलावा बिजली मंत्रालय द्वारा एक वर्किंग ग्रुप बनाए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
कर्मचारी संगठनों के नेताओं का कहना है कि जिस संस्था ने पहले ही बिजली क्षेत्र के निजीकरण का समर्थन किया है, उसे ही कानून को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में शामिल करना निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। उनका मानना है कि इससे निर्णय पहले से तय होने का संदेह पैदा होता है। इसी कारण कर्मचारी संगठनों ने इस विधेयक के खिलाफ अपना विरोध और तेज कर दिया है।
सरकार के मुताबिक बिल की जरूरत क्यों?
केंद्र सरकार का कहना है कि बिजली क्षेत्र को मजबूत बनाने और भविष्य की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए सुधार करना जरूरी है। सरकार के मुताबिक प्रस्तावित विधेयक का मकसद बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक हालत को बेहतर बनाना, बिजली दरों को ज्यादा तर्कसंगत बनाना और इस क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देना है।
सरकार का तर्क है कि कई राज्यों में बिजली वितरण कंपनियाँ आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं, इसलिए बिजली की लागत के हिसाब से दर तय करना और नियामक व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी हो गया है।
इसके अलावा सरकार इस विधेयक को ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य से भी जोड़कर देख रही है। सरकार का कहना है कि आने वाले समय में स्वच्छ ऊर्जा और गैर-जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली को तेजी से बढ़ाना देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी होगा।
बिल में प्रस्तावित मुख्य सुधार
विधेयक में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं।
वित्तीय स्थिरता: बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए लागत के अनुसार बिजली दर तय करने का प्रावधान रखा गया है। नियामक आयोगों को हर साल 1 अप्रैल से टैरिफ निर्धारित करने का अधिकार देने का प्रस्ताव है।
प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा: औद्योगिक उपभोक्ताओं पर ज्यादा दर और क्रॉस-सब्सिडी के कारण उद्योगों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की बात कही गई है। बिल का उद्देश्य दरों को संतुलित करना, बिजली की माँग बढ़ाना और लागत कम करना है ताकि भारत की आर्थिक उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ सके।
ऊर्जा परिवर्तन: सरकार 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखती है। इसके लिए बिजली नियामक आयोग को बाजार आधारित नए उपकरण लागू करने का अधिकार देने का प्रस्ताव है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ सके।
उपभोक्ता सुविधा: बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और सेवा मानकों को पूरे देश में एक जैसा बनाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही बिजली के अनधिकृत उपयोग से जुड़े मामलों में आकलन की अवधि को एक वर्ष तक सीमित करने और अपील प्रक्रिया को आसान बनाने की बात कही गई है।
नियामक व्यवस्था को मजबूत करना: केंद्रीय और राज्य बिजली नियामक आयोगों के सदस्यों के खिलाफ शिकायतों की प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रस्ताव है। साथ ही बिजली से जुड़े विवादों के फैसलों के लिए समय सीमा तय करने और अपीलीय न्यायाधिकरण की क्षमता बढ़ाने की भी योजना है।
अन्य बदलाव: बिजली लाइनों के निर्माण और रखरखाव से जुड़े अधिकार पुराने टेलीग्राफ कानून से बिजली कानून में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा नेटवर्क साझा करने की अनुमति देकर लागत कम करने और व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने का प्रयास किया गया है।
सरकार के अनुसार, यह विधेयक लागू होने के बाद पूरे देश में समान रूप से लागू होगा और इससे बिजली क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। राज्यों को यह भी अधिकार रहेगा कि वे विशेष उपभोक्ता श्रेणियों, जैसे जनजातीय परिवारों या गरीब उपभोक्ताओं को पारदर्शी तरीके से सब्सिडी दे सकें।


